दुनियाभर में बच्चों के प्रोडक्ट्स के लिए पहचानी जाने वाली दिग्गज कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन ने अपने ऊपर लटके कानूनी संकट को खत्म करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। कंपनी ने अदालत में चल रहे मुकदमों को सुलझाने के लिए 5.5 अरब डॉलर देने का फैसला किया है। भारतीय मुद्रा के हिसाब से यह राशि 52,715 करोड़ रुपये से भी अधिक बैठती है। अमेरिकी अदालतों में कंपनी के खिलाफ लगभग 76 हजार मुकदमे लंबित थे, जिनमें आरोप लगाया गया था कि कंपनी के बेबी पाउडर के इस्तेमाल से लोगों को ओवेरियन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हुई है।
हालांकि, कंपनी ने शुरुआत से ही इन सभी दावों को सिरे से खारिज किया है। बावजूद इसके, जॉनसन एंड जॉनसन ने कानूनी विवादों से हमेशा के लिए पीछा छुड़ाने और पीड़ितों को मुआवजा देने का रास्ता चुना है। कंपनी के लिटिगेशन वाइस प्रेसिडेंट एरिक हास का इस मामले पर कहना है कि इन दावों में कोई भी दम नहीं है, लेकिन अब कंपनी इस कानूनी पचड़े को और आगे नहीं खींचना चाहती है ताकि अनिश्चितता का माहौल खत्म हो सके।
दूसरी तरफ, पीड़ित पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों का मानना है कि यह समझौता बेहद संतोषजनक है और लगभग 95 प्रतिशत पीड़ित इससे सहमत होंगे। आपको बता दें कि जॉनसन एंड जॉनसन और प्रभावित लोगों के बीच यह कानूनी संघर्ष पिछले 10 वर्षों से लगातार चल रहा था। एरिक हास ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कंपनी को पूरा भरोसा है कि वे पहले की तरह आने वाले सभी मुकदमे भी जीत सकते हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि इस चैप्टर को अब बंद किया जाए ताकि कंपनी का पूरा ध्यान नई दवाओं के विकास और इंसानी जिंदगियां बचाने के अपने मुख्य मिशन पर केंद्रित हो सके।
समझौते के वित्तीय ढांचे के तहत, जॉनसन एंड जॉनसन आगामी वर्ष यानी 2027 में 3 अरब डॉलर का भुगतान करेगी। इसके बाद, जो शेष राशि बचेगी उसका भुगतान वर्ष 2028 में किया जाएगा। हालांकि, यह पूरी डील और अधिक खर्चीली भी साबित हो सकती है, क्योंकि कुल देनदारी इस बात पर निर्भर करेगी कि आखिर कितने लोग आगे आकर मुआवजे का दावा करते हैं। कंपनी ने अतीत में इस तरह के कई कानूनी मामले जीते भी हैं। जिन मामलों में निचली अदालतों के फैसले पीड़ितों के हक में आए थे, उन्हें उच्च अदालतों में चुनौती देकर कंपनी ने सफलतापूर्वक खत्म कराया है, हालांकि वे सभी मुकदमे अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा दायर किए गए थे।
अभी पिछले ही हफ्ते कंपनी ने ऐसा ही एक और मुकदमा अपने नाम किया था, जहां अदालत ने यह पाया कि संबंधित पीड़ित महिला अपने ओवेरियन कैंसर के दावे के समर्थन में ठोस और पुख्ता सबूत पेश करने में पूरी तरह असमर्थ रही थी। ऐसे में जब कानूनी पलड़ा ज्यादातर समय कंपनी के ही पक्ष में झुकता दिख रहा था, तो फिर इस भारी-भरकम सेटलमेंट को स्वीकार करने का निर्णय क्यों लिया गया, यह सवाल स्वाभाविक रूप से कई लोगों के मन में उठ सकता है।
इसकी मुख्य वजह अमेरिकी न्याय प्रणाली में ज्यूरी व्यवस्था का होना है। मान लीजिए कि यदि कुल 100 मामलों में से सिर्फ 10 मामलों में भी ज्यूरी ने फैसला पीड़ितों के पक्ष में सुना दिया, तो उससे कंपनी की साख और प्रतिष्ठा को भारी धक्का लगेगा। ऐसी स्थिति में कंपनी को न सिर्फ मुआवजे के तौर पर भारी रकम चुकानी होगी, बल्कि उसके वैश्विक व्यापार पर भी इसकी बहुत गहरी मार पड़ेगी। इस तरह के अदालती फैसले बहुत तेजी से दुनिया भर में फैलते हैं और ग्लोबल बिजनेस को प्रभावित करते हैं।
इसके अलावा, इतने लंबे समय तक अदालतों में टिके रहने के लिए कानूनी विशेषज्ञों और वकीलों की बड़ी टीमों को भारी-भरकम फीस चुकानी पड़ती है। मुकदमा जितना अधिक खिंचता है, उसका प्रशासनिक और कानूनी खर्च उतना ही बढ़ता जाता है। कई बार तो यह कानूनी खर्च सेटलमेंट में दी जाने वाली रकम के बराबर या उससे भी ऊपर निकल जाता है। यही मुख्य वजह है कि बड़ी कंपनियां अंततः भारी मुआवजा देकर विवादों को अदालत के बाहर खत्म करना ही बेहतर समझती हैं।



















