बिहार के रोहतास जिले के दिनारा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले सेमरी गांव के रहने वाले किसान प्रेमचंद पटेल ने कृषि के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश की है। तापमान को नियंत्रित करने की आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके वह महज 30 से 35 दिनों के भीतर मशरूम की फसल तैयार कर रहे हैं। उनका यह मानना है कि यदि सामान्य या पारंपरिक परिस्थितियां रखी जाएं तो उत्पादन में इससे कहीं अधिक समय लग सकता है, लेकिन वैज्ञानिक तरीकों से समय की बचत होती है।
वैज्ञानिक तरीके से तापमान का नियंत्रण
मशरूम के इस सफल उत्पादन के दौरान प्रेमचंद चरणबद्ध तरीके से तापमान को नियंत्रित करने का काम करते हैं। शुरुआती लगभग 18 दिनों के दौरान तापमान को 23 से 26 डिग्री सेल्सियस के बीच रखा जाता है। इसके बाद के 12 से 15 दिनों में तापमान को घटाकर 16 से 18 डिग्री सेल्सियस के बीच मेंटेन किया जाता है। इस सटीक तापमान प्रबंधन की वजह से फसल की गुणवत्ता और मात्रा दोनों बेहतरीन मिलती हैं।
कम्पोस्ट का कृषि में सदुपयोग
उत्पादन प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो अवशेष या कम्पोस्ट बच जाता है, उसे फेंकने के बजाय प्रेमचंद खेतों में खाद के रूप में उपयोग करते हैं। इसका मुख्य इस्तेमाल धान और गेहूं की फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए किया जाता है। इस प्राकृतिक विधि से खेत की मिट्टी की उपजाऊ शक्ति और उर्वरता लंबे समय तक सुरक्षित बनी रहती है, जिससे रासायनिक खादों पर निर्भरता भी कम होती है।
नौकरी की असफलता से खेती की ओर कदम
अपनी पढ़ाई के सफर में प्रेमचंद पटेल ने बीएससी एग्रीकल्चर की डिग्री पूरी की थी। उनकी इच्छा शुरुआत में नौकरी हासिल करने की थी, लेकिन लगातार कोशिशों के बाद भी जब सफलता हाथ नहीं लगी तो उन्होंने निराश होने के बजाय खेती को ही अपना मुख्य रोजगार बनाने का पक्का फैसला किया। वह पारंपरिक खेती के लीक से हटकर कुछ अलग करना चाहते थे, जिसके चलते उन्होंने मशरूम उत्पादन में अपनी किस्मत आजमाई।
प्रशिक्षण और तकनीकी दक्षता
इस व्यवसाय की शुरुआत में उन्होंने खुद से जानकारियां जुटाईं और इसके बाद कृषि विज्ञान केंद्र बिक्रमगंज, आत्मा रोहतास और कृषि विश्वविद्यालय सबौर से औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस सरकारी प्रशिक्षण और अपने खुद के लगातार प्रयोगों के बल पर उन्होंने मशरूम उगाने की तकनीक को और ज्यादा उन्नत और असरदार बना लिया है।
सम्मान और प्रेरणा का सफर
खेती के क्षेत्र में लगातार नए प्रयोग करने वाले प्रेमचंद पटेल को उनके इस उत्कृष्ट कार्य के लिए बिहार कृषि विश्वविद्यालय की तरफ से नवाचारी किसान के रूप में सम्मानित किया जा चुका है। उनके द्वारा किए गए यह प्रयोग अब केवल उनके अपने खेतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आसपास के तमाम किसानों के लिए भी एक बड़ा प्रेरणा का जरिया बन चुके हैं।
विस्तृत बाजार और शानदार कमाई
प्रेमचंद द्वारा उगाए जाने वाले मशरूम की खपत न केवल स्थानीय बाजारों में होती है, बल्कि इसका दायरा बिहार की राजधानी पटना, उत्तर प्रदेश के बनारस तथा झारखंड के रांची और डाल्टेनगंज जैसे प्रमुख शहरों तक फैला हुआ है। सर्दियों और मुख्य सीजन के दौरान स्थानीय बाजारों में भी इसकी मांग काफी ज्यादा बढ़ जाती है। प्रेमचंद के अनुसार, मशरूम उत्पादन और खेती के अन्य कार्यों से उनकी सालाना आय अब लगभग 20 से 25 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है। उनकी इस बड़ी कामयाबी को देखकर अब दूर-दूर से किसान उनसे खेती की बारीकियां सीखने आ रहे हैं।


















