आपके घर में निकलने वाले कूड़े-कचरे को आप रोजाना डस्टबिन में इकट्ठा करते हैं और सुबह आने वाली कचरे की गाड़ी में डाल देते हैं। अगर कभी एक-दो दिन कचरा घर में ही छूट जाए तो उससे उठने वाली बदबू पूरे घर का माहौल बिगाड़ देती है। हालांकि, घर से कचरा बाहर फेंककर आपको भले ही राहत मिल जाती हो, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि इस कचरे का असल में होता क्या है? यदि इस कचरे को किसी जगह पर बस यूं ही डंप किया जाता रहे, तो कुछ ही दिनों में शहर के शहर कचरे के पहाड़ों से पट जाएंगे।
कचरे को यूं ही फेंकने से पर्यावरण को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। गीले कचरे के बड़े-बड़े ढेर लगाने और उनका सही तरीके से निपटान न करने के गंभीर परिणाम सामने आते हैं। यही वजह है कि वेस्ट मैनेजमेंट यानी कचरा प्रबंधन आज के समय की एक बेहद जरूरी जरूरत बन चुका है। क्या आप जानते हैं कि जैविक कचरे का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है? इस गंभीर मुद्दे को आम जनता तक कैसे पहुंचाया जाए और इसके क्या पहलू हैं, इन सभी बातों पर सीईईडब्ल्यू की सीनियर प्रोग्राम लीड प्रियंका सिंह विस्तार से रोशनी डाल रही हैं।
खुले में कचरा जलाने से बढ़ता है प्रदूषण
सीईईडब्ल्यू की एक्सपर्ट प्रियंका सिंह बताती हैं कि भारतीय शहरों में खुले में कचरा जलाने की घटनाएं हमारे पर्यावरण को किस हद तक नुकसान पहुंचा रही हैं। अकेले कचरा जलाने की इन गतिविधियों से पीएम2.5 यानी PM2.5 उत्सर्जन में लगभग 10 प्रतिशत तक का योगदान होता है। आंकड़ों पर गौर करें तो साल 1994 से 2020 के बीच कचरा सेक्टर से होने वाले कुल उत्सर्जन में करीब 226 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यही कारण है कि अब यह क्षेत्र देश का चौथा सबसे बड़ा उत्सर्जन योगदानकर्ता बन गया है।
उत्सर्जन को लेकर भविष्य के आंकड़े और चुनौतियां
मौजूदा हालात और सामान्य स्थिति को देखा जाए तो इस सेक्टर से होने वाला कार्बन उत्सर्जन साल 2047 तक बढ़कर लगभग 119.5 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड तक पहुंच सकता है। हालांकि, स्थिति को सुधारा जा सकता है यदि देश में तेज नीतियों और महत्वाकांक्षी हरित परिवर्तन के रास्ते को अपनाया जाए। अगर ऐसा किया जाता है, तो यह उत्सर्जन पॉजिटिव होने के बजाय नेगेटिव यानी -67.5 या फिर -100.5 मिलियन टन तक नीचे आ सकता है। नेट-नेगेटिव होने का सीधा मतलब यह है कि हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने के बजाय उसमें उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की जाएगी।
जनमानस की सोच और व्यवहार में बदलाव की जरूरत
कचरा प्रबंधन के असली महत्व को लोगों तक पहुंचाने और उनके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए समाज की मानसिकता बदलना जरूरी है। लोगों के मन से “यह कचरा मेरे घर के पास न हो” वाली एन आई एम बी वाई सोच को खत्म करना होगा। इसके लिए शहरों को जमीनी स्तर पर सूचना, शिक्षा और संचार से जुड़ी गतिविधियां शुरू करनी चाहिए। इन उपायों में घर-घर जाकर सीधा संपर्क साधना, जागरूकता अभियानों में स्कूली बच्चों के साथ-साथ आध्यात्मिक गुरुओं व नेताओं को जोड़ना, लोगों का विश्वास जीतने के लिए पारदर्शी प्रदर्शन परियोजनाएं तैयार करना और एक मजबूत शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करना शामिल है।
शुल्क प्रणाली और प्रोत्साहन से मिल सकती है मदद
प्रियंका सिंह सुझाव देती हैं कि कचरे की सही छंटाई यानी गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करने की प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए पायलट प्रोजेक्ट्स शुरू किए जाने चाहिए। इसके तहत “जितना कचरा फेंको उतना भुगतान करो” जैसी शुल्क प्रणाली या फिर लोगों को प्रोत्साहित करने वाले तरीके जैसे बिजली और पानी के बिलों में रियायत दी जा सकती है। इस तरह के कदमों से आम लोगों की आदतों में एक मजबूत और स्थाई बदलाव लाया जा सकता है, जिसे बाद में बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए एक व्यावहारिक मॉडल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।



















