छत्तीसगढ़ में धान मुख्य आजीविका का साधन है और इसी वजह से इस राज्य को धान का कटोरा भी कहा जाता है। सरगुजा जिले के खेतों में इस समय धान के पौधों पर बालियां तथा फूल निकलने का अत्यंत संवेदनशील चरण चल रहा है। यह ऐसा दौर होता है जिससे आने वाले कुल उत्पादन का पैमाना तय होता है, लेकिन ठीक इसी वक्त खड़ी फसल पर फंगस और जीवाणु जनित रोगों की आशंका बढ़ गई है। खेतों में विशेष रूप से फाल्स स्मट और ब्राउन स्पॉट जैसी बीमारियों की दस्तक ने काश्तकारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए कृषि विशेषज्ञ डॉ वीर सिंह ने समय रहते रोकथाम और वैज्ञानिक प्रबंधन पर जोर दिया है ताकि उपज को गिरने से बचाया जा सके।
फाल्स स्मट और ब्राउन स्पॉट के लक्षण तथा पहचान
धान में जब बालियां निकल रही होती हैं, उस वक्त फाल्स स्मट की समस्या सामने आ सकती है। ग्रामीण इलाकों में काश्तकार इसे भिन्न-भिन्न क्षेत्रीय नामों से पहचानते हैं। इस फंगल बीमारी का असर सीधे अनाज बनने की प्रक्रिया पर पड़ता है। जिस जगह पर धान का ठोस दाना तैयार होना चाहिए, वहां शुरुआती दौर में एक अजीब हरे रंग का उभार या संरचना बनती है। समय बीतने के साथ यह संरचना पीली पड़ती है और आखिर में काली हो जाती है। इस विकार के चलते दाने के स्थान पर फफूंद जम जाती है, जिससे दाने खोखले या विकृत हो जाते हैं और उपज को सीधा नुकसान पहुंचता है।
दूसरी ओर, ब्राउन स्पॉट की पहचान पत्तियों की सतह पर बनने वाले भूरे निशानों और धब्बों से की जाती है। यह संक्रमण फसल के आगामी और परिपक्वता चरणों में भी पौधों को कमजोर कर सकता है। इसी कारण जैसे ही पत्तियों पर ऐसे लक्षण नजर आएं, काश्तकारों को फौरन नियंत्रण के उपाय शुरू कर देने चाहिए ताकि बीमारी पूरे रकबे में न फैले।
संक्रमित बालियों को बाहर निकालना और सफाई
डॉ वीर सिंह ने आगाह किया है कि फाल्स स्मट से ग्रसित बालियों को खेत में यूं ही छोड़ देना भारी पड़ सकता है। इस रोग के जीवाणु या स्पोर्स हवा के सहारे एक पौधे से दूसरे पौधे तक बड़ी आसानी से पहुंच जाते हैं। इसलिए सबसे जरूरी कृषि क्रिया यह है कि प्रभावित बाली अथवा रोगग्रस्त पौधे को सावधानीपूर्वक काटकर खेत की परिधि से दूर ले जाकर पूरी तरह नष्ट कर दिया जाए। खेत की यह प्रारंभिक सफाई बीमारी के प्रसार की गति को रोक देती है और बाकी स्वस्थ पौधों को सुरक्षित रखती है।
फफूंदनाशक और जीवाणुनाशी का वैज्ञानिक छिड़काव
फफूंदजनित विकारों से निपटने के लिए कृषि विभाग और विशेषज्ञों द्वारा अनुशंसित रासायनिक दवाओं का ही प्रयोग करना चाहिए। डॉ वीर सिंह ने कई उपयोगी विकल्पों का जिक्र किया, जिनमें प्रोपिकोनाजोल, टेबुकोनाजोल, हेक्साकोनाजोल और ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन आधारित संयोजन प्रमुख हैं। किसानों को यह ध्यान रखना होगा कि दवा का चुनाव और उसकी खुराक मनमाने ढंग से तय न की जाए, बल्कि खेत में संक्रमण के फैलाव और स्थानीय कृषि सिफारिशों के अनुसार ही सटीक मात्रा का इस्तेमाल किया जाए।
खेत के कुछ हिस्सों में बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट जैसी जीवाणु जनित समस्या भी सिर उठा सकती है। ऐसी दशा में किसी उपयुक्त जीवाणुनाशी अथवा अनुशंसित रसायन का चयन करना जरूरी होता है। किसी भी रासायनिक छिड़काव से पहले किसान खेत में मौजूद बीमारी की सही पहचान अवश्य करें, ताकि गलत रसायन के छिड़काव से होने वाले अनावश्यक खर्च और फसल पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव से बचा जा सके।
लापरवाही से भारी नुकसान और बीज प्रबंधन
यदि शुरुआती अवस्था में ही इन रोगों को नियंत्रित नहीं किया गया, तो फसल पकने के समय खेत में इसका असर बहुत विकराल रूप ले सकता है और उपज में भारी गिरावट आ सकती है। कुछ मामलों में यह नुकसान अत्यंत गंभीर स्तर तक पहुंच जाता है। इसके अतिरिक्त, कई रोग बीजों के माध्यम से भी अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं। यदि कोई काश्तकार संक्रमित फसल से बीज बचाकर अगले मौसम में उसकी बुआई करता है, तो वही बीमारी नए सिरे से खेत में उभर आती है। इसी वजह से हमेशा प्रमाणित व स्वस्थ बीजों का चयन करना और बुआई पूर्व उचित बीज उपचार करना टिकाऊ खेती के लिए अनिवार्य शर्त है।




















