मानसून आने से पहले किसान निपटा लें ये पांच जरूरी काम, खरीफ में मिलेगी दमदार पैदावार और घटेगी लागतव्यापार
2 घंटे पहले· 1

मानसून आने से पहले किसान निपटा लें ये पांच जरूरी काम, खरीफ में मिलेगी दमदार पैदावार और घटेगी लागत

दक्षिण-पश्चिम मानसून के राजस्थान पहुंचते ही किसान खरीफ की तैयारी में जुट गए हैं। कृषि विशेषज्ञ बता रहे हैं कि बुवाई से पहले मिट्टी जांच, गहरी जुताई, प्रमाणित बीज, जल निकासी और संतुलित पोषण जैसे पांच कदम उठाने से उत्पादन भी बढ़ता है और खर्च भी घटता है।

बारिश का इंतजार हर किसान को रहता है, लेकिन असली फायदा उन्हीं को मिलता है जो मानसून के दस्तक देने से पहले ही खेत को पूरी तरह तैयार कर लेते हैं। दक्षिण-पश्चिम मानसून के राजस्थान में प्रवेश करते ही खेतों में हलचल तेज हो गई है। कहीं जुताई चल रही है तो कहीं बीज और उर्वरकों का इंतजाम किया जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर बुवाई से पहले कुछ बुनियादी काम सलीके से निपटा लिए जाएं, तो खरीफ फसलों से न सिर्फ बेहतर पैदावार मिलती है बल्कि लागत भी काफी हद तक कम रखी जा सकती है।

सबसे पहला कदम, मिट्टी की जांच

उदयपुर के महाराणा प्रताप एग्रीकल्चर कॉलेज के विशेषज्ञ मानते हैं कि खेती की शुरुआत बीज या खाद से नहीं, बल्कि मिट्टी की जांच से होनी चाहिए। मिट्टी परीक्षण से यह पता चल जाता है कि खेत में किन पोषक तत्वों की कमी है और किनकी भरपाई करनी है। इसी रिपोर्ट के आधार पर किसान सही मात्रा में खाद और उर्वरक डाल पाते हैं, जिससे फसल की बढ़वार तो अच्छी होती ही है, बेवजह के खर्च से भी बचत हो जाती है।

गहरी जुताई, कीट भी मरें और नमी भी टिके

मानसून से पहले खेत की गहरी जुताई को विशेषज्ञ बेहद फायदेमंद मानते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि गहरी जुताई से मिट्टी के भीतर छिपे कीट, उनके अंडे और खरपतवार नष्ट हो जाते हैं, यानी फसल को नुकसान पहुंचाने वाले तत्व शुरुआत में ही काबू में आ जाते हैं। इसके साथ ही मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे बारिश का पानी आसानी से जमीन में उतरता है और लंबे समय तक नमी बनी रहती है। इसका सीधा असर पौधों की जड़ों पर पड़ता है, उनका विकास बेहतर होता है और फसल को पर्याप्त नमी मिलती रहती है। गहरी जुताई मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने और बेहतर पैदावार दिलाने में भी मददगार साबित होती है।

प्रमाणित बीज और बुवाई से पहले उपचार

कृषि विभाग के अधिकारियों की सलाह है कि किसान हमेशा प्रमाणित और उच्च गुणवत्ता वाले बीज ही चुनें। बीज की किस्म इलाके की जलवायु, मिट्टी और मौसम के हिसाब से तय की जाए तो फसल की बढ़वार अच्छी होती है और पैदावार बढ़ने की गुंजाइश रहती है। विशेषज्ञ इस पर भी जोर देते हैं कि बुवाई से पहले बीजों का उपचार जरूर किया जाए। बीज उपचार से फसल को शुरुआती अवस्था में लगने वाले रोगों, फफूंद और कीटों से सुरक्षा मिलती है, अंकुरण बेहतर होता है और स्वस्थ फसल तैयार होने में आसानी रहती है।

जल निकासी और जैविक खाद का इंतजाम

बारिश के मौसम में पानी की निकासी का इंतजाम उतना ही जरूरी है जितनी बुवाई। कई बार ज्यादा बारिश होने पर खेत में पानी भर जाता है और फसल को नुकसान पहुंचता है। इसलिए विशेषज्ञ पहले से ही खेतों में नालियां और जल निकासी का उचित प्रबंध करने की सलाह देते हैं। इसके साथ ही किसानों को जैविक खाद और गोबर खाद के इस्तेमाल पर भी ध्यान देने को कहा जा रहा है। इससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है, उत्पादन क्षमता पर सकारात्मक असर पड़ता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी घट जाती है।

मौसम पर नजर और वैज्ञानिक सलाह

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक मौसम पूर्वानुमान पर लगातार नजर रखना भी फसल की सफलता से जुड़ा हुआ है। बारिश की स्थिति देखकर बुवाई का समय तय किया जाए तो फसल को बेहतर शुरुआत मिलती है, जबकि जल्दबाजी या देरी से की गई बुवाई कई बार उत्पादन पर भारी पड़ जाती है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि किसानों को कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्रों की ओर से समय-समय पर दी जाने वाली सलाह जरूर माननी चाहिए। नई तकनीक, आधुनिक उपकरण और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर खेती को पहले से कहीं ज्यादा फायदेमंद बनाया जा सकता है।

सवाल-जवाब

मानसून से पहले किसानों को कौन से पांच जरूरी काम करने चाहिए?
मिट्टी परीक्षण, गहरी जुताई, प्रमाणित बीजों का चयन, जल निकासी की व्यवस्था और संतुलित पोषण प्रबंधन ये पांच काम सबसे जरूरी बताए गए हैं।
गहरी जुताई से क्या फायदा होता है?
गहरी जुताई से मिट्टी में छिपे कीट, उनके अंडे और खरपतवार नष्ट हो जाते हैं, मिट्टी भुरभुरी होती है और लंबे समय तक नमी बनी रहती है।
बीज उपचार क्यों जरूरी है?
बुवाई से पहले बीज उपचार करने से फसल को शुरुआती रोगों, फफूंद और कीटों से सुरक्षा मिलती है और अंकुरण बेहतर होता है।
यह सलाह किसके अनुसार दी गई है?
उदयपुर के महाराणा प्रताप एग्रीकल्चर कॉलेज के विशेषज्ञ, कृषि विभाग के अधिकारी और कृषि वैज्ञानिक इन सुझावों के पीछे हैं।
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