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सीबीएसई परीक्षा की आंसर शीट पर केंद्रीय सूचना आयोग का बड़ा निर्देश, फीस और नियमों को लेकर कही यह बातकरियर
7 सित॰ 2026, 5:05 pm (1 घंटे पहले)· 3

सीबीएसई परीक्षा की आंसर शीट पर केंद्रीय सूचना आयोग का बड़ा निर्देश, फीस और नियमों को लेकर कही यह बात

केंद्रीय सूचना आयोग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को आरटीआई के तहत आंसर शीट की फोटोकॉपी के लिए केवल आरटीआई रूल्स 2012 के नियमों के तहत ही फीस लेने का निर्देश दिया है। साथ ही आयोग ने 19 मई 2025 के उस सर्कुलर में बदलाव की सिफारिश की है जिसमें आरटीआई के तहत कॉपी लेने के बाद रीवैल्यूएशन पर रोक लगाई गई थी।

केंद्रीय सूचना आयोग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई की बोर्ड परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियों और उनसे जुड़े शुल्कों को लेकर एक अहम निर्देश जारी किया है। आयोग ने बोर्ड को स्पष्ट शब्दों में यह हिदायत दी है कि यदि कोई विद्यार्थी सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत अपनी आंसर शीट की फोटोकॉपी मांगता है, तो उससे शुल्क की वसूली केवल आरटीआई रूल्स 2012 में तय की गई दरों के मुताबिक ही की जानी चाहिए। इसके साथ ही, सीआईसी ने अपने आदेश में सीबीएसई से उसके 19 मई 2025 के उस सर्कुलर में संशोधन करने की भी सिफारिश की है, जिसके जरिए यह पाबंदी लगाई गई थी कि आरटीआई के माध्यम से आंसर बुक की कॉपी प्राप्त करने वाला उम्मीदवार उसी कॉपी के आधार पर आगे रीवैल्यूएशन या वेरिफिकेशन की मांग नहीं कर सकता है। आयोग का मानना है कि इस तरह के प्रतिबंध पारदर्शिता के कानून के मूल उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत हैं।

एक दसवीं के छात्र की आरटीआई अर्जी से शुरू हुआ पूरा घटनाक्रम

यह पूरा मामला केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की दसवीं कक्षा के एक परीक्षार्थी की तरफ से दाखिल की गई आरटीआई अर्जी के बाद केंद्रीय सूचना आयोग के सामने पहुंचा था। उस छात्र ने अपनी बोर्ड परीक्षा की उत्तर पुस्तिका की फोटोकॉपी आरटीआई कानून के तहत हासिल करने का अनुरोध किया था। अपनी इस अर्जी में छात्र ने बोर्ड की नियमित रीवैल्यूएशन प्रक्रिया में लगने वाले भारी-भरकम खर्च का विशेष तौर पर हवाला दिया था। इसके अलावा, छात्र ने दसवीं कक्षा के मैथमेटिक्स स्टैंडर्ड सेट-3 के प्रश्नपत्र के कठिन स्तर, बोर्ड की तरफ से लागू की जाने वाली मॉडरेशन पॉलिसी तथा उसकी आंसर शीट में काटे गए अंकों को लेकर कई सवाल उठाए थे और स्पष्टीकरण मांगा था।

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पांच विषयों की आंसर शीट और रीवैल्यूएशन के नाम पर वसूले जा रहे थे हजारों रुपये

छात्र के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, उससे कुल पांच विषयों की आंसर शीट की फोटोकॉपी उपलब्ध कराने के एवज में 2,500 रुपये की मांग की गई थी। इसके साथ ही, री-वेरिफिकेशन के लिए भी 2,500 रुपये का शुल्क तय किया गया था और रीवैल्यूएशन की प्रक्रिया के लिए प्रति प्रश्न 100 रुपये की फीस निर्धारित की गई थी। इन सभी अलग-अलग शुल्कों और प्रक्रियाओं को यदि मिला दिया जाए, तो उस छात्र का कुल संभावित खर्च बढ़कर सीधे 10,000 रुपये तक पहुंच सकता था। इसी अत्यधिक वित्तीय बोझ और भारी-भरकम खर्च से बचने के लिए छात्र ने आरटीआई अधिनियम का सहारा लेते हुए अपनी आंसर शीट की प्रतियां पाने के लिए आवेदन किया था।

