जब गांव ने खुद उठाई जिम्मेदारी
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक छोटा सा गांव है, लोहर्सी, जहां पिछले तीन दशकों से ग्रामीण एकजुट होकर अपने सार्वजनिक संसाधनों की देखभाल खुद कर रहे हैं। यहां की पचरी समिति किसी सरकारी योजना की देन नहीं बल्कि आम ग्रामीणों की सामूहिक इच्छाशक्ति का नतीजा है। करीब 85 सदस्यों वाली इस समिति ने गांव के तालाबों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों को वर्षों की मेहनत से नया रूप दिया है।
दुर्गा पूजा से जन्मी, विकास की राह पर चली
समिति के अध्यक्ष मनीष साहू ने TrendKia को बताया कि 1992 में यह संगठन एक दुर्गा पूजा समिति के रूप में अस्तित्व में आया था। जैसे-जैसे साल बीते, ग्रामीणों को यह साफ दिखने लगा कि गांव के तालाबों और सार्वजनिक जगहों की देखरेख के लिए संगठित प्रयास जरूरी हैं। तब से समिति ने यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली और आज भी उसी लगन के साथ काम जारी है।
5000 की आबादी वाले इस गांव में लगभग 75 प्रतिशत लोग रोजाना के कामों के लिए तालाबों पर निर्भर हैं। ऐसे में समिति का यह निरंतर काम ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी से सीधे जुड़ा हुआ है।
बैलगाड़ियों से शुरू हुई थी यह यात्रा
समिति से लंबे अरसे से जुड़े बुजुर्ग साहेब दास के पास उन शुरुआती दिनों की जीवंत यादें हैं। उन्होंने बताया कि 1992 में जब मोंगरा तालाब के किनारे पचरी और घाट बनाने की बात हुई, तब बैलगाड़ियों में भरकर मिट्टी और निर्माण सामग्री लाई गई थी। उस दौर की कड़ी मेहनत आज भी समिति की रग-रग में बसी है और नए सदस्य उसी जज्बे के साथ काम करते हैं।
चंदा और श्रमदान, दो स्तंभों पर टिका काम
समिति का पूरा कामकाज सदस्यों के आर्थिक योगदान और स्वयंसेवी श्रम पर चलता है। ग्रामीणों से मिली सहयोग राशि से तालाबों की सफाई, गहरीकरण, पोटाश का छिड़काव और आसपास की स्वच्छता सुनिश्चित की जाती है। महिलाओं के लिए तालाब किनारे पचरी, चबूतरा और पक्के बैठने के स्थान बनाए गए हैं ताकि उन्हें सुविधा हो। समिति की मेहनत देखकर ग्राम पंचायत ने भी तालाब क्षेत्र में अतिरिक्त निर्माण कार्य कराए।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा यह संकल्प
समिति के सचिव भौंरानंद साहू की कहानी इस आंदोलन की गहराई बताती है। उन्होंने बताया कि उनके पिता इस समिति के सक्रिय सदस्य रहे हैं, और उन्हीं को देखकर वे भी इस काम से जुड़े। भौंरानंद साहू ने कहा कि तालाबों की निगरानी, नियमित सफाई, पोटाश डालने और हर तरह के रखरखाव का काम सदस्य मिलकर करते हैं। लोहर्सी की पचरी समिति साबित करती है कि जब एक पूरा गांव एक मकसद से एकजुट हो, तो बिना किसी बड़े सरकारी सहारे के भी 30 साल तक तालाबों और मंदिरों को जीवित रखा जा सकता है।













