भारतीय सिनेमा के इतिहास में सीमा पर लड़े जाने वाले संघर्षों और सैन्य जीवन की भावुक सच्चाई को जिस संजीदगी से रूपहले पर्दे पर प्रस्तुत किया गया, उसमें निर्देशक जेपी दत्ता का योगदान बेहद खास माना जाता है। देश के सैन्य अभियानों पर केंद्रित गाथाओं को विशाल फलक पर आकार देने वाले इस फिल्मकार के रचना संसार की जड़ें किसी काल्पनिक कथा में नहीं, बल्कि सीधे उनके अपने परिवार की वास्तविक अनुभूतियों से जुड़ी हुई थीं। उनके निजी जीवन में फौजी परिवेश की सीधी मौजूदगी ने उनकी रचनात्मक दृष्टि को एक ऐसी दिशा दी, जिसने बड़े पर्दे पर राष्ट्रभक्ति के विमर्श को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।
सैन्य परिवेश और पारिवारिक पृष्ठभूमि से मिला प्रेरणा सूत्र
मुंबई में 3 अक्टूबर 1949 को जन्मे जेपी दत्ता को रचनात्मक संस्कार अपने घर से ही मिले थे। उनके पिता ओपी दत्ता हिंदी फिल्म जगत में एक प्रतिष्ठित लेखक के रूप में सक्रिय थे। इसके बावजूद जेपी दत्ता के सिनेमाई सफर को सबसे गहरा मोड़ उनके परिवार के रक्षा बलों के साथ प्रत्यक्ष संपर्क ने दिया। उनके छोटे भाई दीपक दत्ता भारतीय वायुसेना में सेवारत थे। जब 1971 का ऐतिहासिक युद्ध छिड़ा, तब दीपक दत्ता उस सैन्य संघर्ष का हिस्सा बने और उन्होंने पश्चिमी सीमा पर लोंगेवाला के मोर्चे पर सक्रिय भागीदारी निभाई थी।
उस दौर में जेपी दत्ता स्वयं कॉलेज में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे। जब रणभूमि से उनके अनुज सकुशल घर लौटे, तो उनके द्वारा साझा किए गए आंखों देखे विवरणों ने जेपी दत्ता के संवेदनशील मन पर गहरा असर डाला। उन रोमांचक और दिल दहला देने वाले संस्मरणों को उन्होंने एक साधारण रफ नोटबुक के पन्नों पर सहेजना शुरू कर दिया। जंग के उन तनावपूर्ण दिनों में घर का माहौल बेहद भावुक रहता था, जहां उनकी मां समाचार बुलेटिनों के जरिए अपने बेटे की खैरियत जानने के लिए लगातार रेडियो सेट के पास बैठी रहती थीं। परिवार के भीतर उपजी वही आशंका, प्रार्थनाएं और अपनों की सलामती का बेचैन इंतजार आगे चलकर उनकी संवेदनशील सिनेमाई सोच की सबसे मजबूत बुनियाद बने।
लोंगेवाला की दास्तान और रेगिस्तान में ऐतिहासिक फिल्मांकन
कॉलेज के दिनों में रफ कॉपी में दर्ज वही स्मृतियां वर्षों बाद 1997 में एक भव्य कृति के रूप में दर्शकों के सामने आईं। 1971 के लोंगेवाला मोर्चे पर लड़ी गई अभूतपूर्व लड़ाई को केंद्र में रखकर रची गई इस प्रस्तुति का पूरा ताना-बाना प्रामाणिक घटनाओं और वास्तविक सैन्य परिस्थितियों पर आधारित रखा गया था। इस परियोजना को रूपहले पर्दे पर जीवंत करना तकनीकी और शारीरिक दोनों स्तरों पर बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ।
थार के तपते और सर्द रेगिस्तान में दिसंबर की कंपकंपाती ठंड के बीच इस महागाथा की शूटिंग पूरी की गई थी। दृश्यों में युद्ध की वास्तविकता और व्यापकता दर्शाने के लिए लगभग 40 युद्धक टैंकों का इस्तेमाल हुआ, जबकि 1000 सैन्य जवानों की सीधी भागीदारी के साथ एक बहुत बड़ी प्रोडक्शन यूनिट ने विषम भौगोलिक परिस्थितियों में लगातार काम किया। जब यह प्रस्तुति सिनेमाघरों में पहुंची, तो इसने न केवल टिकट खिड़की पर इतिहास रचा, बल्कि इसे राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए प्रतिष्ठित नरगिस दत्त पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इसके साथ ही निर्देशक का नाम हमेशा के लिए भव्य सैन्य सिनेमा का पर्याय बन गया।
कारगिल से नाथू ला तक सैन्य गाथाओं का निरंतर विस्तार
सफलता के इस शिखर को छूने के बाद निर्देशक ने इस विधा को कई वर्षों तक आगे बढ़ाया। साल 1999 के कारगिल संघर्ष की जांबाजी को उन्होंने 'एलओसी कारगिल' में एक विशालकाय कलाकारों की टोली के साथ पर्दे पर उतारा। इसके बाद 1967 में हुए नाथू ला सैन्य टकराव की अनसुनी दास्तान को उन्होंने अपनी अगली परियोजना 'पलटन' का विषय बनाया। इस विशिष्ट विषय के चयन को लेकर उन्होंने साझा किया था कि नाथू ला की घटना आम जनमानस के बीच बहुत ज्यादा चर्चित नहीं थी, लेकिन सेना में मौजूद अपने संपर्कों और मित्रों से मिले ठोस विवरणों ने उन्हें इस ऐतिहासिक संघर्ष पर काम करने के लिए प्रेरित किया।
विविध शैलियों का सफर और निर्देशन में वापसी
सैन्य कथाओं के अलावा भी जेपी दत्ता ने अपने करियर में कई यादगार और असरदार फिल्मों का निर्माण किया था। उनके निर्देशन में बनी कृतियों में 'गुलामी', 'यतीम', 'बंटवारा', 'हथियार', 'क्षत्रिय', 'रिफ्यूजी' और 'उमराव जान' जैसी बहुचर्चित कृतियां शामिल रहीं, जिनमें ग्रामीण समाज, सामंती परिवेश और इंसानी रिश्तों के जटिल द्वंद्व देखने को मिले थे। वर्ष 2006 में 'उमराव जान' के प्रदर्शन के उपरांत उन्होंने एक लंबा अरसा निर्देशन की दुनिया से दूरी बनाए रखी। एक लंबे अंतराल को समाप्त करते हुए उन्होंने साल 2018 में 'पलटन' के जरिए पुनः निर्देशन की कमान संभाली, हालांकि यह परवर्ती रचना 1997 वाली अपनी पूर्ववर्ती युद्धगाथा जैसी ऐतिहासिक लोकप्रियता और प्रभाव को दोहराने में सफल नहीं हो सकी।



















