वर्ष 1947 में जब भारत आज़ाद हुआ, तब देश के सामने एक मजबूत आर्थिक आधार खड़ा करने की बहुत बड़ी चुनौती थी। शुरुआती दशकों में सीमित संसाधनों और विशाल आबादी की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाई गईं। उस समय कृषि पर अत्यधिक निर्भरता थी और औद्योगिक ढांचा काफी बुनियादी स्तर पर था। पिछले लगभग आठ दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने कई बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं। शुरुआती नीतिगत ढांचों से लेकर 1991 के ऐतिहासिक उदारीकरण और आधुनिक दौर के डिजिटल एवं विनिर्माण सुधारों तक, 10 ऐसे महत्वपूर्ण मील के पत्थर रहे हैं जिन्होंने भारत को दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों की कतार में ला खड़ा किया है।
1. औद्योगिक नीति और शुरुआती आर्थिक नियोजन (1948-1951)
आज़ादी मिलने के तुरंत बाद देश को एक ऐसी नीति की आवश्यकता थी जो बुनियादी उद्योगों की नींव रख सके। इस दिशा में वर्ष 1948 में पहली औद्योगिक नीति का खाका तैयार किया गया। इसमें अर्थव्यवस्था के भीतर सरकार और निजी क्षेत्र दोनों की जिम्मेदारियों और भूमिकाओं को रेखांकित किया गया। इसके बाद वर्ष 1951 में इंडस्ट्रीज (विकास एवं नियंत्रण) एक्ट लागू किया गया। इस कानून के तहत उद्योगों की स्थापना, विस्तार और संचालन के लिए सरकार से लाइसेंस लेना अनिवार्य बना दिया गया। शुरुआती पंचवर्षीय योजनाओं का मुख्य ध्यान बुनियादी ढांचे के निर्माण, बड़े बांधों, बिजली परियोजनाओं, भारी उद्योगों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को खड़ा करने पर केंद्रित रहा।
2. राष्ट्रीयकरण का दौर और बैंकिंग सेवाओं का विस्तार
आज़ादी के बाद के दशकों में सरकार ने अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभाव और नियंत्रण बढ़ाने की रणनीति अपनाई। इसका उद्देश्य वित्तीय सेवाओं को देश के आम नागरिक और ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाना था। इसी क्रम में वर्ष 1956 में जीवन बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण किया गया और भारतीय जीवन बीमा निगम का गठन हुआ। इसके बाद वर्ष 1969 में एक बड़ा कदम उठाते हुए 14 प्रमुख निजी वाणिज्यिक बैंकों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। वर्ष 1972 में जनरल इंश्योरेंस सेक्टर का राष्ट्रीयकरण हुआ, जबकि वर्ष 1980 में 6 अन्य बैंकों का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इन फैसलों से बैंकिंग और वित्तीय सेवाएं देश के दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचीं और छोटे बचतकर्ताओं का भरोसा बढ़ा।
3. हरित क्रांति से मिला कृषि क्षेत्र को नया जीवन
आज़ादी के बाद के शुरुआती दौर में भारत को गंभीर खाद्यान्न संकट और भुखमरी जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा था। इस संकट से उबरने के लिए 1960 के दशक के उत्तरार्ध में हरित क्रांति की शुरुआत हुई। कृषि क्षेत्र के इस सबसे बड़े बदलाव में उच्च उपज वाले उन्नत बीजों, आधुनिक सिंचाई तकनीकों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का सुनियोजित उपयोग शुरू किया गया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस क्रांति का असर सबसे ज्यादा देखा गया, जहां खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। हरित क्रांति का ही नतीजा है कि जो देश कभी अपनी खाद्य ज़रूरतों के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर था, वह आज आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त खाद्यान्न सहायता उपलब्ध करा रहा है।
4. लाइसेंस राज की चुनौतियां और लालफीताशाही
यद्यपि शुरुआती नीतियों का उद्देश्य देश के उद्योगों को सुरक्षा देना और आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण को रोकना था, लेकिन समय के साथ इस व्यवस्था ने गंभीर समस्याएं पैदा कर दीं। लाइसेंस राज के तहत नया उद्योग लगाने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने या कोई नया कारोबार शुरू करने के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे। परमिट, कोटा और बहुस्तरीय मंजूरी प्रक्रियाओं के कारण निर्णय लेने में देरी होने लगी। इस लालफीताशाही और नौकरशाही के सख्त रवैये ने घरेलू उद्यमशीलता और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को काफी नुकसान पहुंचाया।
5. 1991 का ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण (एलपीजी मॉडल)
