कर्मचारी चयन आयोग की कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल परीक्षा के पहले चरण का आगाज होते ही परीक्षा केंद्रों से चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। केंद्र सरकार के मंत्रालयों और शीर्ष विभागों में 10 हजार से अधिक पदों पर नियुक्ति के लिए आयोजित इस परीक्षा में उम्मीदवारों का उत्साह केवल ऑनलाइन आवेदन तक ही सीमित नजर आया। परीक्षा के पहले दिन उत्तर प्रदेश और बिहार के विभिन्न शहरों में बनाए गए केंद्रों पर पंजीकृत अभ्यर्थियों में से आधे से ज्यादा अपनी सीट पर पहुंचे ही नहीं। बड़े पैमाने पर खाली पड़ी कुर्सियों ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के मौजूदा रुख और युवाओं के परीक्षा देने के तौर-तरीकों पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
उत्तर प्रदेश और बिहार के केंद्रों पर 61 फीसदी अभ्यर्थी रहे अनुपस्थित
कर्मचारी चयन आयोग के मध्य क्षेत्र के अधीन आने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के कुल 36 परीक्षा केंद्रों पर पहले दिन उपस्थिति का स्तर बेहद निराशाजनक रहा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इन केंद्रों पर कुल 29,609 अभ्यर्थियों का पंजीकरण हुआ था। हालांकि, जब कंप्यूटर आधारित परीक्षा शुरू हुई, तब इनमें से सिर्फ 11,593 अभ्यर्थी ही परीक्षा हॉल में मौजूद थे। इसका सीधा अर्थ यह है कि लगभग 39.15 प्रतिशत अभ्यर्थियों ने ही पेपर दिया, जबकि करीब 61 फीसदी पंजीकृत उम्मीदवारों ने परीक्षा से दूरी बना ली।
राज्यवार उपस्थिति के स्तर पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में उपस्थिति केवल 37.98 प्रतिशत दर्ज की गई। वहीं पड़ोसी राज्य बिहार में यह आंकड़ा 41.60 प्रतिशत रहा। प्रतियोगी परीक्षाओं का प्रमुख केंद्र माने जाने वाले संगम नगरी प्रयागराज जैसे बड़े एजुकेशन हब में भी स्थिति अलग नहीं थी, जहां पंजीकृत कुल छात्रों में से लगभग आधे छात्र परीक्षा केंद्र तक पहुंचे ही नहीं। यह स्थिति तब देखने को मिली जब दोनों ही राज्यों में सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले युवाओं की संख्या देश में सबसे अधिक मानी जाती है।
10,731 पदों पर भर्ती का श्रेणीवार विवरण
इस वर्ष कर्मचारी चयन आयोग ग्रुप बी और ग्रुप सी के कुल 10,731 रिक्त पदों को भरने के लिए यह भर्ती प्रक्रिया चला रहा है। इस भर्ती अभियान के तहत मिलने वाले पदों की सामाजिक श्रेणीवार संख्या भी तय कर दी गई है। जारी विवरण के मुताबिक अनारक्षित वर्ग के लिए कुल 4,412 पद निर्धारित किए गए हैं। इसके अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी वर्ग के लिए 2,772 पद, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस के लिए 1,028 पद, अनुसूचित जाति यानी एससी वर्ग के लिए 1,715 पद और अनुसूचित जनजाति यानी एसटी वर्ग के लिए 804 पद आरक्षित रखे गए हैं।
इस पूरी भर्ती में सबसे ज्यादा आकर्षण केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड यानी सीबीआईसी और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी सीबीडीटी के पदों को लेकर रहता है। इन विभागों में इंस्पेक्टर सेंट्रल एक्साइज और टैक्स असिस्टेंट जैसे प्रतिष्ठित पदों की हजारों रिक्तियां शामिल हैं। केंद्र सरकार में सुरक्षा और अधिकार संपन्न पदों के बावजूद परीक्षा केंद्रों से इतनी बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की गैरहाजिरी प्रशासनिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चौंकाती है।
परीक्षा छोड़ने के पीछे मनोवैज्ञानिक दबाव और तैयारी का अभाव
प्रतियोगी परीक्षा विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में गैरहाजिरी के पीछे कई व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक कारण काम करते हैं। सबसे प्रमुख पहलू एक सुनियोजित या लक्षित तैयारी की कमी है। बड़ी तादाद में युवा केवल अपने साथियों की देखा-देखी या पारिवारिक दबाव में आकर ऑनलाइन फॉर्म भर देते हैं। जैसे-जैसे परीक्षा की तारीख पास आती है और उनकी तैयारी अधूरी रह जाती है, उन्हें अपनी विफलता का पूर्वाभास होने लगता है और वे केंद्र पर जाने से बचते हैं।
दूसरा बड़ा कारण परीक्षा का समय प्रबंधन और उच्च दबाव वाला ढांचा है। कंप्यूटर आधारित इस टियर-1 परीक्षा में अभ्यर्थियों को 60 मिनट के सीमित समय में कुल 100 बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर देने होते हैं। इस प्रश्नपत्र में रीजनिंग, मैथ्स, इंग्लिश और सामान्य ज्ञान जैसे चार अलग-अलग खंड शामिल होते हैं। हर गलत उत्तर पर नेगेटिव मार्किंग का प्रावधान होने से जोखिम और अधिक बढ़ जाता है। इस कड़े दबाव और समय की तंगी के बीच कई छात्र परीक्षा देने का साहस नहीं जुटा पाते। इसके साथ ही निजी क्षेत्र में उभरते नए अवसरों और वैकल्पिक करियर विकल्पों के चलते भी कई युवा केवल फॉर्म भरकर छोड़ देते हैं और परीक्षा में शामिल होने को प्राथमिकता नहीं देते।
गंभीर अभ्यर्थियों के लिए मुकाबला आसान होने की संभावना
लाखों अभ्यर्थियों द्वारा परीक्षा छोड़े जाने का एक दूसरा पहलू उन छात्रों के हित में जाता दिख रहा है जो लंबे समय से इस भर्ती के लिए रात-दिन मेहनत कर रहे हैं। 60 प्रतिशत से ज्यादा पंजीकृत छात्रों के मैदान से बाहर हो जाने का सीधा अर्थ यह है कि टियर-1 चरण में असल प्रतिस्पर्धा का दायरा काफी सिमट गया है। केवल फॉर्म भरने वाली भारी भीड़ के छंट जाने से टियर-1 की अनुमानित कटऑफ और समग्र चयन प्रक्रिया पर इसका सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है। जो अभ्यर्थी ठोस रणनीति के साथ पूरी तैयारी से परीक्षा में बैठे हैं, उनके लिए दिसंबर में प्रस्तावित टियर-2 परीक्षा में जगह बनाना अपेक्षाकृत अधिक सुगम हो सकता है।



















