वैश्विक ऊर्जा बाजार में बुधवार को अप्रत्याशित नरमी देखी गई, जब अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड के दाम 4.7 प्रतिशत लुढ़ककर 98.76 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बंद हुए। अक्टूबर महीने की शुरुआत के बाद यह पहला मौका है जब ब्रेंट का भाव 100 डॉलर के मनोवैज्ञानिक आंकड़े से नीचे लुढ़का है। इसी प्रकार, अमेरिकी बाजार का प्रमुख बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी 4.5 प्रतिशत की गिरावट के साथ 91.73 डॉलर प्रति बैरल पर सिमट गया। इस तेज बिकवाली का मुख्य कारण वाशिंगटन के राजनीतिक घटनाक्रम और ईरान संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान की बढ़ती संभावनाएं हैं।
वाशिंगटन में सत्ता संतुलन बदलने से भू-राजनीतिक तनाव में कमी के संकेत
अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत हासिल होने से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन पर बाहरी सैन्य कार्रवाइयों को लेकर कूटनीतिक रुख अपनाने का दबाव बढ़ गया है। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका की फिलहाल तेहरान के खिलाफ सीधे सैन्य हमले की कोई तात्कालिक योजना नहीं है। इस बयान ने तेल व्यापारियों को आश्वस्त किया कि मध्य पूर्व में आपूर्ति मार्ग सुरक्षित रह सकते हैं। बाजार विश्लेषकों का आकलन है कि संसद में शक्ति संतुलन में बदलाव से संघर्ष विराम के प्रयासों को गति मिल सकती है, जिससे तेल आपूर्ति पर छाए युद्ध के काले बादल कुछ हद तक छंट रहे हैं।
विश्लेषकों का नजरिया और संभावित उतार-चढ़ाव
राजनीतिक परिदृश्य बदलने के बाद बाजार विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। बीओके फाइनेंशियल के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डेनिस किस्लर के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल का शिपमेंट सुधरने तथा सैन्य टकराव टलने के संकेतों के कारण कीमतों में कमजोरी आई है। दूसरी ओर, एनवेरस से जुड़े विशेषज्ञ कार्ल लैरी ने सतर्क रुख अपनाते हुए आगाह किया है कि औपचारिक शांति समझौते तक पहुंचने से पहले क्षेत्रीय मोर्चे पर अस्थिरता और तनाव का नया दौर भी देखने को मिल सकता है। इसलिए बाजार में आगे भी कीमतों के उतार-चढ़ाव बने रहने की आशंका से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
खाड़ी देशों से आपूर्ति आंकड़े और होर्मुज का विकल्प
समुद्री मालवहन पर नजर रखने वाले संस्थान वॉर्टेक्सा के ट्रैकिंग विवरण के मुताबिक, अक्टूबर माह के दौरान खाड़ी के उत्पादक राष्ट्रों से कच्चा तेल, कंडेंसेट और परिष्कृत ईंधनों का सम्मिलित निर्यात प्रतिदिन 1.71 करोड़ बैरल दर्ज किया गया। यह आंकड़ा सितंबर माह के 1.89 करोड़ बैरल प्रतिदिन की तुलना में कमजोर है, फिर भी युद्ध पूर्व स्तरों के लगभग तीन-चौथाई हिस्से को पूरा करता है। दूसरी तरफ रणनीतिक मोर्चे पर, संयुक्त अरब अमीरात जलडमरूमध्य होर्मुज पर अपनी मौजूदा निर्भरता घटाने के इरादे से तीसरी तेल निर्यात पाइपलाइन बिछाने के प्रस्ताव का अध्ययन कर रहा है, ताकि आपातकालीन परिस्थितियों में भी वैकल्पिक मार्ग से आपूर्ति निरंतर बनी रहे।
अमेरिकी इन्वेंट्री में अप्रत्याशित संकुचन
कीमतों में व्यापक मंदी के विपरीत, अमेरिकी भंडारण के ताजा आंकड़ों ने अलग तस्वीर पेश की। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) द्वारा 30 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह के लिए जारी विवरण में दर्शाया गया कि देश का कच्चा तेल भंडार 8.65 लाख बैरल कम होकर कुल 40.98 करोड़ बैरल पर आ गया, जबकि अर्थशास्त्री भंडार में वृद्धि की उम्मीद लगाए बैठे थे। इसके समानांतर, स्वतंत्र उद्योग निकाय अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) ने इसी समयावधि में अमेरिकी तेल भंडार में 52.7 लाख बैरल की तीव्र कमी का अनुमान दर्ज किया था।
भारतीय उपभोक्ताओं और घरेलू पंप दरों पर संभावित प्रभाव
वैश्विक मंच पर कच्चे तेल की नरमी से भारत में पेट्रोल और डीजल के खुदरा भाव घटने की आशाएं जगी हैं, क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का विशाल हिस्सा विदेशी उत्पादकों से आयात करके पूरा करता है। यदि कच्चे तेल के दाम लंबे समय तक इसी स्तर पर टिके रहते हैं, तो सरकारी तेल विपणन कंपनियों की खरीद लागत में कमी आएगी। हालांकि, पम्पों पर अंतिम दर केवल क्रूड की कीमत पर तय नहीं होती। घरेलू स्तर पर राहत मिलना अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपये की विनिमय दर, स्थानीय रिफाइनरियों की शोधन लागत, विपणन कंपनियों के लाभ मार्जिन और केंद्र तथा राज्यों के कर ढांचे के समायोजन पर भी निर्भर करेगा।















