नई टैक्स व्यवस्था के बाद अब सालाना 12 लाख रुपये तक की कमाई पूरी तरह टैक्स फ्री है, लेकिन इससे ज्यादा कमाने वाले हर व्यक्ति को सरकार को हिस्सा देना पड़ता है। इसके बावजूद भारत में एक ऐसा राज्य मौजूद है, जहां यह पूरा गणित बेमानी हो जाता है। यहां रहने वाला कोई शख्स भले ही करोड़ों या अरबों रुपये कमा ले, उसे इनकम टैक्स के नाम पर एक रुपया भी नहीं चुकाना पड़ता। यह राज्य है सिक्किम, जहां की करीब 95 फीसदी आबादी को इनकम टैक्स से 100 फीसदी छूट हासिल है।
यही वजह है कि सिक्किम को अक्सर भारत का ‘टैक्स हेवन’ कहा जाता है। यहां के मूल निवासियों को यह रियायत कोई नई नहीं है, बल्कि भारत में सिक्किम के विलय के वक्त से ही चली आ रही है। हालांकि अब इस पर सवाल भी खड़े होने लगे हैं। इस खास छूट को खत्म करने की मांग तेज होती जा रही है। आरोप यह है कि बाहर के लोग भी टैक्स बचाने के लिए इस नियम का गलत फायदा उठा रहे हैं।
आजादी से पहले जुड़ी है इस छूट की कहानी
सिक्किम में टैक्स न लगने की जड़ें साल 1948 तक जाती हैं। उस दौर में सिक्किम के चोग्याल शासक ने एक इनकम टैक्स मैनुअल जारी किया था, जिसके तहत राज्य के लोगों से किसी तरह का टैक्स नहीं वसूला जाता था। आगे चलकर 1975 में जब सिक्किम का भारत में पूरी तरह विलय हुआ, तब एक शर्त रखी गई कि यहां के लोगों को मिलने वाली पुरानी टैक्स छूट पहले की तरह बरकरार रहेगी।
भारत सरकार ने इस शर्त को मान लिया। इसके बाद संविधान के आर्टिकल 371-एफ के तहत सिक्किम को विशेष दर्जा दिया गया। इसी आधार पर आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10 (26एएए) के जरिये सिक्किम के मूल निवासियों को इनकम टैक्स से छूट दी गई है।
कैसे 95 फीसदी आबादी को मिली राहत
शुरुआत में यह छूट सिर्फ उन्हीं लोगों को मिलती थी, जिनके पास सिक्किम सब्जेक्ट सर्टिफिकेट होता था। इन्हीं मूल निवासियों को इनकम टैक्स से आजादी मिली हुई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले ने तस्वीर बदल दी और राज्य की 95 फीसदी आबादी टैक्स छूट के दायरे में आ गई।
अदालत ने अपने आदेश में साफ किया कि 26 अप्रैल 1975 यानी भारत में विलय से ठीक एक दिन पहले तक सिक्किम में बस चुके भारतीय मूल के लोगों को भी वहां का मूल निवासी माना जाएगा। इसी फैसले के बाद इनकम टैक्स से मिलने वाली इस छूट का दायरा बड़ी आबादी तक फैल गया, जो आज भी कायम है।




















