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टोंक से आए 1000 ट्रैक्टर रीपर, अलवर में बाजरे की कटाई महज एक घंटे में एक बीघाराजस्थान
8 सित॰ 2026, 1:54 pm (1 घंटे पहले)· 2

टोंक से आए 1000 ट्रैक्टर रीपर, अलवर में बाजरे की कटाई महज एक घंटे में एक बीघा

बारिश की आशंका के बीच मजदूरों की कमी से जूझ रहे अलवर के किसानों ने टोंक से आईं करीब 1000 ट्रैक्टर रीपर मशीनों का सहारा लिया है, जो एक घंटे में एक बीघा बाजरा काट रही हैं।

राजस्थान के अलवर और खैरथल-तिजारा जिले में इन दिनों बदलते मौसम ने किसानों की नींद उड़ा रखी है। बाजरे की फसल पककर तैयार खड़ी है और बारिश की आशंका के चलते हर कोई जल्द से जल्द अपने खेत समेटने में जुटा है। लेकिन एक साथ शुरू हुई कटाई ने मजदूरों की भारी कमी पैदा कर दी, जिससे फसल मंडी तक पहुंचाने में भी देरी होने लगी। इस मुश्किल से निकलने के लिए इलाके के किसानों ने अब आधुनिक मशीनों का रुख कर लिया है और उनकी मजदूरों पर निर्भरता काफी कम हो गई है।

टोंक से पहुंचे करीब 1000 ट्रैक्टर रीपर

हाल ही में राजस्थान के टोंक जिले से करीब 1000 ट्रैक्टर रीपर मशीनें अलवर पहुंची हैं और बाजरे की कटाई में जुट गई हैं। ये मशीनें न सिर्फ कटाई की रफ्तार बढ़ा रही हैं, बल्कि किसानों की लागत भी घटा रही हैं। टोंक जिले के मालपुर से अपना ट्रैक्टर लेकर अलवर पहुंचे संजय गुर्जर ने बताया कि उनके साथ टोंक से करीब 1000 ट्रैक्टर अलवर जिले में आए हैं और फिलहाल सभी बाजरे की कटाई के काम में लगे हैं। किसानों की फसल जल्दी काटने के बदले वह प्रति बीघा ₹1300 से ₹1500 रुपए लेते हैं।

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एक घंटे में एक बीघा, दस मजदूरों का काम अकेले

राजेंद्र चौधरी ने बताया कि बारिश का मौसम होने की वजह से किसान जल्दी-जल्दी बाजरे की कटाई में जुटे हैं और ट्रैक्टर से चलने वाली यह रीपर मशीन एक घंटे में एक बीघा खेत की कटाई पूरी कर दे रही है। उन्होंने बताया कि सामान्य तरीके से खेत में 10 मजदूर लगाने पर किसानों को करीब ₹10000 रुपए तक का खर्च उठाना पड़ता है, जबकि यही काम अकेली मशीन कम समय और कम बजट में निपटा दे रही है।

इससे किसानों के पैसे और समय, दोनों की बचत हो रही है। एक रीपर मशीन एक घंटे में एक बीघा खेत की कटाई कर सकती है और इसी रफ्तार व दक्षता ने किसानों की बड़ी परेशानी दूर कर दी है।

बाजरे के अलावा कई फसलों में काम आती है यह मशीन

रीपर मशीन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसका इस्तेमाल सिर्फ बाजरे तक सीमित नहीं है। यह ज्वार, ग्वार और तिल जैसी खरीफ फसलों के साथ-साथ गेहूं जैसी रबी फसल की कटाई में भी उतनी ही कारगर साबित होती है। यही बहुमुखी प्रतिभा और किफायती लागत इसे किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय बना रही है और आने वाले समय में इसकी मांग और बढ़ने के आसार हैं।

सवाल-जवाब

अलवर में बाजरे की कटाई के दौरान मजदूरों की कमी क्यों हुई?
मौसम बदलने से इलाके में एक साथ फसल पककर तैयार हो गई और बारिश की आशंका के चलते सभी किसान एक साथ कटाई में जुट गए, जिससे मजदूरों की मांग अचानक बढ़ गई।
अलवर में कितने ट्रैक्टर रीपर मशीनें पहुंची हैं?
राजस्थान के टोंक जिले से करीब 1000 ट्रैक्टर रीपर मशीनें अलवर पहुंची हैं।
रीपर मशीन एक बीघा खेत काटने में कितना समय लेती है?
एक रीपर मशीन एक बीघा खेत की कटाई करीब एक घंटे में पूरी कर देती है।
रीपर मशीन से कटाई कराने पर किसानों को कितना खर्च आता है?
किसानों को प्रति बीघा करीब ₹1300 से ₹1500 रुपए देने पड़ते हैं।
10 मजदूरों से कटाई कराने पर कितना खर्च आता था?
10 मजदूरों से एक खेत की कटाई कराने पर किसानों को करीब ₹10000 रुपए तक का खर्च उठाना पड़ता।
संजय गुर्जर कहां से ट्रैक्टर लेकर अलवर पहुंचे हैं?
संजय गुर्जर टोंक जिले के मालपुर से अपना ट्रैक्टर लेकर अलवर पहुंचे हैं।
क्या रीपर मशीन सिर्फ बाजरे के लिए ही उपयोगी है?
नहीं, यह ज्वार, ग्वार, तिल जैसी खरीफ फसलों के साथ-साथ गेहूं जैसी रबी फसल की कटाई में भी उतनी ही असरदार है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·17 मिनट पहले

अलवर में बेमौसम बारिश के खतरे के बीच टोंक से आए एक हजार ट्रैक्टर रीपर्स का उपयोग कृषि क्षेत्र में बढ़ती मशीनीकरण की अनिवार्यता को दर्शाता है। एक घंटे में एक बीघा कटाई और पारंपरिक श्रम लागत में भारी कमी यह साबित करती है कि जलवायु अनिश्चितता के दौर में तकनीक ही किसानों की सबसे बड़ी ढाल बन रही है। भविष्य में कृषि श्रम संकट से निपटने के लिए इस तरह के अंतर-जिला मशीनरी सहयोग और कस्टम हायरिंग मॉडल को संस्थागत रूप देने की जरूरत होगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·17 मिनट पहले

मौसम की मार और समय पर मजदूर न मिलने से फसलों के खराब होने का जो संकट खड़ा होता है, वह कई बार किसानों को भारी कर्ज और आर्थिक अपराधों या धोखाधड़ी जैसी स्थितियों की तरफ धकेल देता है। हालांकि इस बार टोंक से आए एक हजार ट्रैक्टर रीपर्स ने उस संकट को टाल दिया है और किसानों को राहत दी है, लेकिन भविष्य में ऐसे बड़े पैमाने पर होने वाले अंतर-जिला तकनीकी पलायन और वाणिज्यिक लेन-देन को सुरक्षित व पारदर्शी बनाने के लिए मजबूत नियामक और प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता होगी ताकि किसी भी तरह के स्थानीय विवाद से बचा जा सके।

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