स्वास्थ्य बिगड़ने या अस्पताल के गलियारे में कदम रखने पर सबसे पहले सफेद कोट पहने जिस चिकित्सक का चेहरा सामने आता है, वह आमतौर पर एक प्रशिक्षित एमबीबीएस डॉक्टर होता है. देश में आधुनिक चिकित्सा प्रणाली और डॉक्टरी पेशे की आधारशिला इसी स्नातक डिग्री को माना जाता है. बारहवीं कक्षा के बाद कठिन प्रवेश परीक्षा पास करके इस क्षेत्र में आने वाले युवाओं को पाँच साल और छह महीने की व्यापक व्यावहारिक तथा सैद्धांतिक ट्रेनिंग दी जाती है. इसमें साढ़े चार साल का नियमित क्लासरूम और वार्ड अध्ययन शामिल होता है, जिसके तुरंत बाद एक वर्ष की अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी करनी होती है. यह पूरी प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न करने के बाद ही अभ्यर्थी को मरीजों की जांच करने, दवाएं निर्धारित करने और जीवन रक्षक प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराने का वैध अधिकार प्राप्त होता है.
प्रारंभिक स्वास्थ्य देखभाल और डॉक्टरों की मूल भूमिका
चिकित्सा पेशे में डिग्री हासिल करने वाले यह पेशेवर मुख्य रूप से जनरल फिजिशियन अथवा प्राइमरी केयर फिजिशियन के तौर पर काम करते हैं. अस्पताल या डिस्पेंसरी में पहुंचने वाले किसी भी मरीज के स्वास्थ्य की स्थिति का प्रारंभिक आकलन करना और रोग की सही पहचान करना इनका प्राथमिक दायित्व होता है. साधारण मौसमी बुखार, खांसी, जुकाम से लेकर उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की जांच यही डॉक्टर करते हैं.
शारीरिक परीक्षण के दौरान यदि रोग सामान्य प्रकृति का है, तो वे उपयुक्त दवाइयां लिखकर मरीज को खानपान और दिनचर्या से जुड़े परामर्श देते हैं. बीमारी की जड़ तक पहुंचने के लिए यदि आंतरिक जांच की आवश्यकता महसूस होती है, तो वे पैथोलॉजी टेस्ट, रक्त परीक्षण, एक्स-रे या जरूरी स्कैन कराने की सलाह जारी करते हैं. इसके अलावा, छोटे हादसों या दुर्घटनाओं में घायल मरीजों की ड्रेसिंग करना, गहरे घावों पर टांके लगाना और आपातकालीन स्थिति में मरीज की हालत स्थिर रखना भी इनके नियमित कार्यों का अहम हिस्सा होता है. यदि बीमारी अधिक जटिल है, तो मरीज को उचित समय पर न्यूरोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट या ऑर्थोपेडिक सर्जन जैसे सुपर स्पेशलिस्ट के पास रेफर करने की जिम्मेदारी भी ये डॉक्टर निभाते हैं.
रोजगार के विविध विकल्प और कार्यक्षेत्र
स्नातक स्तर की यह मेडिकल डिग्री पूरे भारत में मान्यता प्राप्त है, जिससे पासआउट होने वाले डॉक्टरों के सामने रोजगार के अनगिनत दरवाजे खुलते हैं. सरकारी स्वास्थ्य तंत्र में ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) से लेकर जिला अस्पतालों और बड़े मेडिकल कॉलेजों में मेडिकल ऑफिसर के रूप में नियुक्तियां की जाती हैं. यहां वे सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन और आम जनमानस के उपचार में अग्रणी भूमिका निभाते हैं.
निजी स्वास्थ्य क्षेत्र भी ऐसे चिकित्सकों के लिए बड़े पैमाने पर अवसर उपलब्ध कराता है. अपोलो, फोर्टिस और मैक्स जैसे मल्टी-स्पेशलिटी और सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल श्रृंखलाओं में इन्हें जूनियर रेजिडेंट अथवा इमरजेंसी रूम डॉक्टर के रूप में तैनात किया जाता है. इसके अतिरिक्त, देश की सुरक्षा में तैनात भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना और बीएसएफ जैसे अर्धसैनिक बलों में भी कैप्टन या मेडिकल ऑफिसर के सम्मानित पदों पर इन डॉक्टरों को सीधे कमीशन दिया जाता है. कॉर्पोरेट जगत में बड़े औद्योगिक घरानों के हेल्थ सेंटर, फार्मास्यूटिकल कंपनियों और शोध प्रयोगशालाओं में भी इनकी पेशेवर सेवाओं की भारी मांग रहती है.
