सोने, चांदी और जरूरी दस्तावेजों को घरों के मुकाबले अधिक सुरक्षित मानकर बड़ी संख्या में लोग बैंकों की सेफ डिपॉजिट सुविधा का सहारा लेते हैं। इस तिजोरी सेवा के बदले वित्तीय संस्थान नियमित अंतराल पर तय शुल्क भी वसूलते हैं। फिर भी यह सवाल अक्सर उठता है कि यदि किसी अप्रत्याशित घटना या सेंधमारी में लॉकर के भीतर रखी मूल्यवान संपत्ति गायब हो जाए, तो क्या संस्थान उस पूरे नुकसान की भरपाई करेगा। हकीकत यह है कि सामान्य बैंकिंग शर्तों के तहत ग्राहक को समूचे मूल्य की सीधी भरपाई नहीं मिलती, बल्कि इसके लिए सख्त विनियामक दायरे तय किए गए हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक का मुआवजा फार्मूला और शुल्क की गणना
केंद्रीय बैंकिंग नियामक द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के मुताबिक, यदि संस्थागत चूक, आगजनी, इमारत ढहने अथवा बैंक कर्मियों की मिलीभगत के चलते लॉकर में रखे सामान का नुकसान होता है, तो बैंक की जवाबदेही सीमित रहती है। ऐसे हालात में संस्थान को उस लॉकर के वार्षिक किराये का अधिकतम सौ गुना तक ही हर्जाना देने के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।
इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी उपभोक्ता ने अपनी तिजोरी में पचास लाख रुपये मूल्य का स्वर्ण आभूषण संजोकर रखा है और वह प्रति वर्ष पांच हजार रुपये बतौर लॉकर रेंट अदा करता है। यदि बैंक की गलती से वह सामान गायब हो जाता है, तो गणना के आधार पर संस्थान ग्राहक को सालाना शुल्क का सौ गुना यानी केवल पांच लाख रुपये तक अदा करने के लिए बाध्य होगा। बैंक शेष पैंतालीस लाख रुपये के नुकसान की सीधी जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेते हैं।
आठ वर्ष तक चली अदालती जंग और उपभोक्ता आयोग का कड़ा फैसला
नियमों की इस तकनीकी सीमा के बावजूद यदि प्रबंधन की गंभीर विफलता साबित हो जाए, तो न्यायिक मंच संस्थान को पूरा हर्जाना देने पर विवश कर सकते हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ऐसा ही एक विवाद सामने आया था, जिसमें मोनिका नाम की एक उपभोक्ता ने अपने ससुर के साथ मिलकर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की शाखा में साझा लॉकर ले रखा था। उस तिजोरी में लगभग सैंतालीस लाख रुपये की ज्वेलरी रखी गई थी।
वर्ष 2018 के सितंबर महीने में जब खाताधारक अपनी सामग्री निकालने शाखा पहुंचीं, तो लॉकर का बक्सा पूरी तरह रिक्त पाया गया। शाखा के अधिकारी इस अचानक गायब हुए सामान के संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं कर सके। इसके बाद पीड़ित पक्ष ने न्याय के लिए कानूनी रास्ता चुना और आठ साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया के उपरांत दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ग्राहक के हित में निर्णायक निर्णय सुनाया।
आयोग की अध्यक्ष जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल तथा सदस्य बिमला कुमारी की पीठ ने यह माना कि शाखा अपने ग्राहक के लॉकर खाते का सही प्रबंधन सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम रही। पीठ ने यह भी स्पष्ट रेखांकित किया कि वित्तीय संस्थान तिजोरी में रखे सैंतालीस लाख रुपये के आभूषणों की हिफाजत करने में विफल रहा है। इसी आधार पर फोरम ने निर्देश दिया कि गायब जेवरात की पूरी कीमत पर अठारह प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज जोड़कर उपभोक्ता को लौटाया जाए। इसके अलावा मानसिक उत्पीड़न के मद में एक लाख रुपये और अदालती खर्चे के एवज में पचास हजार रुपये का अतिरिक्त भुगतान करने का भी आदेश दिया गया।
खातों और जमा पूंजी पर बीमा सुरक्षा की वास्तविक सीमा
लॉकर के अतिरिक्त साधारण बचत खाते, सावधि जमा यानी एफडी और आवर्ती जमा यानी आरडी जैसी पारंपरिक बचत योजनाओं में भी सुरक्षा की एक अधिकतम सीमा निर्धारित होती है। जमा संवर्धन एवं ऋण गारंटी निगम जिसे डीआईसीजीसी कहा जाता है, प्रत्येक खाताधारक को अधिकतम पांच लाख रुपये तक का बीमा आवरण प्रदान करता है।
इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि किसी बैंक में ग्राहक के चाहे जितने भी लाख रुपये जमा हों, संस्थान के दिवालिया होने या किसी बड़ी विफलता की स्थिति में केवल पांच लाख रुपये तक की ही गारंटीशुदा सुरक्षा प्राप्त होती है। इस प्रकार चाहे नकदी जमा का मामला हो या लॉकर में रखी संपदा का, बैंकिंग प्रणाली स्वतः पूरे नुकसान की गारंटी नहीं देती, जब तक कि उपभोक्ता फोरम जैसी स्वतंत्र अदालतें संस्थागत लापरवाही पर विशेष आदेश पारित न कर दें।

















