बिहार में कृषि के तौर-तरीकों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य के किसान अब उन पारंपरिक फसलों के बजाय सब्जियों और फलों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं जो कम समय में बेहतर मुनाफा देती हैं। कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन और सलाह के कारण जहानाबाद जिले के ग्रामीण इलाकों में यह बदलाव साफ नजर आ रहा है। जिले के कई गांवों में बड़े पैमाने पर विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाई जा रही हैं। इसी कड़ी में काको प्रखंड के धरमपुर गांव के रहने वाले किसान राकेश कुमार ने भी सब्जी उत्पादन को अपनी मुख्य आय का जरिया बनाया है और वे इस क्षेत्र में सराहनीय काम कर रहे हैं।
सीजन के अनुसार फसलों का चयन और खेती का रकबा
राकेश कुमार के पास कुल पांच बीघा कृषि योग्य भूमि है। वे इस पूरी जमीन पर पारंपरिक खेती करने के बजाय तीन बीघा क्षेत्र में सालभर अलग-अलग तरह की सब्जियां उगाते हैं। वे मौसम और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर ही अपनी फसलों का चयन करते हैं। जैसे ही सर्दी का मौसम दस्तक देने लगता है, वे फूलगोभी की खेती की तैयारियों में जुट जाते हैं। इस साल भी उन्होंने अपनी एक बीघा जमीन पर केवल फूलगोभी उगाने का फैसला किया। जमीन के एक हिस्से पर उन्होंने पहले ही पौधों की रोपाई पूरी कर ली है, जबकि बाकी बचे हिस्से में मिट्टी की जुताई का काम तेजी से चल रहा है। राकेश कुमार का मानना है कि सर्दियों के दौरान फूलगोभी की खेती किसानों के लिए सबसे अधिक फायदेमंद साबित होती है क्योंकि इसमें लागत कम आती है और बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। समय प्रबंधन को वे कृषि क्षेत्र में सफलता की सबसे बड़ी कुंजी मानते हैं।
लागत और मुनाफे का पूरा गणित
अपनी इस कृषि तकनीक और वित्तीय प्रबंधन के बारे में राकेश कुमार ने विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि इस साल सितंबर महीने में उन्होंने एक बीघा खेत में फूलगोभी के पौधों की रोपाई की थी। इस फसल की कटाई और फल तोड़ने का काम जनवरी के शुरुआती हफ्ते से शुरू हो जाएगा। सामान्य तौर पर रोपाई के लगभग तीन महीने बाद पौधे से फूलगोभी प्राप्त होने लगती है। आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक बीघा खेत में फूलगोभी उगाने के लिए लगभग 20,000 रुपये का खर्च आता है। इस कुल खर्च में अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों की कीमत, जैविक खाद तैयार करने की लागत, सिंचाई के लिए पानी का प्रबंध और खेत की जुताई जैसे बुनियादी खर्चे शामिल हैं। यदि किसान स्वयं खेतों में शारीरिक श्रम करता है और मजदूरों पर निर्भरता कम रखता है, तो लागत को और भी कम किया जा सकता है।
मकर संक्रांति के समय बंपर कमाई का मौका
कमाई के आंकड़ों को साझा करते हुए राकेश कुमार बताते हैं कि खेत के एक कट्ठा क्षेत्र से लगभग 5,000 रुपये की सब्जियां बेची जा सकती हैं। इस हिसाब से देखें तो एक बीघा से कुल उत्पादन मूल्य लगभग 1,00,000 रुपये तक पहुंच जाता है। यदि इसमें से कुल 20,000 रुपये की शुरुआती लागत को घटा दिया जाए, तो किसानों को मात्र पांच महीनों के भीतर लगभग 80,000 रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। जनवरी के दौरान जब फसल पूरी तरह तैयार होती है, तब देश भर में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है। त्योहारों के इस सीजन में बाजार में सब्जियों की मांग अपने चरम पर होती है, जिससे किसानों को अपनी उपज का बहुत अच्छा और आकर्षक मूल्य मिल जाता है।
जैविक खाद से तैयार हो रही है सेहतमंद गोभी
राकेश कुमार की सफलता की कहानी केवल आर्थिक मुनाफे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को लेकर भी काफी सजग हैं। वे अपनी सब्जियों की खेती में किसी भी तरह के रासायनिक कीटनाशकों या रासायनिक खादों का उपयोग नहीं करते हैं। उन्होंने रासायनिक खाद को अपने खेतों से पूरी तरह से दूर कर दिया है। इसके बजाय वे अपने खेत में तैयार की गई जैविक खाद का इस्तेमाल करते हैं। उनका अनुभव है कि रासायनिक खाद बंद करने के बाद भी फसल के कुल उत्पादन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है। जैविक खाद के प्रयोग से भी उतनी ही मात्रा में और उसी आकार के फल मिल रहे हैं जितने रासायनिक खादों से मिलते थे। जैविक तरीके से उगाई गई उनकी एक फूलगोभी का वजन ढाई किलोग्राम तक हो जाता है। वे इस जैविक खाद को खुद ही पारंपरिक तरीकों से तैयार करते हैं, जिससे उनकी बाहरी निर्भरता और खेती की लागत दोनों ही कम हो जाती है।















