उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में आलू की खेती करने वाले किसान इस समय एक गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। आमतौर पर फिरोजाबाद के किसान बड़े पैमाने पर आलू उगाकर अच्छा मुनाफा कमाते हैं, लेकिन इस बार हालात बिल्कुल विपरीत हैं। फसल तैयार होने के बाद बाजार में मिल रहे दाम इतने कम हैं कि किसानों के लिए अपनी बुनियादी लागत निकालना भी नामुमकिन हो गया है। इस निराशाजनक स्थिति के बीच, नुकसान से बचने के लिए किसानों ने अपने आलू को कोल्ड स्टोरेज यानी शीतगृहों में जमा करना शुरू कर दिया है। किसान इस उम्मीद में दिन काट रहे हैं कि आने वाले समय में शायद कीमतों में कुछ सुधार होगा और वे अपनी मेहनत की कमाई का कम से कम लागत मूल्य तो वसूल पाएंगे। हालांकि, कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने के बाद भी उनके मुनाफे और नुकसान का गणित काफी उलझ गया है, क्योंकि वहां भी अतिरिक्त खर्च बढ़ रहा है।
खेती से लेकर कोल्ड स्टोरेज तक का खर्च और घटता मुनाफा
फिरोजाबाद के खेड़ा गनेशपुर गांव के निवासी राकेश कुमार ने खेती की इस बदलती और चुनौतीपूर्ण स्थिति को करीब से देखा है। वह पिछले कई वर्षों से लगातार आलू की खेती कर रहे हैं। उनसे पहले उनके पिता इस पारंपरिक खेती को संभालते थे, और अब इसकी जिम्मेदारी राकेश के कंधों पर है। राकेश कुमार का कहना है कि पहले के समय में आलू की खेती में एक अच्छी और संतोषजनक बचत हो जाती थी, लेकिन अब यह काम फायदे का सौदा नहीं रह गया है। खेत की जुताई करने से लेकर आलू को कोल्ड स्टोरेज तक सुरक्षित पहुंचाने के सफर में भारी-भरकम राशि खर्च होती है। इस पूरी प्रक्रिया में जमीन तैयार करना, बीज की बुवाई करना, समय पर सिंचाई की व्यवस्था करना, फसल की खुदाई और इस दौरान लगने वाली मजदूरों की दिहाड़ी जैसे कई खर्चे शामिल हैं। इसके अलावा खेतों में डाली जाने वाली रासायनिक खादों की कीमत भी लगातार बजट बढ़ा रही है। राकेश कुमार के पास कुल चालीस बीघा कृषि भूमि है, जिसमें प्रति बीघा औसतन 40 से 50 पैकेट आलू की पैदावार होती है। इन सभी खर्चों को जोड़ने के बाद, एक पैकेट आलू को कोल्ड स्टोरेज तक पहुंचाने में लगभग 400 रुपये का खर्च आ जाता है।
बाजार में मंदी और कोल्ड स्टोरेज का अतिरिक्त किराया
इलाके के एक अन्य किसान अमित कुमार ने क्षेत्र में उगाई जाने वाली आलू की किस्मों और उनकी बाजार कीमतों पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि फिरोजाबाद और उसके आसपास के क्षेत्रों में 3797 नामक आलू की वैरायटी सबसे अधिक मात्रा में उगाई जाती है। इस बार बाजार में आलू के दाम इतने गिर चुके हैं कि किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। वर्तमान समय में किसानों को अपनी फसल मात्र 100 रुपये से लेकर 350 रुपये प्रति पैकेट के बेहद कम दाम पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। जब कुल उत्पादन लागत ही 400 रुपये प्रति पैकेट बैठती है, तो इतने कम दाम पर बेचना सीधे तौर पर आर्थिक तबाही जैसा है। इसके अलावा, जो किसान अपनी फसल को तुरंत बेचने के बजाय कोल्ड स्टोरेज में रख रहे हैं, उन्हें वहां भी अतिरिक्त भाड़ा चुकाना पड़ रहा है। कोल्ड स्टोरेज का यह किराया लगभग 150 रुपये प्रति कुंतल तक है, जो पहले से ही कर्ज और घाटे में डूबे किसानों पर एक और बड़ा वित्तीय बोझ डाल रहा है।
मजबूरी में कोल्ड स्टोरेज का सहारा और सरकारी सब्सिडी की स्थिति
क्षेत्र के ही आलू उत्पादक किसान देवेन्द्र कुमार ने भी इस विकट परिस्थिति पर अपनी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि आज आलू उत्पादक किसान पूरी तरह से बेबस और परेशान हैं। बाजार में जब आलू का भाव महज 100 रुपये प्रति पैकेट तक गिर गया है, तो किसानों के पास अपनी फसल को कोल्ड स्टोरेज में डंप करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। देवेन्द्र कुमार ने अपनी पूरी फसल को इसी उम्मीद में कोल्ड स्टोरेज में छोड़ दिया है कि शायद आने वाले महीनों में बाजार में सुधार होगा। यदि कीमतें नहीं बढ़ीं, तो इस क्षेत्र के किसानों को एक असहनीय वित्तीय झटका लगेगा जिससे उबर पाना बहुत मुश्किल होगा। इस संकट के बीच राहत की एक किरण सरकार की तरफ से आई है। कोल्ड स्टोरेज में काम करने वाले सूत्रों के अनुसार, सरकार ने आलू किसानों की मदद के लिए एक विशेष योजना शुरू की है। इस योजना के तहत शीतगृहों के किराए पर किसानों को 100 रुपये प्रति कुंतल की सब्सिडी दी जा रही है। किसानों का मानना है कि इस सब्सिडी से किराए के मोर्चे पर थोड़ी बहुत राहत तो जरूर मिलेगी, लेकिन इस संकट का स्थायी समाधान तभी संभव है जब सरकार बाजार में आलू का एक उचित और लाभकारी न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित करे, ताकि किसानों को अपनी मेहनत का पूरा फल मिल सके।



















