उत्तराखंड के पर्वतीय पर्यटन शहर नैनीताल में सैकड़ों महिलाएं अब पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच अपनी अलग आर्थिक पहचान बना रही हैं। नगरपालिका और राज्य शहरी विकास अभिकरण यानी सूडा की मदद से चल रहे स्वयं सहायता समूहों ने इन महिलाओं को प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर और बाजार तक पहुंच, तीनों मोर्चों पर सहारा दिया है, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। इसी कोशिश का नतीजा है कि आज ऊनी उत्पाद, ऐपण कला और घर के बने अचार जैसी चीजें इस पर्यटन नगरी की महिलाओं की कमाई का जरिया बन गई हैं।
2014 से अब तक 180 से ज्यादा समूह, आज भी 100 सक्रिय
नैनीताल नगरपालिका के सूडा विभाग में तैनात कम्युनिटी ऑर्गनाइजर चंदन सिंह भंडारी के अनुसार, साल 2014 से अब तक शहर में 180 से ज्यादा स्वयं सहायता समूह बन चुके हैं, जिनमें से करीब 100 समूह अभी भी सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। हर समूह की अपनी एक तय नियमावली होती है, जिसके तहत महिलाएं मिलकर उत्पाद तैयार करती हैं और फिर किसी एक एजेंसी पर निर्भर रहने के बजाय खुद ही उन्हें बेचने के लिए बाजार ढूंढती हैं। विभाग की कोशिश रहती है कि हर समूह को उसकी गतिविधि और जरूरत के हिसाब से सरकारी योजनाओं का फायदा मिल सके, ताकि अकेले काम करने के बजाय सामूहिक मेहनत से महिलाएं अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकें। अधिकारियों का मानना है कि यही सामूहिक तरीका है जिसकी वजह से यह मॉडल एक दशक से भी ज्यादा समय से टिका हुआ है।
ऐपण की कूची से लेकर अचार के मर्तबान तक
पहाड़ की पहचान मानी जाने वाली ऐपण कला को भी अब नैनीताल में रोजगार से जोड़ा जा रहा है। महिलाएं गेरू और पिसे हुए चावल से बने लेप से पारंपरिक डिज़ाइन उकेरती हैं और उनसे सजावटी सामान तैयार करती हैं, जिन्हें बाजार में बेचकर उन्हें अच्छी आमदनी मिल रही है। इसके साथ ही सूडा की मदद से महिलाओं को बुनाई-कताई, कैंडल बनाने और फूड प्रोसेसिंग जैसे हुनर भी सिखाए जा रहे हैं, जिन्हें वे घर के कामकाज के साथ-साथ भी कर सकती हैं। कई समूह जूस, जैम, अचार और पापड़ बनाकर उन्हें स्थानीय दुकानों तक पहुंचा रहे हैं। नैनीताल एक जाना-माना पर्यटन स्थल है, इसलिए यहां घरेलू और पारंपरिक स्वाद वाले उत्पादों के खरीदार आसानी से मिल जाते हैं। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए कुछ महिलाओं ने पर्यटकों के लिए पेइंग गेस्ट यानी पीजी सुविधा शुरू कर एक नया और थोड़ा अलग प्रयोग भी किया है, जो उनके लिए कमाई का अतिरिक्त जरिया साबित हो रहा है।
मेलों और उत्सवों में मिल रहा सीधा मंच
चंदन सिंह भंडारी बताते हैं कि सिर्फ प्रशिक्षण देकर विभाग अपना काम पूरा नहीं मान लेता, बल्कि तैयार माल को ग्राहकों तक पहुंचाने पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता है। केंद्र सरकार के सहयोग से लगने वाले विभिन्न मेलों में महिला समूहों को स्टॉल दिए जाते हैं, जहां वे बाहर से आने वाले लोगों को सीधे अपने उत्पाद बेच पाती हैं। इसके अलावा नैनीताल के चर्चित नंदा देवी महोत्सव के दौरान भी हर साल इन समूहों के लिए दुकानें आरक्षित रखी जाती हैं। इन आयोजनों से महिलाओं को न सिर्फ बिक्री बढ़ाने का मौका मिलता है, बल्कि नए ग्राहकों से जुड़ने का रास्ता भी खुलता है, जो अगले सीजन में दोबारा उनसे खरीदारी करने लौट सकते हैं।
पुराना हाट बाजार हटा, नई जगह की तलाश जारी
कुछ समय पहले तक नैनीताल के पुराने घोड़ा स्टैंड इलाके में एक अलग महिला हाट बाजार भी चलता था, जहां समूहों की महिलाएं अपने स्टॉल लगाकर सीधे ग्राहकों को स्थानीय सामान बेचा करती थीं। लेकिन उस सड़क के चौड़ीकरण का काम शुरू होने पर इस बाजार को वहां से हटाना पड़ा, जिससे समूहों के पास कोई तय ठिकाना नहीं रह गया। अब विभाग एक बार फिर शहर में कहीं इसी तरह का स्थायी हाट बाजार शुरू करने के लिए उपयुक्त जगह तलाश रहा है। अगर यह जगह मिल जाती है और बाजार दोबारा शुरू हो पाता है, तो महिला समूहों को अपने सामान बेचने के लिए एक पक्का ठिकाना मिल जाएगा, जिससे उन्हें हर बार नई जगह की तलाश नहीं करनी पड़ेगी।
अधिकारियों का कहना है कि जो महिलाएं किसी स्वयं सहायता समूह से जुड़ जाती हैं, उनके लिए स्वरोजगार तक पहुंचने का रास्ता काफी आसान हो जाता है। समूह के जरिए उन्हें प्रशिक्षण, उत्पाद बनाने का मौका, साथ मिलकर काम करने का अनुभव और बाजार तक पहुंच, ये सब एक साथ मिल जाता है। यही वजह है कि नैनीताल की महिलाएं आज अपनी रुचि और हुनर के हिसाब से ऐपण, फूड प्रोसेसिंग, बुनाई-कताई, ऊनी सामान और कैंडल मेकिंग जैसे कामों से जुड़कर अपनी अलग आर्थिक पहचान बना रही हैं।




















