भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने ऐसे बने हैं जिन्होंने न केवल पर्दे पर देखने वालों को रुलाया, बल्कि उनके निर्माण के दौरान सेट पर मौजूद दिग्गज भी अपने आंसू नहीं संभाल सके। ऐसा ही एक कालजयी गाना था फिल्म 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' का शीर्षक गीत। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के संयोजन से तैयार इस गीत को जब पहली बार निर्देशक राज खोसला को सुनाया गया, तो वे फूट-फूटकर रोने लगे थे। दो से तीन हिस्सों में रिकॉर्ड हुआ यह गाना आज भी जब बजता है, तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और आंखों में नमी तैर जाती है।
जब कहानी की जटिलता ने संगीतकार जोड़ी को दी बड़ी चुनौती
इस अमर गीत के बनने की शुरुआत तब हुई जब निर्देशक राज खोसला ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को अपनी फिल्म का विषय समझाया। कहानी एक ऐसे पुरुष की थी जो पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी कर लेता है और अपने घर में सौतन ले आता है। हालांकि, उस दूसरी पत्नी को वह सामाजिक अधिकार और दर्जा कभी नहीं मिल पाता जिसकी वह हकदार होती है। वह कभी घर की दहलीज लांघकर भीतर नहीं आ पाती। राज खोसला ने तुलसी के किरदार को एक बेबस इंसान की तरह प्रस्तुत किया था। इस जटिल और भावनात्मक परिस्थिति पर एक असरदार गाना तैयार करना संगीतकारों के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी।
छह शब्दों की उस एक पंक्ति ने निर्देशक को कर दिया भावुक
इस संवेदनशील सिचुएशन को गहराई से समझने के बाद मशहूर गीतकार आनंद बक्शी ने दो पंक्तियां लिखीं- 'मैं तुलसी तेरे आंगन की, कोई नहीं मैं तेरे साजन की।' मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इस मुखड़े को स्वरबद्ध किया, तो उसमें शामिल महज छह शब्दों की लाइन 'कोई नहीं मैं तेरे साजन की' राज खोसला के दिल में उतर गई। इस पंक्ति में छिपा दर्द सुनकर निर्देशक अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख सके। धुन के बजते ही संगीतकारों और निर्देशक की आंखों के सामने पूरी कहानी का मंजर जीवंत हो उठा।
संगीतकारों की दुविधा और राज खोसला का ऐतिहासिक जवाब
इसके बाद जब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने गाने का अंतरा कंपोज करके राज खोसला को सुनाया, तो निर्देशक और भी तेजी से रोने लगे। उनकी यह हालत देखकर संगीतकार जोड़ी घबरा गई और असमंजस में पड़ गई। उन्हें लगा कि शायद गाने की धुन सही नहीं बनी है या उनसे कोई बड़ी चूक हो गई है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल तुरंत राज खोसला के पास पहुंचे और बहुत संकोच के साथ पूछा कि क्या वे इस सिचुएशन के लिए कोई दूसरी धुन तैयार करें। इस पर भावुक राज खोसला ने कहा कि इस परिस्थिति के लिए इससे बेहतर और सुंदर धुन दुनिया में कोई दूसरी बन ही नहीं सकती।
पर्दे पर बिखरा दर्द और मोहम्मद रफी का योगदान
लता मंगेशकर ने इस गीत को गाते समय उस किरदार की पूरी वेदना को अपनी आवाज में पिरो दिया था। यह गाना फिल्म में आगे चलकर एक और बेहद दुखद मोड़ पर बजता है, जब आशा पारेख के किरदार का निधन हो जाता है। जब उनकी अंतिम यात्रा नूतन के घर के पास से गुजरती है, तब गाने की लाइन 'मत रो बहना अंदर जाके' बजती है। इस दृश्य ने सिनेमाघरों में बैठे हर दर्शक को रोने पर मजबूर कर दिया था। हालांकि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इसी फिल्म में मोहम्मद रफी से भी एक बहुत खूबसूरत गाना गवाया था, लेकिन लता मंगेशकर के गाए इस शीर्षक गीत का जादू सबसे अलग साबित हुआ।
मदन मोहन से लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल तक का संगीतमय सफर
राज खोसला का लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी पर अटूट विश्वास था। शुरुआत में राज खोसला अपनी ज्यादातर फिल्मों में महान संगीतकार मदन मोहन का संगीत लिया करते थे। लेकिन जब उन्होंने फिल्म 'अनीता' के लिए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को चुना, तो उनके बनाए गानों की ताजगी देखकर राज खोसला हैरान रह गए। इसके बाद इस तिकड़ी और जोड़ी ने 'दो रास्ते' और 'मेरा गांव मेरा देश' जैसी कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं। इनके रचे गाने देश की हर गली-मोहल्ले में गूंजते थे और यह जोड़ी हर सिचुएशन के लिए सटीक संगीत देने के लिए जानी जाती थी।



