स्वतंत्र प्रैक्टिस और क्लिनिक शुरू करने के नियम
अस्पतालों में नौकरी करने के अलावा एक पंजीकृत डॉक्टर के पास स्वतंत्र रूप से अपना क्लिनिक या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित करने का पूरा अधिकार होता है. इसके लिए डॉक्टर का पंजीकरण नेशनल मेडिकल कमीशन अथवा संबंधित राज्य की मेडिकल काउंसिल में होना अनिवार्य है. वैध पंजीकरण के बाद ही कोई डॉक्टर स्वतंत्र प्रैक्टिस शुरू कर सकता है.
स्वतंत्र क्लिनिक स्थापित करने के लिए कुछ कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी होता है. इसमें स्थानीय नागरिक निकाय जैसे नगर निगम या एमसीडी से क्लीनिकल स्थापना का लाइसेंस हासिल करना और बायोमेडिकल कचरे के सुरक्षित निपटान के नियमों का पालन करना शामिल है. बदलते तकनीकी दौर में अब डॉक्टर पारंपरिक क्लिनिक के अलावा टेली-कंसल्टेशन के माध्यम से भी दूरदराज बैठे मरीजों को ऑनलाइन चिकित्सीय परामर्श और प्राथमिक इलाज की सुविधाएं दे रहे हैं.
सरकारी और निजी क्षेत्र में पारिश्रमिक का ढांचा
किसी भी डॉक्टर की मासिक कमाई उनके कार्य अनुभव, तैनाती के क्षेत्र और उनके संस्थान के प्रकार पर तय होती है. सरकारी क्षेत्र में चयनित होने वाले डॉक्टरों को शुरुआत में नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस को जोड़कर 65,000 रुपये से लेकर 90,000 रुपये प्रति माह का वेतन मिलता है. केंद्र और राज्य सरकारों के पे-स्केल के मुताबिक इसमें समय-समय पर बढ़ोतरी होती रहती है.
निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में शुरुआती दौर में काम करने वाले डॉक्टरों को 50,000 रुपये से लेकर 75,000 रुपये प्रति माह के बीच पारिश्रमिक दिया जाता है. वहीं अगर कोई चिकित्सक स्वतंत्र प्रैक्टिस की राह चुनता है, तो उसकी कमाई क्लिनिक की लोकेशन, मरीजों की संख्या और इलाके में उसकी साख पर निर्भर करती है. सही जगह पर स्थित क्लिनिक में शुरुआत में ही 1 लाख रुपये से लेकर 3 लाख रुपये या उससे भी अधिक की मासिक आमदनी हो सकती है, जिसकी कोई निश्चित ऊपरी सीमा नहीं होती.
उच्च शिक्षा और विशेषज्ञता की राह
स्नातक स्तर की शिक्षा पूरी करने के बाद अधिकांश युवा डॉक्टर किसी विशेष अंग या रोग के विशेषज्ञ बनने के लिए परास्नातक स्तर की पढ़ाई करते हैं. इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर की पीजी प्रवेश परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है. विशेषज्ञता के प्रमुख विकल्पों में नॉन-सर्जिकल क्षेत्रों के लिए एमडी यानी डॉक्टर ऑफ मेडिसिन शामिल है, जिसके जरिए बाल रोग, त्वचा रोग या आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ बना जाता है.
दूसरी ओर, सर्जरी के क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक डॉक्टर एमएस यानी मास्टर ऑफ सर्जरी का रुख करते हैं. इसमें जनरल सर्जरी, ईएनटी सर्जरी और हड्डी रोग जैसे विषय शामिल हैं. इसके अलावा राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड द्वारा संचालित डीएनबी अथवा अन्य क्लिनिकल डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के जरिए भी विभिन्न शाखाओं में उच्चस्तरीय विशेषज्ञता हासिल की जाती है.



















