बिहार के ग्रामीण अंचलों में रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की घटती उर्वरता और सेहत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को देखते हुए किसान तेजी से जैविक खेती का रुख करने लगे हैं। जहानाबाद जिले में कई ऐसे काश्तकार सामने आए हैं, जिन्होंने अपने खेतों में रसायनों और कीटनाशकों का प्रयोग लगभग शून्य कर दिया है। मिट्टी की सेहत को सुधारने और पौष्टिक उपज हासिल करने का यह संकल्प अब किसानों के लिए नियमित आमदनी का एक मजबूत जरिया भी बन रहा है।
रासायनिक खादों से दूरी और जैविक खेती की शुरुआत
जहानाबाद जिले के मोदनगंज प्रखंड अंतर्गत जय किशुन बिगहा गांव के रहने वाले किसान लक्ष्मीकांत ने खेती के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव किया है। वे अपनी 70 से 80 फीसदी फसलों में केवल वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद का उपयोग कर रहे हैं। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग लगभग छोड़ चुके लक्ष्मीकांत का अनुभव है कि केंचुआ खाद डालने से फसल की पैदावार पर रत्ती भर भी नकारात्मक असर नहीं पड़ता। उन्हें रासायनिक खादों की तुलना में बराबर उत्पादन मिल रहा है, जबकि मिट्टी की जीवंतता और पौष्टिकता बरकरार रहती है। वे अपने खेतों में जितनी भी सब्जियां उगाते हैं, उन सभी में सिर्फ जैविक खाद ही डालते हैं। इस पद्धति ने उनके स्वास्थ्य को तो सुरक्षित किया ही, साथ ही अतिरिक्त कमाई का एक नया जरिया भी खोल दिया।
घर पर तीन पिट बनाकर हर साल 25 हजार रुपये तक की आमदनी
लक्ष्मीकांत को अपनी फसलों के लिए जैविक खाद खरीदने बाहर बाजार नहीं जाना पड़ता, बल्कि वे इसे पूरी तरह अपने घर पर ही तैयार कर लेते हैं। उन्होंने अपने परिसर में वर्मी कंपोस्ट के 3 पिट बना रखे हैं। इन तीनों पिटों की मदद से वे हर साल 100 बोरी तक केंचुआ खाद तैयार कर लेते हैं। अपनी घरेलू खेती की जरूरतें पूरी करने के बाद जो खाद बचती है, उसे बेचकर वे सालाना 20 से 25 हजार रुपये तक अतिरिक्त कमा लेते हैं।
सब्जी उत्पादक और नर्सरी संचालक हैं प्रमुख खरीदार
लक्ष्मीकांत द्वारा तैयार किए जाने वाले वर्मी कंपोस्ट के खरीदारों में प्रमुख रूप से सब्जी की खेती करने वाले किसान शामिल हैं। इसके अलावा धान की नर्सरी तैयार करने वाले काश्तकार और घरों में गमलों में पौधे उगाने वाले शौकीन लोग भी उनसे यह जैविक खाद नियमित रूप से खरीदते हैं। इन सभी ग्राहकों को खाद की आपूर्ति करके वे अपनी नियमित खेती के साथ-साथ वर्मी कंपोस्ट के जरिए हर साल अतिरिक्त मुनाफा कमा रहे हैं।
वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की पूरी विधि
केंचुआ खाद बनाने की प्रक्रिया बेहद सरल और किफायती है। लक्ष्मीकांत के अनुसार, अगर किसी किसान के पास 2 से 3 गाय हैं, तो उनके गोबर से 5 से 7 एकड़ खेत के लिए पर्याप्त जैविक खाद आसानी से तैयार की जा सकती है। वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए मुख्य रूप से गाय का गोबर, सूखे पत्ते, धान या गेहूं की भूसी, पुआल और केंचुओं की आवश्यकता होती है।
खाद तैयार करने के लिए किसान चाहें तो बाजार में मिलने वाले रेडीमेड ग्रीन पिट का इस्तेमाल कर सकते हैं या फिर ईंट और कंक्रीट का स्थायी पिट बनवा सकते हैं। इस पिट के ऊपर शेड बनाना बेहद जरूरी होता है, ताकि तेज धूप, भारी बारिश और अत्यधिक ठंड से केंचुओं का बचाव किया जा सके। निर्माण के बाद पिट में गोबर, भूसी, पुआल और पत्तों की परतें बिछाकर सामग्री रखी जाती है और उसमें केंचुए छोड़े जाते हैं। इसके बाद पूरे पिट को बोरे से अच्छी तरह ढक दिया जाता है। पिट में नमी बनाए रखने के लिए 7 से 8 दिन के अंतराल पर पानी का हल्का फुहारा देना होता है। इस आसान प्रक्रिया से महज एक महीने के भीतर उच्च गुणवत्ता वाली केंचुआ खाद बनकर तैयार हो जाती है।

















