ग्रामीण इलाकों में आजीविका चलाने का एक मजबूत माध्यम साबित हो रहा बकरी पालन केवल पशु खरीदने और बेचने का साधारण काम नहीं है। इस व्यवसाय में असली मुनाफा इस बात पर टिका होता है कि पशुओं की बिक्री कब की जाए, प्रजनन के लिए किसे रोका जाए और बाजार तक सीधी पहुंच कैसे बनाई जाए। बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ दुष्यन्त यादव का कहना है कि काम की शुरुआत करने वालों के लिए गर्भवती बकरियों का चुनाव करना एक अहम कदम होता है। ऐसी बकरियों को चुना जाना चाहिए जिनके प्रसव में करीब तीन से चार महीने का वक्त बचा हो।
नन्हे बच्चों के दुनिया में आने के बाद उनके खानपान, पोषण और तय समय पर लगने वाले टीकों का खास ध्यान रखना जरूरी होता है। किसी भी फार्म में अगर छोटे बच्चों के मरने की दर ज्यादा रहती है, तो उसका सीधा असर कुल कमाई पर पड़ता है। इसलिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और देखभाल के जरिए मृत्यु दर को नीचे लाना मुनाफे की तरफ बढ़ाया गया एक बड़ा कदम माना जाता है।
डॉ दुष्यन्त यादव के मुताबिक ब्लैक बंगाल जैसी नस्लों के बच्चे लगभग छह महीने के होने पर बेचने के लिए तैयार हो जाते हैं। वहीं बीटल जैसी नस्लों की बिक्री का वक्त उनके शारीरिक विकास और स्थानीय बाजार के हालात के आधार पर तय किया जाता है। छह महीने के स्वस्थ बच्चे को बेचने पर करीब 4,000 से 5,000 रुपये तक मिलने का अनुमान लगाया जाता है। अच्छे वजन और बढ़िया गुणवत्ता पाने के लिए पशुओं को कुछ अधिक समय तक पालने पर भी फायदा मिल सकता है।
अच्छे पशुओं को जल्दी बेचने से होता है नुकसान
इस कारोबार से जुड़े लोगों से अक्सर यह गलती हो जाती है कि वे शुरुआत में ही अपने सबसे बेहतरीन नर और मादा पशुओं को बाजार में बेच देते हैं। इससे भले ही हाथ में तुरंत कुछ पैसे आ जाएं, लेकिन आने वाले समय में फार्म की प्रजनन क्षमता और नस्ल की शुद्धता पर बुरा असर पड़ता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि लगभग 60 प्रतिशत बेहतरीन मादा पशुओं और 10 प्रतिशत चुनिंदा नर पशुओं को आगे की नस्ल बढ़ाने के लिए अपने पास ही रोक लेना चाहिए। उच्च गुणवत्ता वाले इन पशुओं से आने वाली पीढ़ियों की सेहत सुधरती है और फार्म की उत्पादकता लंबे वक्त तक बनी रहती है।
इनब्रीडिंग से बचना है बेहद जरूरी
लंबे समय तक एक ही नर बकरे से बच्चे पैदा कराने पर आपस में जुड़े पशुओं के बीच प्रजनन यानी इनब्रीडिंग का जोखिम काफी बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में नवजात बच्चों के विकास, उनकी सेहत और आगे चलकर प्रजनन की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इस समस्या से बचने के लिए प्रजनन के काम आने वाले नर बकरों को डेढ़ से दो साल के अंतराल पर बदलते रहना चाहिए या किसी दूसरे असंबंधित नर का उपयोग करना चाहिए।
डॉक्टर की सलाह बचाती है बड़ा खर्च
बकरी पालन के दौरान बीमारियों की समय पर पहचान, सही टीकाकरण, पेट के कीड़े मारने की दवा का इस्तेमाल और संतुलित आहार देना बहुत मायने रखता है। संचालकों को हमेशा अपने इलाके के पशु चिकित्सक के संपर्क में रहना चाहिए ताकि किसी भी बीमारी का तुरंत पता चल सके। ऐसा करने से पशुओं की अचानक मौत और उनके इलाज में होने वाले फालतू खर्चों पर लगाम लगाई जा सकती है। इस पूरे कारोबार का मूल मंत्र यही है कि फालतू खर्चों को काबू में रखते हुए लागत और मुनाफे के बीच संतुलन बनाकर रखा जाए।
मीट दुकानों से लेकर डेयरी तक बनाएं बाजार
उत्पादन के साथ-साथ सही मार्केटिंग भी इस व्यवसाय की सफलता की कुंजी है। यदि फार्म चलाने वाले लोग केवल बिचौलियों पर टिके रहते हैं, तो उन्हें कई बार मेहनत के मुताबिक सही दाम नहीं मिल पाते हैं। इसके बजाय स्थानीय मांस विक्रेताओं, पशु व्यापारियों, होटल संचालकों और सीधे ग्राहकों से संबंध बनाना ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। ईद और दूसरे खास त्योहारों के दिनों में अच्छे नर बकरों की मांग बाजार में काफी बढ़ जाती है। इसके अलावा उन्नत नस्ल के प्रजनक नर और मादा पशुओं को बेचकर भी अतिरिक्त आमदनी कमाई जा सकती है। जहां स्थानीय स्तर पर मांग अच्छी हो, वहां दूध को डेयरी या अन्य प्रोसेसिंग यूनिट तक पहुंचाने की संभावनाएं भी टटोली जा सकती हैं।
छोटी रणनीतियों से खड़ा होता है बड़ा कारोबार
इस काम को एक सफल व्यवसाय का रूप देने के लिए सही नस्ल चुनने से लेकर वैज्ञानिक तरीके से प्रजनन कराने, बच्चों की देखभाल करने और बाजार से सीधा तालमेल बिठाने जैसे सभी पहलुओं पर एक साथ मेहनत करनी होगी। बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों से तकनीकी मार्गदर्शन लेकर किसान और नए उद्यमी वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपने फार्म पर आसानी से लागू कर सकते हैं।


















