खेती-किसानी में पारंपरिक रूप से धान और गेहूं जैसी फसलों को ही कमाई का मुख्य जरिया माना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के अंतर्गत आने वाले झलमला के रहने वाले किसान अशोक कुमार पटेल ने इस धारणा से अलग हटकर एक नया रास्ता चुना है। वे पिछले 45 वर्षों से सब्जियों की खेती कर रहे हैं और उनका अनुभव यह बताता है कि धान के मुकाबले साग-सब्जियों का यह कारोबार कहीं अधिक लाभकारी साबित हो सकता है। धान की एक फसल को पकने में जहां लगभग चार महीने का लंबा इंतजार करना पड़ता है, वहीं सब्जियों की फसलें बहुत कम समय में तैयार होकर किसानों की जेब में रोजाना नकदी ला सकती हैं।
बारिश के इस मौसम में अशोक कुमार पटेल ने अपने खेतों में मुख्य रूप से लालभाजी और पालक भाजी की बुवाई की है। इन दोनों ही सब्जियों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये महज 20 से 25 दिनों के भीतर पूरी तरह तैयार हो जाती हैं। इतनी जल्दी फसल हाथ में आने से समय पर बाजार पहुंचना और बेहतरीन मुनाफा कमाना मुमकिन हो जाता है। इसके अलावा वे अपने खेतों में बरबटी और तोरई का भी बंपर उत्पादन ले रहे हैं। जहां बरबटी की फसल करीब दो महीने में तैयार होती है और बाजार में लगभग 20 रुपये प्रति किलो के भाव से बिक रही है, वहीं तोरई की मांग और कीमत काफी ऊंची है जो बाजार में करीब 80 रुपये किलो तक बिक रही है।
बारिश के इन दिनों में बाजार में फूलगोभी की कीमतें भी आसमान छू रही हैं और अशोक कुमार पटेल की फसल अच्छी कीमत पर बिक रही है। फिलहाल बाजार में बरसात वाली फूलगोभी का भाव लगभग 100 रुपये प्रति किलो चल रहा है। इसके साथ ही वे लालभाजी और चौलाई भाजी को 20 रुपये में 5-5 झुरी के हिसाब से बेच रहे हैं। उनका यह साफ तौर पर मानना है कि सब्जियों की खेती का सबसे बड़ा फायदा यही है कि फसल कटाई के बाद रोजाना बाजार जाकर सब्जियों की बिक्री की जा सकती है और शाम होते-होते मेहनताना सीधे हाथ में आ जाता है।
सब्जी के इस कारोबार की तुलना वे एक दुधारू गाय से करते हैं जो हर दिन मालिक को कुछ न कुछ रिटर्न देती है। उनका कहना है कि रोज सुबह खेत या बाड़ी से ताजी सब्जियां तोड़कर बाजार ले जाना, दिनभर दुकानदारी करना और शाम को मुनाफा लेकर घर लौटना एक बेहतरीन दिनचर्या है। इस पूरे चक्र से रोजाना लगभग एक हजार रुपये तक की शुद्ध कमाई करना पूरी तरह मुमकिन है, जिससे घर का खर्च और बाकी जरूरतें आसानी से पूरी हो जाती हैं।
हालांकि, इस मुनाफे के पीछे कीटों और बीमारियों से बचाव की कड़ी मेहनत भी जुड़ी हुई है। सब्जियों की खेती में सबसे बड़ी चुनौती फसल को वायरस, विभिन्न रोगों और खतरनाक कीटों के प्रकोप से सुरक्षित रखना है। यदि समय रहते सही देखभाल की जाए और फसल इन समस्याओं से बची रहे, तो किसान लंबे समय तक लगातार उत्पादन ले सकते हैं। उदाहरण के तौर पर बरबटी के पौधे से कम से कम चार महीने तक लगातार पैदावार मिलती रहती है। वहीं तोरई की फसल दो महीने में तैयार होने के बाद यदि कीटों के हमले से सुरक्षित रहे, तो करीब डेढ़ महीने तक अतिरिक्त उत्पादन भी दे सकती है।
सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन के मामले में भी यह खेती काफी किफायती साबित होती है। अशोक कुमार पटेल बताते हैं कि धान की तुलना में सब्जियों को बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। वे अपने खेतों में आधुनिक ड्रिप सिस्टम के जरिए सिंचाई करते हैं, जिससे महज आधे घंटे में पूरे खेत की सिंचाई का काम पूरा हो जाता है। इसके अलावा खाद और उर्वरक देने के लिए भी वे इसी तकनीक का सहारा लेते हैं। ड्रिप सिस्टम के माध्यम से लगभग 10 मिनट के भीतर यूरिया, पोटाश और NPK 12:61:00 जैसे जरूरी पोषक तत्व पौधों तक पहुंचा दिए जाते हैं। सही फसल का चुनाव, समय पर बाजार पहुंचना और बेहतर प्रबंधन हो तो किसान केवल एक एकड़ जमीन से खेती के तमाम खर्चे निकालने के बाद आराम से 50 हजार रुपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।



















