आज के समय में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा है जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दखल न हो। शिक्षा की दुनिया भी इससे अछूती नहीं है। जैसे-जैसे तकनीक हमारे जीवन में गहराई से पैठ बना रही है, वैसे-वैसे विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में एक गहरा सवाल उठने लगा है कि क्या भविष्य में मशीनें इंसानों और स्कूलों की जगह पूरी तरह ले लेंगी। क्लासरूम में बैठकर ब्लैकबोर्ड से पढ़ने का पारंपरिक तरीका क्या अब पुराना हो चुका है। इस आधुनिक चुनौती को नजरअंदाज करना अब मुमकिन नहीं रह गया है। संस्कृति ग्रुप ऑफ स्कूल्स, पुणे के ट्रस्टी और शिक्षाविद् प्रणीत मुंगाली का मानना है कि तकनीक एक बड़ा वरदान है, लेकिन इसे वरदान बनाए रखना आज के युवा वर्ग और शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। महाभारत में अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र चलाने और उसके भयंकर परिणामों की कथा हमें सिखाती है कि किसी भी असीम शक्ति का प्रयोग करने से पहले उसकी गहरी समझ होना अनिवार्य है। यही शाश्वत नियम आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में भी पूरी तरह लागू होता है। तकनीक के इस युग में स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को बच्चों के भीतर कौन सी दस खास स्किल्स विकसित करनी चाहिए, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
छात्रों में तार्किकता और क्रॉस-चेकिंग की आदत डालना
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में पूरी तरह तकनीक पर निर्भर हो जाना छात्रों की दिमागी कसरत को पूरी तरह बंद कर सकता है। छात्रों को बेहद स्पष्ट शब्दों में यह समझना होगा कि तकनीक उनकी मंजिल नहीं है, बल्कि उस मंजिल तक पहुंचने का केवल एक माध्यम है। तकनीक का उपयोग केवल अपनी क्षमताओं को विस्तार देने के लिए किया जाना चाहिए, न कि अपनी सोचने-समझने की प्राकृतिक ताकत को उस पर पूरी तरह गिरवी रखने के लिए। जरूरी और जरूरत के बीच का यह बारीक फर्क समझना ही आज के समय की असली समझदारी है। इसके अलावा मशीनों के पास चाहे जितनी भी स्मार्टनेस आ जाए, वे कभी किसी इंसान का दर्द और भावनाएं महसूस नहीं कर सकतीं। बच्चों के भीतर करुणा, सहानुभूति और टीम वर्क की भावना जगाना अत्यंत आवश्यक है। जब विद्यार्थी मिलकर सामूहिक प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं, तो वे दूसरों के नजरिए को गहराई से समझना सीखते हैं, जो किसी भी रोबोट या एल्गोरिदम के बस की बात नहीं है। अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक साबित होता है और आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मिलने वाले हर उत्तर पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय बच्चों में हर बात पर सवाल पूछने की स्वस्थ आदत डालनी होगी। उन्हें तथ्यों को परखना होगा, तर्कों की कसौटी पर कसना होगा और फिर खुद अपने निर्णय लेने होंगे। तभी समाज में आत्मनिर्भर युवाओं की एक मजबूत पीढ़ी तैयार हो पाएगी।
रटी-रटाई सोच से अलग रचनात्मकता का विकास
विज्ञान के हर आविष्कार की तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी एक दोधारी तलवार की तरह है। इसका सही उपयोग जहां पूरी मानवता के कल्याण के लिए वरदान साबित हो सकता है, वहीं इसका गलत इस्तेमाल बड़े विनाश का कारण बन सकता है। बच्चों को यह लक्ष्मण रेखा खींचनी आनी उन्हें चाहिए कि उन्हें किस जगह तकनीक का सहारा लेना है और कहां अपने खुद के दिमाग का इस्तेमाल करना है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आमतौर पर वही जवाब देता है जो पहले से उसके डेटाबेस में फीड होता है। लेकिन असली शिक्षा लीक से हटकर कुछ नया सोचने और करने में निहित है। बच्चों में कल्पना शक्ति और रचनात्मकता विकसित करना बहुत जरूरी है, जिससे वे नए समाधान तलाश सकें और हर बात की तह तक जाकर खुद नए सवाल खड़े कर सकें। मुश्किलें इंसानी जिंदगी का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। मशीनें फेल होने पर केवल एक एरर मैसेज दिखा देती हैं, लेकिन इंसान गिरकर दोबारा संभलना अच्छी तरह जानता है। स्कूलों का माहौल ऐसा होना चाहिए जहां असफलता को किसी डर की तरह न देखा जाए, बल्कि उसे सीखने और खुद को बेहतर बनाने के एक नए अवसर के रूप में स्वीकार किया जाए। बदलती हुई इस दुनिया में डिग्रियां कुछ ही वर्षों में पुरानी और बेमानी हो जाती हैं, लेकिन सीखने की कला हमेशा इंसान के साथ बनी रहती है। बच्चों के भीतर हर दिन कुछ नया जानने की भूख को हमेशा जिंदा रखना चाहिए, ताकि वे हर दौर के बदलाव के साथ खुद को आसानी से ढाल सकें।
इंटेलेक्चुअल डेवलपमेंट के साथ डिजिटल डिटॉक्स
रटने की पुरानी और घिसी-पिटी प्रक्रिया ने केवल किताबी कीड़े पैदा किए हैं और इससे कभी किसी मजबूत व्यक्तित्व का निर्माण नहीं हुआ है। बाल मनोविज्ञान की बारीकियों को समझते हुए बच्चों की मानसिक और भावनात्मक जरूरतों पर विशेष ध्यान देना होगा। उन्हें किताबी ज्ञान के साथ-साथ दुनिया की व्यावहारिक समझ देना आज के समय की सबसे बड़ी और अहम मांग है। इसके अलावा किस चीज का इस्तेमाल किस हद तक किया जाना चाहिए, इसका रिमोट कंट्रोल हमेशा अपने ही हाथों में होना चाहिए। बच्चों के भीतर आत्म-नियंत्रण का गुण होना बेहद जरूरी है, जिससे वे यह तय कर सकें कि उन्हें कब स्क्रीन से दूर रहना है और कब अपनी नैसर्गिक बुद्धि का इस्तेमाल करना है। सच्चाई, ईमानदारी, मेहनत और परोपकार जैसे शाश्वत मानवीय मूल्य कभी भी पुराने नहीं होते। शिक्षाविद् प्रणीत मुंगाली के अनुसार यदि हमने बच्चों को आधुनिक तकनीक की शिक्षा तो दे दी, लेकिन उन्हें मानवीय मूल्य नहीं सिखाए, तो आज की स्थिति उस अभिमन्यु जैसी हो जाएगी जो चक्रव्यूह के अंदर घुसना तो अच्छी तरह जानता था, लेकिन उसे उससे सुरक्षित बाहर निकलना नहीं आता था। तकनीक और आधुनिकता चाहे जितनी भी आगे बढ़ जाए, लेकिन कोई भी मशीन इंसानियत, संवेदना और मौलिक सोच की जगह कभी नहीं ले सकती। स्कूलों का असली उद्देश्य ऐसे जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक तैयार करना है जो तकनीक को अपने ऊपर कभी हावी न होने दें और उसका इस्तेमाल एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए करें।



















