फूलों की खेती करने वाले किसानों के लिए सिंचाई का तरीका बदलना फायदे का सौदा साबित हो सकता है। पारंपरिक तरीके से सिंचाई करने वाले किसान अक्सर फूलों में लगने वाले कीड़ों को समय रहते पहचान नहीं पाते, क्योंकि शुरुआत में नुकसान दिखता ही नहीं और जब तक पता चलता है तब तक पूरी फसल खराब हो चुकी होती है। इस नुकसान से बचने के लिए किसान बार बार कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करते हैं, जिससे खेती की कुल लागत लगातार बढ़ती जाती है। फिरोजाबाद में किसानों को अब मिनी फब्बारा यानी मिनी स्प्रिंकलर सिस्टम अपनाने की सलाह दी जा रही है, जिससे फूलों की फसल को रोगों से बचाया जा सकता है, लागत घट सकती है और दवाओं पर निर्भरता भी काफी हद तक कम हो सकती है।
बरसात जैसा असर देता है यह सिस्टम
कृषि विभाग के इंजीनियर अतुल कुमार के मुताबिक, फूलों की खेती में किसान अक्सर रोग और कीड़ों को लेकर परेशान रहते हैं और फूल आने के समय तरह तरह की कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा फूलों की पौध लगाने के बाद पूरे सीजन खेत में बार बार सिंचाई की भी जरूरत पड़ती है, जिससे मेहनत और पानी दोनों का खर्च बढ़ जाता है। अतुल कुमार ने बताया, "फूलों की खेती के दौरान किसान भाई रोगों और कीड़ों को लेकर काफी परेशान रहते हैं।" उनके मुताबिक, इन सभी दिक्कतों से बचने और कम लागत में अच्छी उपज लेने के लिए मिनी फब्बारे का इस्तेमाल एक कारगर विकल्प है। यह असल में एक मिनी स्प्रिंकलर सिस्टम है जो खेत में ठीक बरसात की तरह बूंद बूंद पानी बरसाता है, जिससे पूरे खेत की सिंचाई एक साथ और एक समान तरीके से हो जाती है। किसान चाहें तो अलग अलग हिस्सों में पानी देने के बजाय कई एकड़ खेत में एक ही समय पर बराबर मात्रा में पानी दे सकते हैं। अतुल कुमार के मुताबिक फूलों में रोग लगने की एक बड़ी वजह पौधों के ऊपर समय के साथ जमा होने वाली गंदगी होती है। मिनी फब्बारे से हर बार पौधे की ऊपर से नीचे तक अच्छी तरह धुलाई हो जाती है, इसलिए गंदगी जमा ही नहीं हो पाती और शुरुआत में ही रोग लगने की आशंका खत्म हो जाती है। नतीजा यह होता है कि किसानों का दवाओं पर होने वाला खर्च कम होता है और साथ ही पैदावार में भी बढ़ोतरी होती है।
15 से 18 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर आएगा खर्च, सब्सिडी भी मिलेगी
अतुल कुमार के अनुसार इस सिस्टम को खेत में लगवाने पर किसानों को करीब 15 से 18 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर का खर्च उठाना पड़ता है, जिसमें पूरे खेत के लिए जरूरी स्प्रिंकलर सेटअप शामिल होता है। हालांकि यह पूरी रकम किसान को खुद नहीं भरनी पड़ती, क्योंकि उद्यान विभाग की ओर से मिनी फब्बारा लगवाने पर खास तौर पर सब्सिडी भी दी जाती है। इस योजना के तहत किसान को कुल लागत का सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा ही अपनी जेब से देना होता है, जबकि बाकी 80 से 90 प्रतिशत रकम उद्यान विभाग की तरफ से सब्सिडी के रूप में दी जाती है। यानी बेहद कम शुरुआती निवेश में किसान अपने खेत में यह सिस्टम लगवा सकते हैं और लंबे समय तक कीटनाशक दवाओं के खर्च और बार बार की मैनुअल सिंचाई की मेहनत से भी छुटकारा पा सकते हैं।



















