बुलेट ट्रेन की 300 किमी रफ्तार और सुरंगों का दबाव: जानिए कैसे 'टनल हूड' रखेंगे यात्रियों के कान और आराम का ख्यालव्यापार
3 घंटे पहले· 2

बुलेट ट्रेन की 300 किमी रफ्तार और सुरंगों का दबाव: जानिए कैसे 'टनल हूड' रखेंगे यात्रियों के कान और आराम का ख्याल

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर की पहाड़ी सुरंगों के मुहानों पर पहली बार 'टनल हूड' लगाए जा रहे हैं, जो तेज रफ्तार से बनने वाले दबाव और धमाके जैसी आवाज को कम करेंगे।

देश की सबसे बड़ी रेल परियोजनाओं में गिनी जाने वाली मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर पर इन दिनों एक ऐसी इंजीनियरिंग जोड़ी जा रही है, जिसका नाम आम लोगों के लिए नया है — 'टनल हूड'। महाराष्ट्र और गुजरात के पहाड़ी हिस्सों में बन रही कई सुरंगों के प्रवेश और निकास बिंदुओं पर ये खास ढांचे लगाए जा रहे हैं। राष्ट्रीय हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) के मुताबिक, भारतीय रेलवे की सुरंगों में यह तकनीक पहली बार आजमाई जा रही है। दुनिया के जिन देशों में बुलेट ट्रेनें 300 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की गति से दौड़ती हैं, वहां यह तरीका पहले से इस्तेमाल होता आया है।

आखिर सुरंग में होता क्या है?

समझने वाली बात यह है कि जब कोई तेज रफ्तार ट्रेन सुरंग में घुसती है, तो वह अपने आगे की भारी मात्रा में हवा को आगे की ओर ठेल देती है। यह ठीक उसी तरह काम करता है जैसे किसी सिलेंडर के भीतर पिस्टन आगे बढ़ता है और हवा को दबाता है। इसी से सुरंग के अंदर दबाव की तेज लहरें बन जाती हैं। अगर इन लहरों पर काबू न रखा जाए, तो जब ट्रेन सुरंग के दूसरे छोर से बाहर निकलती है तो धमाके जैसी तेज आवाज पैदा हो सकती है। यह शोर सिर्फ ट्रेन में बैठे यात्रियों के सफर को ही खराब नहीं करता, बल्कि सुरंग के आसपास बसे लोगों के लिए भी सिरदर्द बन सकता है।

टनल हूड कैसे राहत देगा

टनल हूड दरअसल सुरंग और खुले माहौल के बीच एक पुल या संक्रमण क्षेत्र की तरह काम करता है। इसका ढांचा इस सोच के साथ बनाया गया है कि हवा एकदम से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अंदर जाए और बाहर आए। इसी से अचानक बनने वाले दबाव को थामा जा सकता है। हूड में जान-बूझकर विशेष वेंट्स या खिड़की जैसी संरचनाएं रखी जाती हैं, जिनके रास्ते दबाव से भरी हवा का कुछ हिस्सा धीरे-धीरे बाहर निकलता रहता है। नतीजा यह होता है कि दबाव की तीव्रता घट जाती है और सुरंग के भीतर तथा बाहर हवा का बहाव कहीं ज्यादा संतुलित बना रहता है।

यात्रियों और स्थानीय लोगों, दोनों का फायदा

इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा हासिल यह है कि बुलेट ट्रेन का सफर पहले से ज्यादा शांत और आरामदायक हो जाएगा। तेज रफ्तार के समय पैदा होने वाला शोर काफी हद तक थम जाएगा। साथ ही सुरंगों के इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों को कम ध्वनि प्रदूषण झेलना पड़ेगा। रेलवे अधिकारी मानते हैं कि इस तकनीक से यात्रियों का अनुभव तो बेहतर होगा ही, ट्रेन का संचालन भी ज्यादा सुरक्षित और कारगर बनेगा। हाई-स्पीड रेल नेटवर्क के लिहाज से इसे एक अहम सुधार माना जा रहा है।

वैश्विक मानकों की ओर भारत का कदम

जापान, फ्रांस और दूसरे हाई-स्पीड रेल वाले देशों में टनल हूड की यह तकनीक बरसों से चलन में है। अब भारत भी उसी राह पर आगे बढ़ रहा है। मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में इसे शामिल करना यह दिखाता है कि देश विश्वस्तरीय सुरक्षा, आराम और पर्यावरण से जुड़े मानकों को अपनाने के लिए गंभीर है। जानकारों का कहना है कि यह सिर्फ एक तकनीकी फेरबदल नहीं है, बल्कि भारत के आधुनिक रेल तंत्र की ओर बढ़ते कदम की निशानी है।

भविष्य की बुनियाद

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना देश के परिवहन क्षेत्र की तस्वीर बदलने वाली है। टनल हूड जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल यह पक्का करेगा कि आने वाले वक्त में भारत की हाई-स्पीड रेल सेवाएं अंतरराष्ट्रीय दर्जे की गुणवत्ता दे सकें। तेज रफ्तार, घटा हुआ शोर, ज्यादा सुरक्षा और बेहतर यात्री अनुभव — इन सबके साथ यह परियोजना देश के बुनियादी ढांचे को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में बड़ी भूमिका निभाएगी।

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