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महज 7.50 रुपये की पहली कमाई और दिलीप कुमार की कड़वी सलाह, कैसे नसीरुद्दीन शाह बने सिनेमा के दिग्गजबॉलीवुड
21 घंटे पहले· 1

महज 7.50 रुपये की पहली कमाई और दिलीप कुमार की कड़वी सलाह, कैसे नसीरुद्दीन शाह बने सिनेमा के दिग्गज

बचपन से ही एक्टिंग का शौक रखने वाले नसीरुद्दीन शाह ने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर एक्टिंग को अपना करियर चुना। शुरुआत में एक्स्ट्रा का रोल करने वाले इस महान कलाकार को कभी उनके आदर्श दिलीप कुमार ने एक्टिंग छोड़कर पढ़ाई करने की सलाह दी थी।

भारतीय सिनेमा के सबसे बेहतरीन कलाकारों में शुमार होने का सफर नसीरुद्दीन शाह के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था। शोहरत और ढेरों अवॉर्ड्स से पहले, वह सिर्फ एक आम युवा थे जिन्होंने महज सात रुपये पचास पैसे के लिए कैमरे के सामने अपना पहला काम किया था। यहां तक कि इंडस्ट्री के सबसे बड़े सुपरस्टार ने भी उन्हें यह कहकर वापस भेज दिया था कि अभिनय उनके बस की बात नहीं है। लेकिन, अपने हुनर को लेकर उनके भीतर गजब की जिद थी। उन्होंने परिवार की नाराजगी और तमाम मुश्किलों का डटकर सामना किया, और आखिरकार खुद को एक ऐसे बेजोड़ कलाकार के रूप में साबित किया जिसने आर्ट और कमर्शियल, दोनों ही तरह की फिल्मों में अपनी बादशाहत कायम की।

सपनों के लिए परिवार से बगावत

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी शहर में 20 जुलाई 1950 को जन्मे नसीरुद्दीन शाह एक ऐसे माहौल में पले-बढ़े जहां तालीम और सुरक्षित नौकरी को ही जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य माना जाता था। उनके पिता अली मोहम्मद शाह की दिली ख्वाहिश थी कि उनका बेटा भी अपने बाकी भाइयों के नक्शेकदम पर चलते हुए कोई बेहतरीन और पक्की नौकरी हासिल करे। हालांकि, इस युवा का मन कभी भी किताबी दुनिया में नहीं लगा। बचपन से ही उनका पूरा ध्यान नाटकों, फिल्मों और क्रिकेट के मैदान पर ही अटका रहता था।

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अपने जुनून की राह पर चलने का पक्का इरादा करते हुए, उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की और सीधा नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का दरवाजा खटखटाया। उनके इस बड़े कदम ने घर में भारी बवाल खड़ा कर दिया। पिता उनके इस फैसले से सख्त खफा थे, क्योंकि पूरा परिवार चाहता था कि वह बिना जोखिम वाला करियर चुनें। तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए, इस उभरते कलाकार ने अपने ख्वाबों को चुना। अपनी कला को और ज्यादा निखारने के मकसद से, उन्होंने आगे चलकर पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में भी दाखिला लिया, जहां उन्होंने कैमरे के सामने खुद को पेश करने की तमाम बारीकियां सीखीं।

पहली कमाई और एक कड़वी सलाह

उनके करियर का शुरुआती दौर भारी जद्दोजहद और छोटे-मोटे रोल्स से भरा हुआ था। पर्दे पर उनकी पहली झलक साल 1967 में रिलीज हुई फिल्म ‘अमन’ में देखने को मिली। उस वक्त वह केवल 16 साल के थे और सेट पर उन्हें एक एक्स्ट्रा कलाकार की तरह रखा गया था। इस चंद सेकेंड के काम के बदले उन्हें सिर्फ 7.50 रुपये की फीस थमाई गई थी, जो यह बताने के लिए काफी था कि आगे का रास्ता कितना लंबा है।

इंडस्ट्री में अपनी जगह तलाशने के इसी मुश्किल दौर में उनका सामना सीधे दिलीप कुमार से हुआ। दिग्गज अभिनेता उनके परिवार से अच्छी तरह वाकिफ थे, और युवा नसीर भी उन्हें अपना आदर्श मानते थे। जब उन्होंने अपने इस हीरो को बताया कि वह भी एक बड़ा अभिनेता बनना चाहते हैं, तो दिलीप कुमार ने उन्हें तुरंत घर लौट जाने और दोबारा पढ़ाई शुरू करने की नसीहत दे डाली। किसी भी नए कलाकार के लिए अपने आदर्श से ऐसी बातें सुनना दिल तोड़ने वाला हो सकता था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। इसके बजाय, उन्होंने इस कड़वे अनुभव को अपनी ताकत बनाया और दुनिया को दिखा दिया कि एक्टिंग भी एक बेहद इज्जतदार पेशा हो सकता है।

