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गोंडा के किसान प्रवीण सिंह ने मनकापुर में बसाई दुर्लभ आमों की दुनिया — याकूती, जर्दालू और अनवर रटौल को दे रहे नई जिंदगीव्यापार
14 जून 2026, 6:17 pm (44 दिन पहले)· 0

गोंडा के किसान प्रवीण सिंह ने मनकापुर में बसाई दुर्लभ आमों की दुनिया — याकूती, जर्दालू और अनवर रटौल को दे रहे नई जिंदगी

गोंडा के मनकापुर में प्रगतिशील किसान प्रवीण सिंह अपने बाग में याकूती, जर्दालू और अनवर रटौल जैसी लुप्त होती दुर्लभ आम किस्मों को संजो रहे हैं और अब इनके कलम तैयार कर किसानों को मुफ्त पौधे देने की तैयारी में हैं।

आम को यूं ही फलों का राजा नहीं कहा जाता। उत्तर प्रदेश में इसकी कई मशहूर किस्में पैदा होती हैं, मगर बदलते दौर और बाजार में आती नई-नई किस्मों के बीच कुछ पुरानी और दुर्लभ प्रजातियां चुपचाप गायब होती जा रही हैं। इसी चिंता को गोंडा जिले के मनकापुर के एक किसान ने अपना मिशन बना लिया है। प्रवीण सिंह नाम के इस प्रगतिशील किसान ने अपने बाग में याकूती, जर्दालू और अनवर रटौल जैसी विलुप्त होती किस्मों के पेड़ रोपे हैं, और आज यही बाग दूर-दूर तक चर्चा का केंद्र बन चुका है।

TrendKia से बातचीत में प्रवीण सिंह ने बताया कि जैसे-जैसे आम की नई किस्में बाजार में आती गईं, पुरानी प्रजातियां पीछे छूटती चली गईं और कई तो खत्म होने के कगार पर पहुंच गईं। इन किस्मों की अलग पहचान और उनका खास स्वाद बचा रहे, इसी सोच के साथ उन्होंने अपने बाग में दुर्लभ प्रजातियों के पौधे लगाने शुरू किए। बरसों की मेहनत रंग लाई और अब ये पेड़ फल देने लगे हैं।

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हर किस्म की अपनी अलग कहानी

प्रवीण सिंह बताते हैं कि याकूती का आकार लीची जैसा होता है और यह बाराबंकी की प्रजाति है। अपनी अनोखी मिठास और सुगंध के लिए मशहूर यह आम अब गिनी-चुनी जगहों पर ही बचा है। दूसरी किस्म जर्दालू बिहार के भागलपुर जिले की देन है, जिसे इसके निराले स्वाद और मुलायम गूदे के चलते लोग खूब पसंद करते हैं। तीसरी किस्म अनवर रटौल बागपत के रटौल की है और देश की सबसे प्रसिद्ध व स्वादिष्ट आम किस्मों में शुमार होती है। आकार में भले ही यह छोटा हो, पर इसकी मिठास और खुशबू लोगों के दिल जीत लेती है।

दूसरे जिलों से भी पहुंच रहे किसान

प्रवीण सिंह के इस बाग को देखने के लिए सिर्फ आसपास के गांवों के लोग ही नहीं, बल्कि दूसरे जिलों से भी किसान पहुंच रहे हैं। लोग इन दुर्लभ किस्मों के बारे में जानकारी जुटाते हैं और पौधे लगाने की तकनीक भी सीखकर जाते हैं। प्रवीण सिंह का मानना है कि अगर समय रहते इन पुरानी प्रजातियों को सहेजा नहीं गया, तो आने वाली पीढ़ियां इनके स्वाद और खूबियों से पूरी तरह अनजान रह जाएंगी।

देखभाल में आसान, कमाई में मददगार

एक दिलचस्प बात यह भी है कि इन दुर्लभ प्रजातियों के पौधों की देखभाल सामान्य किस्मों के मुकाबले कम करनी पड़ती है। समय-समय पर सिंचाई, खाद और रोगों से बचाव के उपाय जरूरी होते हैं, और अगर इतनी देखभाल मिल जाए तो ये पौधे बढ़िया गुणवत्ता वाले फल देते हैं। प्रवीण सिंह के मुताबिक यही पेड़ किसानों के लिए आमदनी का अच्छा जरिया भी बन सकते हैं।

अब मुफ्त पौधों की तैयारी

प्रवीण सिंह की यह कोशिश सिर्फ दुर्लभ आमों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि दूसरे किसानों के लिए भी एक मिसाल बन रही है। याकूती, जर्दालू और अनवर रटौल जैसी किस्मों को सहेजकर वह आम की पुरानी विरासत को नई पहचान दिला रहे हैं, और यही वजह है कि उनका बाग आज पूरे इलाके में चर्चा का विषय है। उन्होंने बताया कि इस बार वह इन आमों का कलम तैयार करेंगे, कलम से पौधे बनाए जाएंगे और फिर किसानों को निशुल्क पौधे बांटे जाएंगे, ताकि ये दुर्लभ प्रजातियां लोगों के बीच जिंदा रह सकें।

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