नोएडा जैसे इंडस्ट्रियल हब में हर साल हजारों नए उद्यमी अपना कारोबार शुरू करते हैं, लेकिन इनमें से एक बड़ा हिस्सा चंद सालों में ही दुकान बंद करने को मजबूर हो जाता है। सवाल यह है कि आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर में छोटे व्यापारी टिक क्यों नहीं पाते। फंडिंग की कमी, मार्केट की सही समझ न होना, बढ़ता कंप्लायंस बोझ और पेमेंट अटकने जैसी दिक्कतें आम वजहें मानी जाती हैं। इसी सवाल पर MSME और स्टार्टअप सेक्टर के जानकारों से बातचीत की गई, जिसमें कारोबार को टिकाऊ बनाने के लिए जरूरी टिप्स सामने आए।
प्लानिंग के बिना कारोबार टिकता नहीं
टैलेंट कंप्लायंस इंडिया के डायरेक्टर और को-फाउंडर सुनील श्रीवास्तव के मुताबिक, कोई भी व्यापार शुरू करना दरअसल एक सोची-समझी प्लानिंग का नतीजा होना चाहिए। शुरुआत से पहले यह तय होना जरूरी है कि स्ट्रैटजी, डॉक्यूमेंटेशन और गवर्नेंस किस तरह की होगी। जिस भी जगह कारोबार शुरू करना है, वहां के फाइनेंशियल कंप्लायंस पूरे किए बिना काम आगे नहीं बढ़ता। अगर कोई माइक्रो, स्मॉल या मीडियम कारोबार इन बातों को नजरअंदाज करता है, तो वह लंबे समय तक टिक नहीं पाता।
देश की GDP में तीस फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी
सुनील श्रीवास्तव कहते हैं कि मार्केट में मांग होना जरूरी तो है, लेकिन गवर्नेंस और रोजमर्रा के कामकाज में अनुशासन भी उतना ही अहम है। भारत में MSME सेक्टर देश की GDP में 30.1% का योगदान देता है और कुल एक्सपोर्ट का करीब 45.7% हिस्सा भी इसी सेक्टर से आता है। लेकिन टिकाऊ ग्रोथ सिर्फ उन्हीं कारोबारों को मिलती है, जिनकी प्रक्रियाएं, कागजी दस्तावेज और इंटरनल कंट्रोल मजबूत होते हैं। जितनी अनुशासित नींव होगी, कारोबार में अनिश्चितता उतनी ही कम रहेगी।
सिर्फ सेल्स नहीं, बैकएंड सिस्टम भी उतना ही जरूरी
क्या बैकएंड सिस्टम भी सेल्स जितने ही महत्वपूर्ण होते हैं, इस सवाल पर सुनील श्रीवास्तव बताते हैं कि सेल्स से कारोबार बढ़ता जरूर है, लेकिन उस ग्रोथ को टिकाए रखने का काम बैकएंड सिस्टम ही करते हैं। आज बड़े क्लाइंट्स, इन्वेस्टर्स और रेगुलेटर किसी भी कंपनी की गवर्नेंस को भी परखते हैं। वर्कफोर्स मैनेजमेंट सही हो, पेरोल में सटीकता हो, दस्तावेज व्यवस्थित हों और कानूनी जिम्मेदारियां पूरी हों, तो कारोबार को बड़ा करना आसान हो जाता है और कामकाज में रुकावटें भी कम आती हैं।
सस्ता निकलने की जल्दबाजी बाद में भारी पड़ सकती है
लागत घटाने और लंबी अवधि के खतरे के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, इस पर सुनील श्रीवास्तव का कहना है कि खर्च कम करना जरूरी है, लेकिन गवर्नेंस से समझौता करके नहीं। छोटी अवधि में बचाई गई रकम कई बार आगे चलकर लंबी कानूनी लड़ाई, कामकाज में देरी या कंपनी की साख को नुकसान जैसी बड़ी समस्या बन जाती है। इसलिए किसी भी कारोबार को दक्षता और कंप्लायंस, दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए। गड़बड़ी को रोकना हमेशा उसे बाद में सुधारने से सस्ता पड़ता है। रिस्क मैनेजमेंट को सिर्फ इंस्पेक्शन या ऑडिट के समय तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि नियमित प्रोसेस रिव्यू, वेंडर गवर्नेंस, सटीक पेरोल रिकॉर्ड, सही दस्तावेज और रेगुलेटरी निगरानी को रोजमर्रा के कामकाज का हिस्सा बनाना चाहिए। मजबूत गवर्नेंस ही कारोबार की निरंतरता को बनाए रखती है।
शुरुआत से ही सिस्टम बनाने वालों को मिलता है फायदा
सुनील श्रीवास्तव के मुताबिक प्रोडक्ट और सेल्स जितना जरूरी है, गवर्नेंस पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए। सही रजिस्ट्रेशन, दस्तावेजों में पारदर्शिता, फाइनेंशियल कंट्रोल, वर्कफोर्स में अनुशासन और टेक्नोलॉजी अपनाना, ये सारी चीजें कारोबार की शुरुआत से ही उसका हिस्सा होनी चाहिए। भारत में इस वक्त 6.3 करोड़ (63 मिलियन) से ज्यादा MSME मौजूद हैं और मुकाबला लगातार बढ़ रहा है। लंबे समय का फायदा उन्हीं कारोबारों को मिलता है, जो कारोबार बढ़ाने के साथ-साथ मजबूत सिस्टम भी खड़े करते हैं।



