समानांतर सिनेमा के सबसे बड़े चेहरे

उनके संघर्षों को असली मंजिल साल 1975 में मिली, जब मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल ने उन्हें अपनी फिल्म ‘निशांत’ में मौका दिया। यह भारत में समानांतर सिनेमा के एक सुनहरे दौर की शुरुआत थी, और वह इसके सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे। इसके बाद उन्होंने ‘आक्रोश’, ‘स्पर्श’, ‘मंडी’, ‘अर्ध सत्य’, ‘मिर्च मसाला’ और शानदार व्यंग्य ‘जाने भी दो यारों’ जैसी एक से बढ़कर एक क्लासिक फिल्मों में अपनी जानदार एक्टिंग का लोहा मनवाया। पर्दे पर बिल्कुल स्वाभाविक और असली दिखने की उनकी कला ने इस नई लहर को एक अलग ही पहचान दिला दी।

उन्होंने खुद को सिर्फ गंभीर या लीक से हटकर बनने वाली फिल्मों तक ही सीमित नहीं रखा। धीरे-धीरे उन्होंने कमर्शियल सिनेमा के बड़े बजट वाले प्रोजेक्ट्स में भी एंट्री मारी और साबित किया कि वह हर सांचे में फिट बैठ सकते हैं। ‘कर्मा’, ‘मोहरा’, ‘सरफरोश’, ‘इकबाल’, ‘ए वेडनेसडे’ और ‘द डर्टी पिक्चर’ जैसी सुपरहिट फिल्मों में दर्शकों ने उनके हर अवतार पर तालियां बजाईं। चाहे मुख्य हीरो का किरदार हो, खूंखार विलेन का रूप, या फिर कोई बेहद संजीदा रोल, उन्होंने अपनी हर परफॉर्मेंस से लोगों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी।

सम्मान और अवॉर्ड्स की झड़ी

अभिनय की दुनिया में उनके इस बेमिसाल योगदान को हर बड़े मंच पर सराहा गया है। उन्हें ‘स्पर्श’, ‘पार’ और ‘इकबाल’ में अपनी जादुई एक्टिंग के लिए तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। इसके साथ ही, भारत सरकार ने उनकी कला का सम्मान करते हुए साल 1987 में उन्हें पद्मश्री और फिर 2003 में देश के प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया।

रुपहले पर्दे से इतर, उनका पहला प्यार यानी थिएटर आज भी उनके जीवन का एक अहम हिस्सा है। अपनी खुद की थिएटर कंपनी के जरिए उन्होंने मंच कला को भी अपना काफी समय और जीवन दिया है। इसके अलावा, टेलीविजन की दुनिया में भी ‘मिर्जा गालिब’ और ‘भारत एक खोज’ जैसे ऐतिहासिक शोज में निभाए गए उनके किरदारों को आज भी उनकी सबसे बेहतरीन अदाकारी में गिना जाता है।

सवाल-जवाब

नसीरुद्दीन शाह का जन्म कब और कहां हुआ था?
उनका जन्म 20 जुलाई 1950 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुआ था।
नसीरुद्दीन शाह को उनकी पहली फिल्म के लिए कितनी फीस मिली थी?
साल 1967 में आई फिल्म ‘अमन’ में एक एक्स्ट्रा के तौर पर काम करने के लिए उन्हें सिर्फ 7.50 रुपये मिले थे।
संघर्ष के दिनों में दिलीप कुमार ने नसीरुद्दीन शाह को क्या सलाह दी थी?
दिलीप कुमार ने उन्हें अभिनय का सपना छोड़कर वापस घर जाने और अपनी पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी थी।
नसीरुद्दीन शाह ने किन संस्थानों से एक्टिंग की पढ़ाई की है?
उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के बाद नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) और पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट से अभिनय की ट्रेनिंग ली।
नसीरुद्दीन शाह को कितनी बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है?
उन्हें फिल्म ‘स्पर्श’, ‘पार’ और ‘इकबाल’ में शानदार अभिनय के लिए तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
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