सीबीएसई के सीपीआईओ ने ईमेल से भेजी थी उत्तर पुस्तिका

इस पूरे मामले पर कार्रवाई करते हुए सीबीएसई के सेंट्रल पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर ने 2 जुलाई 2025 को संबंधित छात्र को अपना जवाब भेजा था। सीपीआईओ की तरफ से यह बताया गया कि निर्धारित शुल्क प्राप्त हो जाने के बाद छात्र द्वारा मांगी गई आंसर बुक उसे ईमेल के माध्यम से भेज दी गई थी। इसके बाद छात्र ने इस मामले में अपनी पहली अपील यानी फर्स्ट अपील दाखिल की। इस अपील के दौरान उसने अपनी आंसर बुक में कुछ पन्नों के खाली होने, गणित की मॉडरेशन पॉलिसी से जुड़े बिंदुओं और अपनी उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन को लेकर कई सवाल उठाए। हालांकि, फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी ने यह स्पष्ट किया कि छात्र के ये नए मुद्दे उसकी मूल आरटीआई अर्जी में पूछे गए सवालों के दायरे से अलग हैं, इसलिए इन मामलों पर अलग से विश्लेषणात्मक जवाब और स्पष्टीकरण मांगे गए।

सुनवाई के दौरान सीपीआईओ ने रखा बोर्ड का पक्ष

केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष जब इस मामले की सुनवाई हुई, तो सीबीएसई के सीपीआईओ ने आयोग को बताया कि छात्र को उसकी मांगी गई आंसर शीट पहले ही उपलब्ध कराई जा चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए छात्र से केवल आरटीआई रूल्स 2012 के तहत तय किया गया फोटोकॉपी का शुल्क ही लिया गया था। अपनी दलील के दौरान सीपीआईओ ने बोर्ड के 19 मई 2025 को जारी किए गए सर्कुलर का भी हवाला दिया। इस सर्कुलर के प्रावधानों के मुताबिक, हालांकि उम्मीदवारों को आरटीआई कानून के जरिए अपनी आंसर बुक की कॉपी लेने की छूट दी जाती है, लेकिन इसमें यह शर्त भी जोड़ी गई है कि आरटीआई के तहत उत्तर पुस्तिका हासिल करने के बाद वेरिफिकेशन या रीवैल्यूएशन की मांग आरटीआई के दायरे से बाहर रहकर नहीं की जा सकती है।

सीआईसी ने रीवैल्यूएशन पर लगाई गई रोक पर जताई कड़ी आपत्ति

केंद्रीय सूचना आयोग ने सीबीएसई के इस प्रावधान और प्रतिबंध पर कड़ी आपत्ति जताई है। आयोग का यह साफ कहना था कि किसी भी छात्र को सिर्फ इस आधार पर रीवैल्यूएशन की सुविधा से वंचित करना पूरी तरह अनुचित है कि उसने आरटीआई कानून के अंतर्गत अपनी आंसर शीट की कॉपी हासिल कर ली है। आयोग के अनुसार, आरटीआई के माध्यम से अपनी उत्तर पुस्तिका की कॉपी प्राप्त करना और किसी संस्था के अपने आंतरिक नियमों के तहत उपलब्ध रीवैल्यूएशन या अन्य उपायों का उपयोग करना, ये दोनों प्रक्रियाएं एक-दूसरे के रास्ते में बाधा नहीं बननी चाहिए और दोनों का रास्ता अलग-अलग है।

आरटीआई एक्ट के प्रावधानों के आगे नहीं टिक सकते सीबीएसई के दूसरे नियम

सीआईसी ने अपने आदेश में इस बात को भी बिल्कुल स्पष्ट किया कि सीबीएसई किसी भी दूसरे आंतरिक नियमों या रेगुलेशंस का सहारा लेकर ऐसे शुल्क या शर्तें लागू नहीं कर सकता है जो सीधे तौर पर आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों के अनुकूल न हों। इस संदर्भ में आयोग ने आरटीआई एक्ट की धारा 22 का विशेष रूप से उल्लेख किया। इस धारा के प्रावधानों के तहत आरटीआई कानून को उन सभी दूसरे कानूनों या कानूनी प्रावधानों पर सर्वोच्च प्राथमिकता मिलती है जो आरटीआई एक्ट के साथ असंगत या मेल नहीं खाते हैं। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि यदि किसी अन्य नियम की कोई भी शर्त आरटीआई अधिनियम के किसी प्रावधान से टकराती है, तो केवल आरटीआई एक्ट का प्रावधान ही प्रभावी माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी दिया गया हवाला

