होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ऊर्जा विभाग के दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस अहम समुद्री मार्ग पर नाकेबंदी जैसी स्थिति बनी हुई है। अमेरिकी प्रशासन लगातार यह दावा कर रहा है कि इस रास्ते पर उसका पूरा नियंत्रण है और तेल की आपूर्ति सुचारू रूप से चल रही है। लेकिन स्वतंत्र टैंकर ट्रैकिंग कंपनियों के आंकड़े इन सरकारी दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं और इनकी सच्चाई पर बड़ा सवालिया निशान लगा रहे हैं।
ऊर्जा मंत्री के दावों और आंकड़ों में भारी अंतर
अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट का यह बयान सामने आया था कि हर दिन करीब 90 लाख बैरल कच्चा तेल होर्मुज के रास्ते से गुजर रहा है। हालांकि, समुद्री जहाजों और तेल टैंकरों की गतिविधियों पर नजर रखने वाली संस्थाओं के पास मौजूद आंकड़े इस दावे से काफी कम हैं। उनके विश्लेषण के मुताबिक, इस रास्ते से मौजूदा समय में केवल 50 लाख बैरल तेल ही रोजाना निकल पा रहा है, और अधिकतम क्षमता के साथ भी यह आंकड़ा शायद 70 लाख बैरल तक ही पहुंच सकता है।
व्हाइट हाउस का दावा और बाजार विशेषज्ञों की आशंकाएं
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए जोर देकर कहा था कि होर्मुज पूरी तरह खुला हुआ है और वहां से तेल का आवागमन बेहद आसान बना हुआ है। उन्होंने यह भी कहा था कि अमेरिका का इस जलमार्ग पर पूरा कंट्रोल है और हर हफ्ते लाखों बैरल तेल बाहर निकाला जा रहा है। ट्रंप के अनुसार, तेल की कीमतें नीचे आ रही हैं और अगर प्रशासन की ओर से और कदम उठाए गए तो दाम और कम हो जाएंगे। इसके विपरीत, तेल बाजार के विश्लेषक इन सरकारी दावों पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं।
विशेषज्ञ मैट स्मिथ ने खारिज किया सरकारी आंकड़ा
केप्लर संस्था के विशेषज्ञ मैट स्मिथ ने स्पष्ट किया है कि 90 लाख बैरल प्रतिदिन का दावा वास्तविक और मैदानी आंकड़ों से बिल्कुल मेल नहीं खाता। एक रिपोर्ट में उन्होंने यह भी कहा कि यह संख्या बिना किसी ठोस आधार के हवा में उछाल दी गई लगती है। उनके अनुसार, वर्तमान स्थिति यह है कि होर्मुज क्षेत्र में इस समय ईरान का प्रभाव सबसे ज्यादा है। इस मार्ग से जो थोड़े-बहुत टैंकर आ-जा रहे हैं, वे ज्यादातर ईरान के नियंत्रण वाले जलक्षेत्र से ही होकर गुजर रहे हैं।
अमेरिकी प्रशासन का तर्क और गुप्त आवाजाही
दूसरी तरफ, अमेरिका का दावा है कि उसके पास सबसे सटीक और वास्तविक आंकड़े मौजूद हैं। क्रिस राइट ने एक मीडिया इंटरव्यू में सफाई दी थी कि निजी और स्वतंत्र ट्रैकिंग कंपनियां होर्मुज से निकलने वाले कुल तेल को सही से पकड़ नहीं पा रही हैं। उनका तर्क है कि कई टैंकर अपनी पहचान छिपाकर और गुप्त तरीके से इस मार्ग को पार कर रहे हैं, जिसकी वजह से अमेरिकी सरकार के पास मौजूद खुफिया और प्रशासनिक आंकड़े स्वतंत्र एजेंसियों की तुलना में अधिक भरोसेमंद हैं। अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने भी पुष्टि की है कि कई जहाज अपने ट्रांसपोंडर बंद करके चल रहे हैं, जिससे उनकी ट्रैकिंग करना बेहद जटिल हो गया है।
संघर्ष से पहले का दौर और जहाजों की भारी कमी
मौजूदा हालात की तुलना अगर संघर्ष शुरू होने से पहले की स्थिति से की जाए तो जमीन आसमान का अंतर दिखाई देता है। युद्ध से पहले होर्मुज दुनिया के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारों में गिना जाता था, जहां से रोजाना लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल निकलता था। इस रास्ते से केवल तेल ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक गैस, एल्युमिनियम, उर्वरक और हीलियम जैसी जरूरी चीजें भी वैश्विक बाजारों तक पहुंचती थीं। उस दौर में हर रोज करीब 140 जहाज इस रास्ते को पार करते थे, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, एक हालिया रविवार को इस मार्ग से सिर्फ 3 जहाज गुजरे और पूरे पिछले सप्ताह के दौरान केवल 95 जहाजों ने ही होर्मुज को पार किया।
समुद्री आवाजाही को ट्रैक करने में आ रही मुश्किलें
आज के समय में तेल के जहाजों की सही आवाजाही का पता लगाना किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है। सुरक्षा कारणों और प्रतिबंधों से बचने के लिए कई जहाज अपनी लोकेशन बताने वाले ट्रांसपोंडर को ऑफ कर लेते हैं। इसके अलावा, कुछ संवेदनशील हिस्सों में सैटेलाइट के जरिए निगरानी रखना भी काफी कठिन हो गया है। अमेरिकी सेना द्वारा कुछ विशेष टैंकरों को बेहद गोपनीय तरीके से आगे बढ़ाने के कारण भी आंकड़े भ्रमित करने वाले हो जाते हैं। हालांकि केप्लर जैसी कंपनियां इस बदलते माहौल के मुताबिक अपनी तकनीक को अपग्रेड कर रही हैं, लेकिन डार्क ट्रांजिट यानी अपनी पहचान छिपाकर चलने वाले जहाजों की बढ़ती संख्या ने सटीकता को और मुश्किल बना दिया है।
वैश्विक बाजारों और कीमतों पर पड़ रहा गहरा असर
होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति सामान्य न होने का सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। कच्चे तेल के महंगे होने का मतलब है कि पेट्रोल और डीजल से लेकर ढुलाई और आम इस्तेमाल की हर वस्तु की कीमतें बढ़ सकती हैं। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी प्रशासन के तमाम दावों के बावजूद वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें उछलकर लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई हैं। इसके साथ ही, अमेरिका के भीतर भी पेट्रोल की औसत कीमत बढ़कर करीब 4.067 डॉलर प्रति गैलन हो गई है, जो इस सीजन के लिहाज से अब तक का सबसे उच्चतम स्तर माना जा रहा है।



