वर्ष 1991 में भारत को अपने इतिहास के सबसे भीषण आर्थिक और विदेशी मुद्रा संकट का सामना करना पड़ा। देश का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि महज कुछ दिनों के आयात के लिए ही बचा था। ऐसी स्थिति में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के नेतृत्व में ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों की नींव रखी गई। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के सिद्धांत पर आधारित इन सुधारों के तहत लाइसेंस राज के शिकंजे को ढीला किया गया, आयात शुल्कों में कटौती की गई और विदेशी निवेश के दरवाजे खोले गए। सरकार ने बाजारों पर अपना सीधा नियंत्रण कम किया, जिससे निजी क्षेत्र को पंख मिले और भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने योग्य बनीं।
6. पूंजी बाजार का सुदृढ़ीकरण और सेबी की स्थापना
1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के साथ-साथ वित्तीय और पूंजी बाजार को पारदर्शी और मजबूत बनाने की दिशा में काम किया गया। वर्ष 1992 में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को वैधानिक शक्तियां देकर एक स्वायत्त नियामक के रूप में स्थापित किया गया। सेबी को शेयर बाजार की निगरानी, निवेशकों के हितों की सुरक्षा और कंपनियों द्वारा पूंजी जुटाने की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने के व्यापक अधिकार दिए गए। इसी दौर में बैंकिंग क्षेत्र में भी कई सुधार लागू किए गए, जिससे देश का वित्तीय ढांचा अधिक सुरक्षित और पेशेवर बन सका।
7. वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से एकीकृत कर व्यवस्था
वर्ष 2017 में लागू किया गया वस्तु एवं सेवा कर (GST) स्वतंत्रता के बाद का सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष कर सुधार माना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शुरू की गई इस प्रणाली ने देश भर में लागू दर्जनों जटिल और बहुस्तरीय अप्रत्यक्ष करों को समाप्त कर दिया। 'एक राष्ट्र, एक कर' के सिद्धांत पर आधारित जीएसटी ने राज्यों के बीच व्यापारिक बाधाओं को दूर किया। इससे कर प्रणाली अधिक पारदर्शी बनी, कर चोरी पर लगाम लगी और कारोबारियों के लिए अनुपालन प्रक्रियाएं पहले की तुलना में अधिक सरल हो गईं।
8. दिवालिया एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) 2016
बैंकिंग क्षेत्र में फंसे हुए कर्ज (एनपीए) और डूबती कंपनियों के समयबद्ध समाधान के लिए मोदी सरकार ने वर्ष 2016 में दिवालिया एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (IBC) लागू की। इससे पहले कंपनियों से फंसे हुए कर्ज की वसूली करना एक बेहद जटिल और वर्षों लंबी कानूनी प्रक्रिया हुआ करती थी। आईबीसी के आने से बैड लोन की वसूली और संकटग्रस्त परिसंपत्तियों के निपटान की एक पारदर्शी और तय समय-सीमा वाली व्यवस्था बनी। इसने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की सेहत सुधारने और कॉर्पोरेट अनुशासन कायम करने में गेमचेंजर की भूमिका निभाई।
9. आधार, जन धन और यूपीआई से डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार
आधुनिक दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर तकनीकी रूप से अग्रणी बनाने के लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास किया गया। इसकी शुरुआत आधार कार्ड के जरिए नागरिकों की बायोमेट्रिक पहचान बनाने से हुई। इसके बाद जन धन योजना के तहत करोड़ों असंगठित और गरीब लोगों के बैंक खाते खोले गए और उन्हें मोबाइल नंबरों से जोड़ा गया। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) के आगमन ने देश में डिजिटल भुगतानों की क्रांति ला दी। आज छोटे से छोटे व्यापारी से लेकर बड़े कॉर्पोरेट तक यूपीआई से लेनदेन कर रहे हैं। इस डिजिटल ढांचे ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) को सक्षम बनाकर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में बिचौलियों और लीकेज को पूरी तरह खत्म कर दिया।
10. प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) और मेक इन इंडिया
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने और घरेलू विनिर्माण को गति देने के लिए वर्ष 2020 में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना की शुरुआत की गई। इस नीति का उद्देश्य 'मेक इन इंडिया' अभियान को नई ऊर्जा देना है। पीएलआई योजना के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स और सोलर पैनल जैसे 14 महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत में उत्पादन बढ़ाने वाली कंपनियों को वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाता है। इस नीति ने विदेशी कंपनियों को भारत में विनिर्माण इकाइयां लगाने के लिए आकर्षित किया है और देश की आयात पर निर्भरता को कम करने में मदद की है।



