अपनी बात को और अधिक पुख्ता करते हुए सीआईसी ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 11 अप्रैल 2019 के उस फैसले का भी जिक्र किया जो ICSI बनाम पारस जैन मामले से जुड़ा हुआ था। उस चर्चित फैसले में यह साफ तौर पर माना गया था कि किसी संस्थान के अपने नियमों के तहत उपलब्ध कानूनी उपाय और आरटीआई कानून के अंतर्गत उपलब्ध उपाय एक-दूसरे के विकल्प या एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि किसी भी व्यक्ति को एक व्यवस्था के तहत मिलने वाले अधिकार का इस्तेमाल करने से दूसरी व्यवस्था के उपायों के कारण सिर्फ इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता। आयोग ने इसी न्यायिक सिद्धांत को इस वर्तमान मामले में भी बेहद महत्वपूर्ण और लागू होने योग्य माना।

सीआईसी ने बोर्ड को दिए भविष्य के लिए जरूरी निर्देश

इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय सूचना आयोग ने सीबीएसई को यह स्पष्ट निर्देश दिया कि आरटीआई अधिनियम के तहत मांगी जाने वाली आंसर स्क्रिप्ट की कॉपी उपलब्ध कराते समय फोटोकॉपी की फीस हमेशा आरटीआई रूल्स 2012 में निर्धारित की गई दरों के अनुसार ही वसूली जाए। आयोग ने सीबीएसई के सीपीआईओ को यह सलाह भी दी कि भविष्य में वे ऐसे मामलों को संभालते समय पूरी सावधानी और उच्च स्तर की जिम्मेदारी के साथ काम करें। इसके अलावा, सीआईसी ने आरटीआई एक्ट की धारा 25(5) के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए सीबीएसई को अपने 19 मई 2025 के सर्कुलर में आवश्यक संशोधन करने की सिफारिश की और कहा कि उस सर्कुलर को पूरी तरह आरटीआई कानून के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।

देशभर के छात्रों के लिए क्यों बेहद अहम है यह बड़ा फैसला

केंद्रीय सूचना आयोग का यह निर्देश उन तमाम सीबीएसई छात्रों के लिए बहुत अधिक राहत भरा और महत्वपूर्ण साबित होने वाला है जो अपनी बोर्ड परीक्षाओं के बाद अपनी आंसर शीट की फोटोकॉपी हासिल करना चाहते हैं। अक्सर छात्रों को अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की दोबारा जांच कराने और उनकी प्रतियां पाने के लिए कई तरह की जटिल औपचारिकताओं और भारी-भरकम शुल्कों का सामना करना पड़ता है। इस फैसले के बाद अब छात्रों पर से मनमाने शुल्कों का बोझ कम होने की उम्मीद है और वे बिना किसी अवांछित बाधा के पारदर्शिता के साथ अपनी कॉपियों की मांग कर सकेंगे।

सवाल-जवाब

केंद्रीय सूचना आयोग ने सीबीएसई को क्या मुख्य निर्देश दिया है?
आयोग ने निर्देश दिया है कि आरटीआई के तहत मांगी गई आंसर शीट की फोटोकॉपी के लिए फीस केवल आरटीआई रूल्स 2012 के नियमों के मुताबिक ही ली जाए।
सीबीएसई के किस सर्कुलर पर सीआईसी ने आपत्ति जताई है?
आयोग ने 19 मई 2025 के उस सर्कुलर पर आपत्ति जताई है जिसमें आरटीआई के जरिए आंसर बुक लेने के बाद रीवैल्यूएशन की मांग पर रोक लगाई गई थी।
यह पूरा मामला किस कक्षा के छात्र की अर्जी से शुरू हुआ था?
यह मामला केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की दसवीं कक्षा के एक छात्र की आरटीआई अर्जी के बाद सामने आया था।
छात्र से कुल कितने विषयों की आंसर शीट के लिए पैसे मांगे गए थे?
छात्र के अनुसार पांच विषयों की आंसर शीट की फोटोकॉपी के लिए उससे 2,500 रुपये की मांग की गई थी।
सीआईसी ने अपने फैसले में किस सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया है?
आयोग ने 11 अप्रैल 2019 के ICSI बनाम पारस जैन मामले के फैसले का हवाला दिया है।
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