राजस्थान के अलवर और खैरथल-तिजारा जिले में इन दिनों बदलते मौसम ने किसानों की नींद उड़ा रखी है। बाजरे की फसल पककर तैयार खड़ी है और बारिश की आशंका के चलते हर कोई जल्द से जल्द अपने खेत समेटने में जुटा है। लेकिन एक साथ शुरू हुई कटाई ने मजदूरों की भारी कमी पैदा कर दी, जिससे फसल मंडी तक पहुंचाने में भी देरी होने लगी। इस मुश्किल से निकलने के लिए इलाके के किसानों ने अब आधुनिक मशीनों का रुख कर लिया है और उनकी मजदूरों पर निर्भरता काफी कम हो गई है।
टोंक से पहुंचे करीब 1000 ट्रैक्टर रीपर
हाल ही में राजस्थान के टोंक जिले से करीब 1000 ट्रैक्टर रीपर मशीनें अलवर पहुंची हैं और बाजरे की कटाई में जुट गई हैं। ये मशीनें न सिर्फ कटाई की रफ्तार बढ़ा रही हैं, बल्कि किसानों की लागत भी घटा रही हैं। टोंक जिले के मालपुर से अपना ट्रैक्टर लेकर अलवर पहुंचे संजय गुर्जर ने बताया कि उनके साथ टोंक से करीब 1000 ट्रैक्टर अलवर जिले में आए हैं और फिलहाल सभी बाजरे की कटाई के काम में लगे हैं। किसानों की फसल जल्दी काटने के बदले वह प्रति बीघा ₹1300 से ₹1500 रुपए लेते हैं।
एक घंटे में एक बीघा, दस मजदूरों का काम अकेले
राजेंद्र चौधरी ने बताया कि बारिश का मौसम होने की वजह से किसान जल्दी-जल्दी बाजरे की कटाई में जुटे हैं और ट्रैक्टर से चलने वाली यह रीपर मशीन एक घंटे में एक बीघा खेत की कटाई पूरी कर दे रही है। उन्होंने बताया कि सामान्य तरीके से खेत में 10 मजदूर लगाने पर किसानों को करीब ₹10000 रुपए तक का खर्च उठाना पड़ता है, जबकि यही काम अकेली मशीन कम समय और कम बजट में निपटा दे रही है।
इससे किसानों के पैसे और समय, दोनों की बचत हो रही है। एक रीपर मशीन एक घंटे में एक बीघा खेत की कटाई कर सकती है और इसी रफ्तार व दक्षता ने किसानों की बड़ी परेशानी दूर कर दी है।
बाजरे के अलावा कई फसलों में काम आती है यह मशीन
रीपर मशीन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसका इस्तेमाल सिर्फ बाजरे तक सीमित नहीं है। यह ज्वार, ग्वार और तिल जैसी खरीफ फसलों के साथ-साथ गेहूं जैसी रबी फसल की कटाई में भी उतनी ही कारगर साबित होती है। यही बहुमुखी प्रतिभा और किफायती लागत इसे किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय बना रही है और आने वाले समय में इसकी मांग और बढ़ने के आसार हैं।




















