राजस्थान में अनार की बागवानी करने वाले किसानों को आर्थिक राहत देने और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित करने के उद्देश्य से एक नई तकनीकी पहल शुरू की गई है। कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर ने ग्रामीण युवाओं को अनार के पौधों की वैज्ञानिक कटाई-छंटाई का संस्थागत प्रशिक्षण देकर उन्हें दक्ष विशेषज्ञों के रूप में तैयार करने का काम शुरू किया है। इस विशेष अभियान का सीधा मकसद बाहरी राज्यों से आने वाले कुशल श्रमिकों पर किसानों की निर्भरता को समाप्त करना और राज्य के भीतर ही उन्नत कृषि सेवाएं विकसित करना है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस दूरदर्शी कदम से प्रदेश में अनार के उत्पादन और उसकी गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा, जिससे किसानों की शुद्ध आय में इजाफा होगा और राज्य कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा।
बाहरी राज्यों के श्रमिकों पर निर्भरता और अतिरिक्त लागत से मुक्ति
अब तक पश्चिमी राजस्थान में अनार की फसल के रख-रखाव और कटाई-छंटाई के लिए महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों से ठेके पर मजदूरों को बुलाना पड़ता था। दूसरे प्रदेशों से आने वाले ये विशेषज्ञ प्रति पौधा 20 से 30 रुपये तक का शुल्क लेते थे। हर साल मानसून की शुरुआत से पहले करोड़ों पौधों में प्रूनिंग की आवश्यकता होती है, जिसके कारण बागवानों को भारी-भरकम राशि मजदूरी के रूप में चुकानी पड़ती थी। स्थानीय स्तर पर हुनरमंद युवाओं की टीम तैयार होने से किसानों का यह अतिरिक्त वित्तीय बोझ काफी हद तक कम हो जाएगा। इसके साथ ही, स्थानीय रोजगार बढ़ने से कृषि से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा राज्य के भीतर ही बना रहेगा।
ड्रिप सिंचाई का विस्तार और पश्चिमी राजस्थान का अनार बेल्ट
आधुनिक सिंचाई प्रणालियों के प्रसार, विशेष रूप से ड्रिप सिंचाई के तेजी से अपनाए जाने के बाद से पश्चिमी राजस्थान के कृषि परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है। जोधपुर, जालोर, सिरोही, बाड़मेर, पाली और जैसलमेर जैसे शुष्क जिलों में अनार की खेती किसानों की आजीविका का मुख्य आधार बन चुकी है। इन सभी जिलों में फैले विशाल अनार के बागों में स्वस्थ फल प्राप्त करने के लिए हर साल मानसून से पहले वैज्ञानिक प्रूनिंग अनिवार्य होती है। सही समय और सही तकनीक से की गई कटाई-छंटाई पौधों को बीमारियों से बचाती है और फलों के आकार तथा रंग को बेहतर बनाती है।
वैज्ञानिक प्रूनिंग और रोग प्रबंधन का दिया गया प्रशिक्षण
कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर द्वारा आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में ग्रामीण युवाओं को व्यावहारिक और तकनीकी बारीकियों से रूबरू कराया गया। प्रशिक्षण सत्रों के दौरान युवाओं को पौधों की सही तरीके से कटाई करने, स्वस्थ शाखाओं का चयन करने, अनावश्यक टहनियों को हटाने, रोग प्रबंधन और बेहतर पैदावार सुनिश्चित करने के वैज्ञानिक तौर-तरीके सिखाए गए। इस संस्थागत प्रशिक्षण को पूरा करने के बाद कई युवाओं ने अपने स्वयं के खेतों में इन तकनीकों का सफल प्रयोग करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, ये युवा आसपास के अन्य किसानों के बागों में व्यावसायिक रूप से अपनी सेवाएं देकर अच्छी कमाई कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में कृषि-आधारित सेवा क्षेत्र को मजबूती मिल रही है।
किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में विश्वविद्यालय का विजन
विश्वविद्यालय की इस व्यावहारिक सोच पर प्रकाश डालते हुए कुलगुरु प्रो. डॉ. वी.एस. जैतावत ने स्पष्ट किया कि कृषि विश्वविद्यालय का ध्येय केवल प्रयोगशालाओं तक शोध को सीमित रखना नहीं है। विश्वविद्यालय की प्राथमिकता ऐसी उपयोगी तकनीकों को सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाना है, जिससे कृषि व्यवसाय अधिक से अधिक लाभकारी बन सके। उन्होंने बताया कि अनार प्रूनिंग प्रशिक्षण कार्यक्रम इसी सोच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। आने वाले समय में इस योजना का दायरा और बढ़ाया जाएगा ताकि अधिक से अधिक ग्रामीण युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ा जा सके और राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सके।



















