हिंदी सिनेमा के लंबे इतिहास में एक ही नाम से कई प्रोजेक्ट्स का निर्माण होना कोई नई परिपाटी नहीं है, लेकिन शीर्षक के नाम पर जो रिकॉर्ड 'बरसात' के नाम दर्ज है, वह वाकई अनूठा है। भारतीय फिल्म उद्योग में अलग-अलग तीन दशकों के अंतराल पर तीन विशाल सिनेमाई रचनाएं इसी एक नाम के साथ रुपहले पर्दे पर उतारी गईं। सबसे दिलचस्प मोड़ यह रहा कि 1949 में राज कपूर द्वारा स्थापित इस क्लासिक विरासत को आगे चलकर 1995 और 2005 में दोबारा भुनाया गया। इसमें भी सबसे अनोखी बात यह रही कि उत्तरार्ध की दोनों ही फिल्मों में बॉबी देओल ही मुख्य अभिनेता के रूप में दर्शकों के सामने आए। मामूली 40 लाख रुपये की लागत से शुरू हुआ यह बॉक्स ऑफिस सफर 34 करोड़ रुपये के विशाल आंकड़े तक पहुंचा, जो ट्रेड विश्लेषकों को आज भी हैरान करता है।
1949 की ऐतिहासिक 'बरसात' और आरके स्टूडियोज की नींव
इस सिनेमाई यात्रा का पहला अध्याय साल 1949 में लिखा गया था, जब राज कपूर के निर्देशन और अभिनय में सजी फिल्म 'बरसात' सिनेमाघरों में रिलीज हुई। आरके बैनर तले निर्मित इस भावुक और रोमांटिक ड्रामा में राज कपूर के साथ नरगिस और प्रेमनाथ ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। उस दौर में महज 40 लाख रुपये के सीमित बजट में तैयार हुई इस फिल्म ने कमाई के सारे पुराने कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। रिलीज के बाद फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 2 करोड़ रुपये का ऐतिहासिक कारोबार किया। संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के अमर और कर्णप्रिय गीतों ने इस फिल्म को सुपर ब्लॉकबस्टर बनाने में अहम भूमिका निभाई। इस शानदार सफलता ने न केवल आरके स्टूडियोज की आर्थिक और व्यावहारिक नींव को मजबूती प्रदान की, बल्कि 'बरसात' नाम को सदा के लिए भारतीय सिनेमा के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज करा दिया।
1995 में 46 साल बाद दोबारा लौटा 'बरसात' का जादू
पहली फिल्म की अभूतपूर्व कामयाबी के ठीक 46 साल बाद, निर्देशक राजकुमार संतोषी साल 1995 में एक बार फिर 'बरसात' शीर्षक के साथ एक नई प्रेम कहानी लेकर दर्शकों के बीच आए। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के दो दिग्गज परिवारों के वारिसों का भव्य लॉन्चपैड बनी। धर्मेंद्र के छोटे बेटे बॉबी देओल तथा राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया की बेटी ट्विंकल खन्ना ने इस फिल्म से अपना पहला कदम रखा। नदीम-श्रवण के ब्लॉकबस्टर संगीत और मनमोहक लोकेशन्स के साथ बनी इस फिल्म का कुल बजट लगभग 8.25 करोड़ रुपये था। सिनेमाघरों में कदम रखते ही फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया और कुल 34 करोड़ रुपये का जबर्दस्त बिजनेस किया। बॉबी देओल और ट्विंकल खन्ना की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री को दर्शकों का भरपूर प्यार मिला, जिससे यह 1995 की सबसे सफल फिल्मों में शामिल हुई और बॉबी देओल रातोंरात युवाओं के दिलों की धड़कन यानी नेशनल क्रश बन गए।
2005 में बना अनोखा त्रिकोण और बॉबी देओल की दोबारा वापसी
साल 1995 की बंपर सफलता के ठीक 10 साल बाद, निर्देशक सुनील दर्शन ने 2005 में एक बार फिर 'बरसात' नाम से फिल्म बनाई। इस प्रोजेक्ट की सबसे हैरान कर देने वाली बात यह थी कि निर्माताओं ने 10 साल पुरानी फिल्म के मुख्य नायक बॉबी देओल पर ही दोबारा दांव लगाया। इस बार कथावस्तु एक त्रिकोणीय प्रेम कहानी पर आधारित थी, जिसमें बॉबी देओल के साथ प्रियंका चोपड़ा और बिपाशा बसु मुख्य भूमिकाओं में नजर आईं। लगभग 10 करोड़ रुपये के बजट में निर्मित इस फिल्म ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों को मिलाकर दुनिया भर में 19 करोड़ रुपये (वर्ल्डवाइड ग्रॉस) की कुल कमाई की। यद्यपि यह फिल्म 1995 वाली 'बरसात' जैसी ऐतिहासिक कमाई का करिश्मा दोहराने में नाकाम रही, लेकिन व्यावसायिक मोर्चे पर यह फिल्म अपनी लागत निकालकर बॉक्स ऑफिस पर हिट का दर्जा हासिल करने में सफल रही।
एक ही हीरो, दो अलग किरदार और ट्रेड का आश्चर्य
बॉलीवुड में विभिन्न कलाकारों ने एक समान नाम वाली फिल्मों में अभिनय किया है, लेकिन मात्र 10 साल के अंतराल में एक ही शीर्षक वाली दो अलग-अलग फिल्मों में मुख्य हीरो के तौर पर काम करना बॉबी देओल के करियर की एक अद्वितीय उपलब्धि मानी जाती है। 1995 की फिल्म में जहां बॉबी देओल ने एक देहाती और बेफिक्र नौजवान की भूमिका निभाई थी, वहीं 2005 की 'बरसात' में उनका किरदार एक परिपक्व और महत्वाकांक्षी पति का था। यद्यपि दोनों फिल्मों की कहानियां, परिवेश और निर्देशक पूरी तरह भिन्न थे, फिर भी एक ही स्टार और एक ही शीर्षक के इस अनोखे संयोजन ने व्यापार जगत के विशेषज्ञों और आम दर्शकों दोनों को अचंभित कर दिया था।
सदाबहार संगीत और 50 वर्षों का अटूट ट्रैक रिकॉर्ड
1949 के सुपर ब्लॉकबस्टर दौर से शुरू होकर 1995 की सुपरहिट और 2005 की व्यावसायिक सफलता तक, 'बरसात' ब्रांड का 50 से अधिक वर्षों का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद शानदार रहा है। इस नाम से बनी तीनों ही फिल्मों ने निर्माताओं को कभी निराश नहीं किया और वित्तीय स्तर पर हमेशा बेहतर प्रदर्शन किया। इन सभी फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत इनका अमर संगीत रहा है। 1949 में शंकर-जयकिशन की धुनों ने जादू बिखेरा, तो 1995 और 2005 में नदीम-श्रवण के चार्टबस्टर गानों ने दर्शकों को थिएटर्स तक खींचने में सबसे मुख्य भूमिका निभाई।



















