सिनेमा और वेब सीरीज की दुनिया में जब भी सादगी और जीवंत अभिनय की मिसाल दी जाती है, रघुबीर यादव का चेहरा जेहन में तैरने लगता है। दूरदर्शन के ऐतिहासिक दौर में ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ का सीधा-सादा मुंगेरीलाल हो या फिर आज के लोकप्रिय धारावाहिक ‘पंचायत’ में फुलेरा गांव के प्रधान जी बृजभूषण दुबे का किरदार, उन्होंने हर रूप में दर्शकों के दिलों पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है। पर्दे पर उनकी सहजता और स्वाभाविक अभिनय शैली इतनी मजबूत है कि हर दर्शक को लगता है जैसे यह कोई काल्पनिक पात्र न होकर उनके अपने ही समाज का कोई परिचित व्यक्ति है। हालांकि शोहरत और सम्मान के इस मुकाम के पीछे एक ऐसा लंबा, दर्दनाक और बगावती संघर्ष छिपा है, जिसके पन्नों को आमतौर पर दर्शक ग्लैमर की चकाचौंध में नहीं देख पाते हैं।
परंपरागत खेती से अलग खुद की राह तलाशने की बगावत
रघुबीर यादव का ताल्लुक मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के निकट बसे एक छोटे से कस्बे मझौली से है। उनका शुरुआती बचपन गांव के खेत-खलिहानों, मिट्टी की सोंधी खुशबू और बेहद पारंपरिक ग्रामीण परिवेश के बीच बीता था। उनके पिता एक सीधे-सादे किसान थे और उनका सपना केवल इतना था कि उनका बेटा भी पुश्तैनी खेती-किसानी की बागडोर संभाले या बैलगाड़ी चलाकर परंपरागत ढंग से अपना जीवन व्यतीत करे। उस दौर में परिवार के लिए जमीन से जुड़े रहना और पारंपरिक काम करना ही जीवन का एकमात्र सुरक्षित भविष्य माना जाता था। इसके विपरीत, रघुबीर के मन के भीतर बचपन से ही कला और अभिनय की एक अलग ही धुन सवार थी। पिता के बनाए पारंपरिक सांचे में ढलने के बजाय उन्होंने अपने लिए एक बिल्कुल अलग रास्ता चुनने की ठान ली थी।
पिता की नाराजगी, पान की दुकान और जबरदस्त पिटाई
घर में लगातार बढ़ते दबाव और अपनी भीतरी जिद्द के बीच एक दौर ऐसा भी आया जब रघुबीर ने खुली बगावत कर दी। पिता से नाराज होकर और अपनी आजादी की तलाश में उन्होंने एक पान की दुकान खोल ली। उन्हें लगा कि शायद यह छोटा सा रोजगार उन्हें अपने पिता के सख्त अनुशासन से मुक्ति दिला देगा और वे अपने दम पर खड़े हो सकेंगे। जैसे ही उनके पिता को इस बात का पता चला, उनका गुस्सा बेकाबू हो गया। परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा और पुश्तैनी किसानी के भविष्य को बचाने की खातिर पिता ने रघुबीर को बुरी तरह पीटा और कई थप्पड़ रसीद किए। वह थप्पड़ और डांट उनके जीवन का एक बेहद कड़वा और भावनात्मक मोड़ साबित हुआ, जिसने उनके भीतर यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी वास्तविक मंजिल हल और मिट्टी के दायरे में नहीं, बल्कि कला के रंगमंच पर है।
12वीं में असफलता, घर से पलायन और रंगमंच से जुड़ाव
जिंदगी की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। 12वीं कक्षा की परीक्षा में जब वे अनुत्तीर्ण हो गए, तो पिता की सख्त और भयंकर पिटाई के खौफ ने उन्हें अंदर तक हिला दिया। पिटाई के डर से रघुबीर अपना घर-बार छोड़कर भाग खड़े हुए। इस पलायन के बाद उन्होंने तमाम आर्थिक और सामाजिक संकटों का सामना किया, लेकिन अपने सपनों को टूटने नहीं दिया। अंततः उन्होंने रंगमंच की दुनिया में कदम रखा और बाद में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में दाखिला लेकर अभिनय के तकनीकी गुर और गहराइयां सीखीं। इतने वर्षों की अपार शोहरत और कई फिल्मों के बावजूद, रघुबीर यादव आज भी रंगमंच को ही अपना पहला और सच्चा प्यार मानते हैं।
गायन की प्रतिभा और बेटे के साथ खास जुगलबंदी
अभिनय के महारथी होने के साथ-साथ रघुबीर यादव एक बेहतरीन गायक भी हैं। अपनी फिल्म ‘ओम का हरी’ में उन्होंने दो गाने गाए हैं। फिल्म में शामिल उनका गीत ‘राम राखे’ दरअसल महान संत कबीर के दार्शनिक बोलों पर आधारित है। इस संगीत रचना की सबसे अनूठी बात यह है कि इसे खुद उनके बेटे अंचल ने कंपोज किया है। पिता और पुत्र की इस अनूठी जोड़ी ने मिलकर इस गीत को बेहद यादगार और भावुक बना दिया है।


















