भारत में जल्द ही आपकी जेब में कागज की जगह प्लास्टिक की करेंसी आ सकती है। केंद्र सरकार ने 10 और 20 रुपये के पॉलिमर बैंकनोट के फील्ड ट्रायल के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह फैसला आम लोगों के रोजमर्रा के लेनदेन में इस्तेमाल होने वाले छोटे नोटों की सूरत बदल सकता है।
वित्त मंत्रालय ने सोमवार, 27 जुलाई को संसद में यह जानकारी दी। यह मंजूरी उन संकेतों के कुछ महीने बाद आई है, जब भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने सार्वजनिक रूप से इशारा किया था कि प्लास्टिक नोटों को चलन में लाने पर विचार चल रहा है।
रिज़र्व बैंक ने क्या प्रस्ताव रखा है
अपने केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर भारतीय रिज़र्व बैंक ने सिर्फ ट्रायल के लिए 10 और 20 रुपये के एक-एक अरब पॉलिमर नोट छापने का प्रस्ताव रखा है। बात सिर्फ परखने तक सीमित नहीं है। अगर फील्ड ट्रायल सफल रहता है, तो प्रस्ताव के तहत इन्हीं दो मूल्यों के पॉलिमर नोट नियमित रूप से जारी किए जाएंगे।
हालांकि यह पूरी कवायद अभी बेहद शुरुआती चरण में है। अधिकारियों के मुताबिक प्लास्टिक करेंसी को लेकर चर्चा अभी बिल्कुल प्रारंभिक स्तर पर है, यानी देशभर में इसे लागू करने को लेकर अभी कुछ भी तय नहीं हुआ है।
कागजी नोट कहीं नहीं जा रहे
जिन्हें यह डर है कि उनके जाने-पहचाने कागजी नोट अचानक गायब हो जाएंगे, वे निश्चिंत रहें। सरकार की कागजी करेंसी को पूरी तरह हटाने की कोई योजना नहीं है। 10 और 20 रुपये के पॉलिमर नोट मौजूदा कागजी नोटों की जगह लेने के बजाय उनके साथ-साथ चलन में रहेंगे।
2014 के बाद दूसरी कोशिश
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने प्लास्टिक करेंसी के बारे में सोचा हो। सरकार ने साल 2014 में भी पॉलिमर नोटों का ट्रायल तय किया था, लेकिन वह योजना जमीन पर नहीं उतर सकी। उस समय पांच शहरों कोच्चि, मैसूर, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर में 10 रुपये के एक अरब नोट परखने का इरादा था। लेकिन वह ट्रायल आखिरकार रोक दिया गया और यह विचार सालों तक ठंडे बस्ते में रहा। अब इसे दोबारा जिंदा किया गया है।
पॉलिमर क्यों, और यह है क्या
पॉलिमर नोट पारंपरिक करेंसी में इस्तेमाल होने वाले सूती कागज के बजाय एक पतली प्लास्टिक की परत से बनते हैं। सामग्री अलग होने के बावजूद ये कागजी नोटों की तरह ही बर्ताव करते हैं और हाथ में उतने ही लचीले रहते हैं। इनकी सबसे बड़ी खूबी है टिकाऊपन। ये गंदगी, नमी और फटने से बचे रहते हैं, जिसके चलते कागजी नोटों के मुकाबले चलन में कहीं ज्यादा समय तक टिकते हैं। इनमें नकल रोकने के लिए मजबूत सुरक्षा फीचर भी होते हैं, जिससे इनकी जालसाजी मुश्किल हो जाती है। रिज़र्व बैंक ने इनके इसी काफी लंबे जीवनकाल को बदलाव पर विचार की बड़ी वजह बताया है।
गवर्नर के पहले के संकेत
इस दिशा में जमीन काफी पहले से तैयार हो रही थी। जून में गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पत्रकारों को बताया था कि केंद्रीय बैंक चरणबद्ध तरीके से पॉलिमर करेंसी लाने पर विचार कर रहा है। 5 जून को उन्होंने साफ कहा था कि प्लास्टिक नोटों को चलन में लाने का प्रस्ताव अभी बहुत शुरुआती स्तर पर है, ताकि जल्दी किसी बड़े बदलाव की उम्मीद न बंधे।
छोटे नोट अब भी क्यों अहम हैं
भारत की एक बड़ी आबादी भले ही पूरी तरह डिजिटल भुगतान की ओर बढ़ चुकी हो, लेकिन नकदी का चलन अब भी खत्म नहीं हुआ है, खासकर छोटे नोटों का। दिलचस्प यह है कि 20 और 50 रुपये जैसे छोटे मूल्य के नोटों की मांग असल में बढ़ी है, और 10 रुपये के नोटों की जरूरत भी लगातार बनी हुई है। यही वजह है कि ट्रायल का निशाना 10 और 20 रुपये के नोट हैं, जो सड़क-बाजार के रोजमर्रा के लेनदेन की रीढ़ माने जाते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि देश में आज भी कितनी बड़ी मात्रा में नकदी घूम रही है। बीते एक साल में चलन में मौजूद करेंसी 11.5 फीसदी बढ़ी और रिकॉर्ड 42.86 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह आंकड़ा 15 मई को दर्ज किया गया। ऐसे में ज्यादा टिकाऊ नोट लंबे समय में छपाई और बदलाव पर आने वाली भारी लागत बचा सकते हैं। फिलहाल यह देखना बाकी है कि ट्रायल कब और कहां होगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले वक्त में आपकी जेब में एक अलग तरह का नोट पहुंच सकता है।



















