8वें वेतन आयोग के गठन के बाद से ही देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारी और पेंशनभोगी एक ही सवाल पर बात कर रहे हैं, सैलरी कितनी बढ़ेगी और जब बकाया पैसा एक साथ खाते में आएगा तो उस पर कितना टैक्स कटेगा। आयोग की सिफारिशें पूरी तरह अमल में आने पर खाते में आने वाली एकमुश्त रकम कई परिवारों के लिए बड़ी राहत साबित होगी, लेकिन इसी रकम के साथ टैक्स का एक उलझा हुआ गणित भी जुड़ जाता है। यही कारण है कि एरियर की खुशी मनाने से पहले हर कर्मचारी को यह समझना जरूरी है कि आयकर के नियम इस पर कैसे लागू होंगे।
एक साथ 24 महीने का एरियर कैसे बनता है
8वें वेतन आयोग का गठन नवंबर 2025 में हुआ था और इसकी सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से प्रभावी मानी जा रही हैं। फिलहाल सरकार इन सिफारिशों पर विचार कर रही है और अनुमान है कि इन्हें पूरी तरह लागू करने में 2027 तक का समय लग सकता है। प्रभावी होने की तारीख और असल में अमल में आने के बीच करीब 20 से 24 महीने का फासला बन सकता है। इसी देरी का नतीजा यह होगा कि जब नई सैलरी लागू होगी, तब कर्मचारियों को पिछले लगभग दो साल का बकाया वेतन यानी एरियर एकमुश्त चुकाया जाएगा। इतनी बड़ी रकम एक ही वित्तीय वर्ष में आने से उस साल की कुल आय अचानक ऊपर चढ़ जाएगी।
आय बढ़ते ही टैक्स स्लैब का खेल
TrendKia के विश्लेषण और वित्तीय जानकारों के मुताबिक, दो साल का बकाया एक साथ मिलने से कर्मचारी का पूरा टैक्स असेसमेंट प्रभावित हो सकता है। आयकर के नियम साफ कहते हैं कि एरियर की रकम उसी साल टैक्स के दायरे में आती है जिस साल वह हाथ में आती है। ऐसे में जब चालू वित्तीय वर्ष की नियमित आय में यह मोटी रकम जुड़ेगी, तो सालाना कुल आय एक बड़े आंकड़े को छू लेगी। इसका सीधा असर यह होता है कि कई कर्मचारी बिना किसी असल वेतन वृद्धि के भी ऊंचे टैक्स स्लैब में पहुंच जाते हैं और उस एक खास साल में उन पर सामान्य से कहीं ज्यादा टैक्स का बोझ आ जाता है।
सेक्शन 89(1) क्यों है राहत की चाबी
इसी असमानता को दूर करने के लिए आयकर कानून में सेक्शन 89(1) की व्यवस्था दी गई है। इस प्रावधान का मकसद यही सुनिश्चित करना है कि किसी कर्मचारी को सिर्फ इस वजह से अतिरिक्त टैक्स न भरना पड़े कि उसका पिछले सालों का पैसा देरी से और एक साथ मिला है। इस सेक्शन के तहत एरियर पर टैक्स की गणना उन्हीं पुराने सालों के आधार पर की जाती है जिनसे वह रकम वास्तव में जुड़ी होती है। इससे एकमुश्त भुगतान के कारण अचानक बढ़ने वाला वित्तीय बोझ काफी हद तक हल्का हो जाता है।
राहत का दावा करने की पूरी प्रक्रिया
इस छूट का फायदा लेने के लिए एक तय तरीका अपनाना पड़ता है। सबसे पहले कर्मचारी को उस वित्तीय वर्ष की टैक्स देनदारी निकालनी होती है जिसमें एरियर मिला है। इसके लिए पहले एरियर की रकम को आय में जोड़कर टैक्स निकाला जाता है और फिर वही रकम घटाकर दोबारा टैक्स निकाला जाता है। इन दोनों स्थितियों के टैक्स का अंतर नोट किया जाता है। ठीक यही प्रक्रिया उस पुराने वित्तीय वर्ष पर भी दोहराई जाती है जिससे एरियर असल में संबंधित है, यानी वहां भी रकम जोड़कर और घटाकर टैक्स का अंतर देखा जाता है।
अब दोनों अंतरों की तुलना होती है। अगर चालू साल का टैक्स अंतर पुराने साल के अंतर से ज्यादा निकलता है, तो कर्मचारी इस अतिरिक्त रकम पर राहत का दावा कर सकता है। यह पूरी राहत पाने के लिए केंद्रीय कर्मचारियों को अपना इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने से पहले ऑनलाइन फॉर्म 10E भरना अनिवार्य है। अगर यह फॉर्म नहीं भरा जाता, तो आयकर विभाग सेक्शन 89(1) के तहत किए गए छूट के दावे को स्वीकार नहीं करता, चाहे बाकी सारी गणना सही ही क्यों न हो।













