डॉक्टर बनने की चाहत रखने वाले युवा हर साल नीट परीक्षा की तैयारी में अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। इस साल भी ग्यारह लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने नीट यूजी की न्यूनतम कटऑफ को पार करते हुए काउंसलिंग प्रक्रिया में हिस्सा लिया था। हालांकि काउंसलिंग के आखिरी चरण यानी स्ट्रे वैकेंसी राउंड के आंकड़े सामने आने के बाद एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। देश के अन्य हिस्सों में जहाँ मेडिकल सीटें भर चुकी हैं, वहीं तमिलनाडु और पुडुचेरी की डीम्ड यूनिवर्सिटीज में एमबीबीएस की आठ सौ चौबीस सीटें खाली रह गई हैं।
भारी-भरकम ट्यूशन फीस बनी सबसे बड़ी बाधा
इन प्रतिष्ठित सीटों के खाली रहने के पीछे कोई तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि इसके लिए इन संस्थानों की भारी-भरकम फीस को जिम्मेदार माना जा रहा है। इन चुनिंदा डीम्ड यूनिवर्सिटीज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम की सालाना फीस तेरह लाख से पैंतीस लाख रुपये तक पहुँच जाती है। साढ़े चार साल के इस लंबे कोर्स के दौरान केवल ट्यूशन फीस के रूप में ही छात्रों को करोड़ों रुपये चुकाने पड़ते हैं। मेडिकल काउंसलिंग कमेटी के आंकड़ों के मुताबिक, स्ट्रे राउंड की शुरुआत में पूरे देश में तीन हजार चार सौ छब्बीस सीटें खाली थीं। इनमें से कई सीटें भर गईं, लेकिन तमिलनाडु और पुडुचेरी के कई बड़े कॉलेजों में हालात जस के तस बने रहे।
इन प्रमुख कॉलेजों में खाली सीटों का हाल
चेन्नई स्थित श्री सत्य साई मेडिकल कॉलेज में पचहत्तर प्रतिशत सीटें खाली पड़ी हैं। महंगे प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज की इस समस्या का सबसे अधिक प्रभाव तमिलनाडु और पुडुचेरी के संस्थानों पर पड़ा है। इस सूची में शामिल हर एक मेडिकल कॉलेज में कुल ढाई सौ सीटें थीं, लेकिन अत्यधिक फीस के कारण छात्रों ने इनसे दूरी बनाए रखी।
- श्री सत्य साई मेडिकल कॉलेज: चेन्नई के इस संस्थान में सबसे अधिक पचहत्तर प्रतिशत यानी एक सौ अट्ठासी सीटें खाली रह गई हैं।
- मीनाक्षी मेडिकल कॉलेज: कांचीपुरम स्थित इस कॉलेज में सैंतालीस प्रतिशत यानी एक सौ सत्रह सीटें नहीं भर पाईं।
- महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज: पुडुचेरी के इस संस्थान में सैंतीस प्रतिशत यानी बानवे सीटें खाली रह गईं।
- श्री बालाजी मेडिकल कॉलेज: क्रोमपेट स्थित इस कॉलेज में भी तैंतीस प्रतिशत यानी बयासी सीटों पर कोई प्रवेश नहीं हुआ।
इसके अलावा एसआरएम, सविता और चेट्टीनाड जैसे नामी-गिरामी संस्थानों में भी बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गईं। रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु और पुडुचेरी की डीम्ड यूनिवर्सिटी में सालाना फीस तेरह से पैंतीस लाख रुपये तक है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में औसत फीस बाईस लाख अड़सठ हजार रुपये के करीब है। महाराष्ट्र की डीम्ड यूनिवर्सिटी की औसत फीस चौबीस लाख अट्ठावन हजार और कर्नाटक की बीस लाख पचासी हजार रुपये है। कंसल्टेंट्स का कहना है कि कोर्स की कुल अवधि के दौरान यहाँ की फीस में इक्कीस लाख रुपये तक का भारी अंतर आ जाता है, जिसके कारण छात्रों ने इन संस्थानों से मुँह मोड़ लिया।
कम कटऑफ के बावजूद छात्रों ने बनाई दूरी
एक तरफ जहाँ अत्यधिक फीस के कारण सीटें खाली रहीं, वहीं जिन संस्थानों ने अपनी फीस में थोड़ी राहत दी, वहाँ कटऑफ रैंक में भारी गिरावट देखने को मिली। उदाहरण के तौर पर श्री रामचंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च में प्रवेश की क्लोजिंग कटऑफ रैंक सात लाख तीस हजार से लुढ़क कर सीधे दस लाख अड़सठ हजार पर आ गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि कम अंक हासिल करने वाले छात्र भी प्रवेश चाहते थे, लेकिन वे अपनी जेब पर पड़ने वाले भारी वित्तीय बोझ से डरे हुए थे।
राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। डीएमके के राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने इन संस्थानों पर कड़ा प्रहार करते हुए इन्हें मुनाफाखोर करार दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार से माँग की है कि डीम्ड यूनिवर्सिटीज की ट्यूशन फीस पर तुरंत अधिकतम सीमा तय की जाए ताकि मेडिकल की पढ़ाई केवल धनाढ्य वर्ग तक सीमित न रहे।
भविष्य के लिए छात्रों को सलाह
जो छात्र आगामी वर्षों में नीट यूजी की परीक्षा में शामिल होने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए यह एक बड़ा सबक है। उन्हें केवल कॉलेज का नाम देखकर आवेदन नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने बजट और वित्तीय योजना को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखना बेहद आवश्यक है।



















