अकादमिक माहौल में लगातार बढ़ते मानसिक दबाव, परीक्षाओं में कम अंक आने का डर और परिजनों की उम्मीदों का भारी बोझ कई बार युवाओं को अंदर से तोड़ देता है। हॉस्टल के कमरों में तन्हाई और इस गंभीर मानसिक तनाव को न झेल पाने के कारण कई छात्र-छात्राएं बेहद घातक कदम उठा लेते हैं। ऐसी ही हृदयविदारक घटनाओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से सूरत स्थित वीर नर्मद दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी ने एक बेहद महत्वपूर्ण और सराहनीय पहल की है। यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा परिसरों के सभी हॉस्टल्स में पारंपरिक सीलिंग फैंस को हटाकर विशेष प्रकार के एंटी-सुसाइड स्प्रिंग-लोड पंखे लगाए जा रहे हैं, जो इस दिशा में एक ठोस सुरक्षा कवच का काम करेंगे।
अब तक 250 से अधिक पंखे बदले गए
यूनिवर्सिटी के छात्र और छात्राओं के हॉस्टल परिसरों में अब तक 250 से अधिक इस तरह के विशेष पंखे फिट किए जा चुके हैं। इस सुरक्षात्मक बदलाव से किसी भी संभावित अनहोनी को समय रहते विफल किया जा सकेगा। यह कड़ा निर्णय हाल के महीनों में सामने आए छात्रों के दर्दनाक कदमों और देश की सर्वोच्च अदालत तथा यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के सख्त निर्देशों के बाद अमल में लाया गया है। हालांकि, शिक्षाविदों और जानकारों के सामने यह बड़ा सवाल भी खड़ा होता है कि क्या महज पंखों के प्रकार में बदलाव कर देने से युवाओं का मानसिक तनाव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, या फिर इसके लिए हॉस्टल के अंदर के समग्र माहौल और मानसिक स्वास्थ्य सहयोग पर भी उतने ही गाढ़े तौर पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
क्या है इन विशेष पंखों की कीमत और तकनीक
सूरत के इस संस्थान में लगाए जा रहे प्रत्येक एंटी-सुसाइड पंखे की बाजार कीमत लगभग 2500 रुपये के आसपास है। यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर किशोरसिंह चावड़ा ने मीडिया को जानकारी दी कि इन पंखों की खास बात यह है कि जैसे ही इन पर 10 किलोग्राम या उससे अधिक का वजन पड़ता है, पंखा तुरंत नीचे की ओर झुक जाता है और उसके साथ ही बिजली की आपूर्ति भी पूरी तरह से बंद हो जाती है, जिससे आगे का खतरा टल जाता है।
कैसे काम करता है एंटी-सुसाइड पंखा
देखने में यह उपकरण बिल्कुल किसी सामान्य पंखे की तरह ही प्रतीत होता है, लेकिन इसके भीतर एक बेहद जटिल और सुरक्षित स्प्रिंग मैकेनिज्म फिट किया गया होता है। जब कभी इस पंखे पर 10 से 25 किलोग्राम से अधिक का कोई असामान्य या अचानक भार पड़ता है, जैसा कि फंदा लगाने के प्रयास के दौरान होता है, तो इसकी आंतरिक स्प्रिंग तुरंत खुल जाती है। इस तकनीकी प्रक्रिया के कारण पंखा छत से नीचे की तरफ लटक जाता है और इसका लॉकिंग सिस्टम हट जाता है। भार को न संभाल पाने की स्थिति के कारण कोई भी फंदा काम नहीं कर पाता और संबंधित व्यक्ति सुरक्षित रूप से जमीन पर आ गिरता है। इसके अलावा कुछ आधुनिक मॉडल्स में तो भारी दबाव पड़ते ही एक तेज सायरन या अलार्म भी बजने लगता है, जिससे तुरंत आसपास के लोगों को इस असामान्य गतिविधि की भनक लग जाती है और वे मौके पर पहुंचकर मदद कर सकते हैं।
कोटा मॉडल से मिली प्रेरणा और सूरत में विस्तार
हॉस्टल्स में इस प्रकार के एंटी-सुसाइड पंखे और बालकनी में सुरक्षात्मक जालियां लगाने की इस अनूठी पहल की शुरुआत असल में राजस्थान के कोटा शहर से हुई थी, जिसे देश का प्रमुख कोचिंग हब माना जाता है। साल 2017 में कोटा हॉस्टल एसोसिएशन की तरफ से पहली बार इस तरह का प्रस्ताव सामने रखा गया था। इसके बाद साल 2023 के दौरान वहां दर्ज किए गए अप्रत्याशित और रिकॉर्ड मामलों के बाद इसे पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया गया था। अब इसी सफल मॉडल का अनुसरण करते हुए वीर नर्मद दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी ने अपने कुल 312 हॉस्टल कमरों, जिनमें लगभग 840 छात्र निवास करते हैं, के सभी 388 पंखों को चरणबद्ध तरीके से बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस पूरी योजना के तहत जीईएम पोर्टल के माध्यम से 375 अत्याधुनिक बीएलडीसी मोटर वाले आधुनिक पंखे मंगवाए गए हैं।
एनसीआरबी के आंकड़े और अदालत की सख्ती
नेपाल और भारत के समग्र आंकड़ों पर अगर पैनी नजर डाली जाए तो वर्तमान स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि भारत के भीतर साल 2019 की तुलना में साल 2023 के दौरान छात्रों की खुदकुशी की वारदातों में सीधे तौर पर 34 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। यह चिंताजनक आंकड़ा बढ़कर सीधे 13,892 तक पहुंच चुका था। इसके बाद आने वाले वर्षों यानी 2024 और 2025 में भी यह भयावह सिलसिला थमता हुआ नजर नहीं आया। इन सब के बीच भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक विशेष बेंच ने इस पूरी प्रवृत्ति पर अपनी गहरी वेदना और दुख व्यक्त करते हुए देश के तमाम शैक्षणिक संस्थानों को यह कड़े निर्देश दिए थे कि वे अपने परिसरों में सुरक्षा के पुख्ता उपाय और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की बेहतरीन सुविधाएं तुरंत मुहैया कराएं।
तकनीक के साथ भावनात्मक संबल भी है जरूरी
मनोवैज्ञानिकों और काउंसलर्स का मानना है कि इस प्रकार के एंटी-सुसाइड पंखे लगाना या बालकनी और गलियारों में नेट लगाना केवल एक फिजिकल बैरियर या भौतिक रुकावट का काम करता है, लेकिन यह किसी भी सूरत में समस्या का कोई स्थायी और अंतिम समाधान नहीं हो सकता। अक्सर देखा जाता है कि कई छात्र परीक्षाओं में विफल होने, अपने भविष्य और करियर को लेकर अत्यधिक चिंता में डूबने अथवा सीनियर छात्रों द्वारा मानसिक उत्पीड़न का शिकार होने के कारण गंभीर अवसाद की स्थिति में चले जाते हैं। सूरत मेडिकल कॉलेज में इसी साल अगस्त के महीने में हुई एक घटना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसलिए तकनीकी बदलावों के साथ-साथ हॉस्टल परिसरों में एक दोस्ताना और खुला माहौल तैयार करना, नियमित अंतराल पर मेंटल हेल्थ काउंसलिंग सेशन का आयोजन करना और छात्रों के मन से यह बात निकालना कि असफलता जीवन का अंत है, सबसे अधिक महत्वपूर्ण और प्रासंगिक कदम है।



















