बाजार में बिकने वाली अधिकांश चॉकलेट को लेकर आम लोगों के मन में यही धारणा रहती है कि वे कोको से ही बनती हैं। हकीकत इससे काफी अलग है, क्योंकि दुकानों पर मिलने वाली अधिकांश चॉकलेट वास्तव में कंपाउंड चॉकलेट होती हैं। इनमें असली कोको बीन्स अथवा शुद्ध कोको बटर की जगह पर सस्ता पाम ऑयल, हाइड्रोजनेटेड वनस्पति फैट और भारी मात्रा में चीनी का इस्तेमाल किया जाता है। नियमित तौर पर ऐसी मिलावटी चीजों का सेवन सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसी जमीनी सच्चाई और बाजार के खालीपन को आंध्र प्रदेश के युवा उद्यमी प्रवीण ने गहराई से समझा और शुद्ध कोको आधारित चॉकलेट बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया।
चॉकलेट लाइब्रेरी से रेयर कोको बनने का सफर
प्रवीण ने अपने इस नवाचार की शुरुआत बेहद सीमित संसाधनों के साथ की थी। शुरुआत में उन्होंने चॉकलेट लाइब्रेरी नाम से एक छोटा सा उपक्रम स्थापित किया था। उस समय उनके पास काम करने के लिए मात्र 6 सांचे यानी मोल्ड्स उपलब्ध थे। उनका मूल मकसद ग्राहकों को यह समझाना था कि असली और सेहतमंद चॉकलेट का वास्तविक स्वाद कैसा होता है। धीरे-धीरे उपभोक्ताओं को शुद्ध चॉकलेट का महत्व समझ में आने लगा और उत्पादों की मांग में तेज उछाल देखा गया। इस सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद साल 2024 में उन्होंने अपने इस काम को रेयर कोको नाम से एक मुकम्मल और बड़े ब्रांड के रूप में स्थापित कर दिया। आज उनके पास 300 से अधिक अलग-अलग डिजाइनों के सांचे हैं, जिनके जरिए वे कई स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक चॉकलेट तैयार कर रहे हैं।
किसानों से सीधी खरीद और निर्माण की प्रक्रिया
रेयर कोको के उत्पादों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी शुद्धता है, जिसमें किसी भी प्रकार के हानिकारक केमिकल अथवा कृत्रिम तत्वों की मिलावट नहीं की जाती। इस खास चॉकलेट को तैयार करने के लिए मुख्य तौर पर केवल तीन प्राकृतिक सामग्रियों की जरूरत होती है। इनमें कोको निब्स, शुद्ध कोको बटर और प्राकृतिक मस्कोवाडो शुगर शामिल हैं। प्रवीण आवश्यक कच्चा माल सीधे किसानों से खरीदते हैं। इस सीधी खरीद से बिचौलियों का खर्च बचता है और किसानों को भी अपनी उपज का उचित दाम मिल पाता है। कोको बीन्स के प्रसंस्करण के दौरान लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा ऊपरी छिलके के रूप में बेकार निकल जाता है, जिसके बाद शेष शुद्ध हिस्से से उच्च गुणवत्ता वाली चॉकलेट तैयार की जाती है।
25 हजार करोड़ का घरेलू बाजार और नए अवसर
भारत में चॉकलेट की खपत लगातार बढ़ रही है और वर्तमान में इसका घरेलू बाजार करीब 25,000 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका है। प्रवीण का मानना है कि इस तेजी से बढ़ते बाजार में नए उद्यमियों के लिए अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यदि कोई नया कारोबारी इस पूरे बाजार का मात्र 1 प्रतिशत हिस्सा भी अपनी गुणवत्ता के दम पर हासिल कर ले, तो वह आसानी से करोड़ों रुपये का वार्षिक कारोबार खड़ा कर सकता है। बड़े पैमाने पर आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए लगभग 2 करोड़ रुपये की पूंजी की आवश्यकता होती है। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति घरेलू स्तर पर या छोटे पैमाने से इस काम की शुरुआत करना चाहता है, तो करीब 10 लाख रुपये का प्रारंभिक निवेश पर्याप्त साबित होता है। यदि उत्पाद में शुद्धता, उन्नत तकनीक और आकर्षक पैकेजिंग का संतुलन हो, तो यह क्षेत्र आत्मनिर्भर बनने की चाह रखने वाले युवाओं के लिए एक मुनाफेदार उद्यम बन सकता है।

















