बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के काम करने के ढीले रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब कोई कारोबारी संस्था तय कमियों को दूर कर लेती है, उसके बावजूद भी उसके लाइसेंस निलंबन को लटकाए रखना बेहद गंभीर और गैर-जिम्मेदाराना है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और न्यायाधीश गौतम ए. अनखड की पीठ ने इस प्रशासनिक सुस्ती पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी अधिकारियों की इस तरह की लापरवाही की वजह से व्यापार जगत को केवल आर्थिक चपत ही नहीं लगती, बल्कि वहां काम करने वाले कर्मचारियों की रोजी-रोटी और पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर भी बुरा असर पड़ता है।
पुणे की डेयरी कंपनी की अर्जी पर सुनवाई
अदालत की यह कड़ी फटकार पुणे स्थित 'सिद्धार्थ एग्रो' नाम की एक कंपनी की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। यह संस्थान डेयरी उत्पादों और पशुओं के चारे के निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। मामला 15 जुलाई को शुरू हुआ था, जब FDA के निरीक्षकों ने कंपनी के परिसर में औचक निरीक्षण किया था। इस जांच के तुरंत बाद खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के प्रावधानों के कथित उल्लंघन का हवाला देते हुए सिद्धार्थ एग्रो के खाद्य लाइसेंस को तुरंत निलंबित कर दिया गया था।
कार्रवाई के बाद कंपनी ने उठाई गई सभी आपत्तियों का निवारण करने का दावा किया और प्रशासन से नए सिरे से निरीक्षण करने की मांग की। हालांकि, जब FDA की टीम ने 29 जुलाई को दोबारा संस्थान का जायजा लिया, तो अधिकारियों का तर्क था कि परिसर में अब भी कई खामियां बनी हुई हैं। इसी आधार पर अधिकारियों ने लाइसेंस के निलंबन आदेश को वापस लेने या रद्द करने से साफ इनकार कर दिया, जिसके बाद सिद्धार्थ एग्रो को न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
अदालत का नया निरीक्षण और रिपोर्ट देने का निर्देश
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के उपरांत बॉम्बे हाईकोर्ट ने FDA प्रशासन को व्यावहारिक रुख अपनाने का निर्देश दिया। पीठ ने अधिकारियों को 31 अगस्त को कंपनी परिसर का एक नया और निष्पक्ष निरीक्षण आयोजित करने का आदेश दिया। इसके साथ ही अदालत ने यह भी तय किया कि इस नए निरीक्षण के आधार पर नियमों के पालन की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि निरीक्षण संपन्न होने के बाद अधिकारियों को ऑटो-जनरेटेड रिपोर्ट की एक कॉपी तुरंत याचिकाकर्ता कंपनी को सौंपनी होगी। इस दस्तावेज़ में कंपनी द्वारा नियमों का पालन किए जाने से जुड़े पूरे अंक और प्रतिशत का साफ-साफ विवरण होना अनिवार्य किया गया, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
'अदालतों पर बेवजह केस का बोझ न बढ़ाएं'
मामले में सुनवाई के दौरान पीठ ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि प्रशासनिक स्तर पर कमियां दूर किए जाने के बावजूद कंपनियों को अपने लाइसेंस के निलंबन या रद्दीकरण की कार्रवाई झेलनी पड़ती है। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि किसी कारोबारी को एक ऐसे आदेश को निरस्त कराने के लिए कोर्ट आने पर मजबूर करना बिल्कुल अनुचित है, जो व्यावहारिक रूप से प्रभावी ही नहीं रह गया है।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि इस प्रकार की अनावश्यक मुकदमेबाजी से पूरी तरह बचा जा सकता है, क्योंकि यह न केवल पीड़ित व्यवसायियों के लिए वित्तीय संकट पैदा करती है बल्कि न्यायपालिका के ऊपर भी फालतू मुकदमों का बोझ बढ़ाती है। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि जो संस्थान नियमों के तहत अपनी सभी कमियों को ठीक कर चुके हैं, उन्हें सरकारी तंत्र की निष्क्रियता और ढिलाई की वजह से और ज्यादा प्रताड़ित या सजा नहीं दी जानी चाहिए।
सुधार के बाद स्वतः निरस्त होगा सस्पेंशन आदेश
नियामक प्रणाली को अधिक न्यायसंगत, प्रभावी और सुव्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से हाईकोर्ट ने पूरे राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किया। अदालत ने व्यवस्था दी कि उन सभी मामलों में, जहां कंपनियां बताई गई खामियों को दूर कर लेती हैं, वहां लाइसेंस निलंबन के आदेश को तुरंत प्रभाव से समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
सिद्धार्थ एग्रो के मामले का निपटारा करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि जैसे ही नियमों के अनुपालन की पुष्टि करने वाली ऑटो-जनरेटेड रिपोर्ट सामने आएगी, कंपनी के खिलाफ जुलाई में जारी किया गया सस्पेंशन ऑर्डर अपने आप निरस्त माना जाएगा, बशर्ते कंपनी कानूनी मानकों का पूरी तरह पालन कर रही हो। इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने FDA अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे कंपनी को बार-बार अदालत आने के लिए बाध्य किए बिना, औपचारिक आदेश जारी करने सहित सभी आवश्यक प्रशासनिक कदम तुरंत पूरे करें।



















