अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजारों में मंगलवार को अमेरिकी डॉलर पर ताजा बिकवाली का दबाव देखा गया, जिससे ग्रीनबैक फिसलकर दो दिन के निचले स्तर के करीब पहुंच गया। फ्रांस में वित्तीय अनिश्चितताओं और बजटीय चिंताओं में आई नरमी ने वैश्विक जोखिम उठाने की क्षमता को सहारा दिया, जिसका सीधा असर डॉलर की मजबूती पर पड़ा है। इस व्यापक बदलाव के बीच अमेरिकी डॉलर इंडेक्स यानी DXY सप्ताह की शुरुआत में दिखी तेजी को बनाए रखने में नाकाम रहा और 102.00 के महत्वपूर्ण सपोर्ट जोन को तोड़कर नीचे आ गया। कारोबारी अब आगामी महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की तैयारी कर रहे हैं, जिनमें नियमित MBA मॉर्टगेज एप्लिकेशन, न्यूयॉर्क फेड के उपभोक्ता मुद्रास्फीति प्रत्याशा आंकड़े और फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) के मिनट्स शामिल हैं। इसके अलावा फेड की अधिकारी लोगन का भाषण भी नीतिगत दृष्टिकोण पर ताजा रोशनी डाल सकता है।
प्रमुख वैश्विक मुद्राओं में हलचल और डॉलर का असर
अमेरिकी डॉलर के नरम रुख के बीच ब्रिटिश पाउंड ने मजबूत वापसी के संकेत दिए हैं। GBP/USD की जोड़ी ठोस दृढ़ता के साथ आगे बढ़ी और 1.3300 के अहम तकनीकी स्तर को दोबारा छूने की ओर अग्रसर दिखी। ब्रिटेन के आर्थिक कैलेंडर में अब BBA मॉर्टगेज रेट के साथ लॉयड्स हाउस प्राइस इंडेक्स के आंकड़े जारी होने वाले हैं, जो स्टर्लिंग की आगे की चाल तय करने में मददगार साबित हो सकते हैं। दूसरी ओर, USD/JPY की जोड़ी में सोमवार की बढ़त के बाद भी मजबूती बनी रही और यह एक बार फिर 158.00 के स्तर को पार कर गई, हालांकि इस स्तर पर लिवालों का भरोसा अब भी पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है। जापान की ओर से रॉयटर्स तानकान इंडेक्स, औसत नकद आय और फ्लैश कोइंसिडेंट व लीडिंग इकोनॉमिक इंडेक्स के आंकड़े आने वाले हैं, जिन पर विदेशी मुद्रा व्यापारियों की पैनी नजर रहेगी।
जापानी येन अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 158.00 के आसपास अस्थिर बना हुआ है। बाजार में बैंक ऑफ जापान (BoJ) द्वारा सख्त मौद्रिक नीति अपनाए जाने की उम्मीदें और संभावित सरकारी दखल के जोखिम लगातार मंडरा रहे हैं, लेकिन येन को इनसे कोई ठोस दिशा नहीं मिल सकी है। BoJ के कदम उठाने की समयसीमा अभी भी स्पष्ट नहीं है, जिससे येन की रफ्तार सुस्त बनी हुई है। वहीं एशियाई सत्र के दौरान AUD/USD में हल्की गिरावट देखी गई, जिससे पिछले सप्ताह दो महीने के निचले स्तर से शुरू हुई दो दिन की रिकवरी थम गई। फिक्स्ड इनकम बाजार में चली लंबी बिकवाली के कारण अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बहु-वर्षीय उच्च स्तर के करीब बनी हुई है, जिससे अक्टूबर में फेड द्वारा ब्याज दर बढ़ाने की घटती संभावनाओं के बावजूद डॉलर को समर्थन मिल रहा है। हालांकि इस महीने रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) द्वारा ब्याज दर में एक और बढ़ोतरी की संभावनाएं ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को सहारा दे सकती हैं।
कच्चे तेल में फिसलन और सोने में सीमित रिकवरी
कमोडिटी बाजार की बात करें तो फ्रंट-मंथ WTI क्रूड फ्यूचर्स में लगातार तीसरे कारोबारी दिन गिरावट दर्ज की गई। पश्चिम एशिया में आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं शांत होने के कारण कच्चे तेल के भाव फिसलकर 87.00 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गए हैं। भू-राजनीतिक तनाव में तात्कालिक नरमी ने तेल बाजार में मुनाफावसूली को बढ़ावा दिया है, जिससे ऊर्जा कीमतों में गिरावट आई है।
दूसरी तरफ, सोने की कीमतों में मिला-जुला रुझान देखने को मिला। पीली धातु सोमवार की मामूली बढ़त को आगे बढ़ाते हुए कुछ ऊपर जरूर चढ़ी, लेकिन मंगलवार को भी यह 4,200 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के अहम स्तर को पार करने के लिए संघर्ष करती नजर आई। सोने की इस सीमित बढ़त को अमेरिकी डॉलर में आई ताजा गिरावट और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में सभी अवधियों में आई नरमी से प्रत्यक्ष समर्थन मिला है। निवेशक यह देख रहे हैं कि सुरक्षित निवेश के रूप में सोने का आकर्षण मौजूदा स्तरों पर कितना टिक पाता है।
क्रिप्टो बाजार की स्थिति और केंद्रीय बैंकों की दुविधा
डिजिटल परिसंपत्तियों के बाजार में बिटकॉइन ने अपनी मजबूत तेजी की स्थिति बनाए रखी है। मंगलवार को जब बिकवाल रुझान पर दोबारा नियंत्रण पाने की कोशिश कर रहे थे, उस समय बिटकॉइन 85,837 डॉलर पर कारोबार कर रहा था। ऑल्टकॉइन बाजार में भी बिटकॉइन के दायरे में रहने का असर दिखा। इथेरियम 2,700 डॉलर के ऊपर सीमित दायरे में कारोबार करता दिखा, जबकि रिपल 1.50 डॉलर के महत्वपूर्ण स्तर के इर्द-गिर्द घूमता नजर आया।
यूरोपीय मोर्चे पर यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) के सामने एक जटिल मौद्रिक पहेली खड़ी हो गई है। सामान्य परिस्थितियों में जब मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य से लगभग दोगुनी रफ्तार से चल रही हो, तो इसका सीधा समाधान ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना होता है। लेकिन वर्तमान आर्थिक हालात सामान्य नहीं हैं। इस बार बॉन्ड बाजार पहले ही मौद्रिक सख्ती का एक बड़ा हिस्सा खुद कर चुका है, जिससे बॉन्ड यील्ड ऊंची हो गई है। इसके परिणामस्वरूप ECB के सामने नीतिगत फैसले लेने में एक बेहद कठिन दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है, जहां अतिरिक्त सख्ती अर्थव्यवस्था को जोखिम में डाल सकती है।

















