6 अगस्त 1993 की तारीख भारतीय सिनेमा इतिहास के सबसे चर्चित अध्यायों में दर्ज है। इस दिन निर्देशक सुभाष घई की फिल्म 'खलनायक' बड़े पर्दे पर रिलीज हुई थी। उस दौर में अभिनेता संजय दत्त बॉम्बे बम ब्लास्ट केस के सिलसिले में कानूनी हिरासत का सामना कर रहे थे, जिसके कारण समाज के एक हिस्से में फिल्म के प्रदर्शन को लेकर काफी विरोध और नाराजगी थी। तमाम विपरीत परिस्थितियों और अनिश्चितता के माहौल के बावजूद फिल्म सिनेमाघरों में पहुंची और बॉक्स ऑफिस पर सफलता का नया इतिहास रच दिया। दर्शकों ने संजय दत्त के नकारात्मक किरदार को इतना पसंद किया कि वह रातों-रात बड़े पर्दे के सबसे यादगार एंटी-हीरो बनकर उभरे। उस समय संजय दत्त की छवि विलेन जैसी बनी हुई थी और इस फिल्म ने उनके उस स्क्रीन अवतार को और ज्यादा मजबूती प्रदान की।
विवाद के बीच बॉक्स ऑफिस पर बनाया रिकॉर्ड
फिल्म निर्माण से जुड़े आंकड़ों पर नजर डालें तो 'खलनायक' को महज 3.75 करोड़ रुपये के अनुमानित बजट में तैयार किया गया था। रिलीज होते ही दर्शकों का भारी हुजूम थिएटर्स की ओर उमड़ पड़ा, जिसके दम पर इस एक्शन ड्रामा ने दुनियाभर के बॉक्स ऑफिस से 24 करोड़ रुपये से ज्यादा का शानदार कलेक्शन बटोरा। यह पहली ऐसी हिंदी फीचर फिल्म साबित हुई जिसने उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के कनाडाई और अमेरिकी बाजारों में भी जबरदस्त कमाई करके नए कीर्तिमान स्थापित किए। अंतरराष्ट्रीय बाजारों और शुरुआती सप्ताहांत में इसके कलेक्शन का आंकड़ा इतना विशाल था कि उसने कई प्रमुख हॉलीवुड फिल्मों के ओपनिंग वीकेंड बिजनेस को भी पीछे छोड़ दिया था।
अमिताभ बच्चन की 'देवा' से 'खलनायक' बनने का सफर
इस ऐतिहासिक एक्शन ड्रामा की शुरुआत की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। शुरुआत में निर्देशक सुभाष घई महानायक अमिताभ बच्चन को मुख्य भूमिका में लेकर 'देवा' नाम से एक बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। हालांकि, कुछ कारणों से वह प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया। बाद में घई ने उसी मूल विचार को दोबारा तराशा, नई स्टार कास्ट चुनी, नया शीर्षक तय किया और पटकथा में जरूरी बदलाव करते हुए 'खलनायक' का ढांचा तैयार किया। 'देवा' में जो केंद्रीय भूमिका अमिताभ बच्चन निभाने वाले थे, उस चुनौतीपूर्ण किरदार को आखिरकार संजय दत्त को सौंपा गया, जिसे उन्होंने यादगार बना दिया।
रामायण की थीम और रावण से राम बनने की सोच
फिल्म के प्रदर्शन के 33 साल पूरे होने के अवसर पर निर्देशक सुभाष घई ने इस प्रतिष्ठित फिल्म के जन्म की रचनात्मक प्रक्रिया से जुड़ी यादें ताजा कीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पर्दे पर एक ऐसा खलनायक पेश करना चाहते थे जिसके भीतर अपराध के पीछे कोई गहरा व्यक्तिगत दर्द और त्रासदी छुपी हो। इस कहानी का मुख्य दार्शनिक आधार यही था कि कैसे कोई इंसान अपने अंतर्मन की आवाज सुनकर बुराई का रास्ता छोड़कर अच्छाई की ओर लौट सकता है।
अपनी विचार प्रक्रिया को साझा करते हुए सुभाष घई ने कहा, "क्या रावण जैसा किरदार अपनी आत्मा की आवाज सुनकर श्रीराम बनने की ओर बढ़ सकता है?" उन्होंने बताया कि यही विचार उनके दिमाग में सबसे पहले कौंधा था जिसने इस पूरी स्क्रिप्ट की नींव रखी। यह केवल एक अपराधी की दास्तान नहीं थी, बल्कि एक ऐसे इंसान की पीड़ादायक कहानी थी जिसे हालातों की मजबूरी ने अपराध की काली दुनिया में धकेल दिया था।
कलाकारों का प्रदर्शन और कालजयी संगीत
फिल्म में संजय दत्त ने बल्लू बलराम उर्फ 'खलनायक' की मुख्य भूमिका निभाई, जबकि जैकी श्रॉफ और माधुरी दीक्षित ने प्रमुख किरदारों में उनका बखूबी साथ दिया। सुभाष घई ने फिल्म की इस अपार सफलता का श्रेय पूरी टीम को समर्पित किया। उन्होंने संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, मशहूर गीतकार आनंद बख्शी, नृत्य निर्देशक सरोज खान और फिल्म से जुड़े सभी सहयोगियों के प्रति दिल से आभार व्यक्त किया।
फिल्म का संगीत इसकी सफलता का सबसे मजबूत स्तंभ साबित हुआ। इसके कालजयी गीत जैसे 'नायक नहीं खलनायक हूं मैं', 'चोली के पीछे क्या है', 'पालकी में होकर सवार चली रे' और 'ऐ साहब ये ठीक नहीं' आज 33 साल बाद भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर चढ़े हुए हैं।



















