बालोद में लगातार हो रही बारिश और हवा में बढ़ी नमी अब सब्जियों की फसलों के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। कृषि विज्ञान केंद्र, बालोद के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ बलदेव अग्रवाल ने किसानों को आगाह किया है कि बरसात के इस मौसम में कीट और फफूंद से जुड़ी बीमारियां कई गुना तेजी से फैलती हैं, और अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो चंद दिनों में ही पूरी फसल चौपट हो सकती है।
क्यों बढ़ रहा है फफूंद का खतरा
डॉ अग्रवाल के मुताबिक बारिश के दिनों में हवा में नमी का स्तर लगातार ऊंचा बना रहता है, जिससे फफूंद को पनपने के लिए मुफीद माहौल मिल जाता है। उन्होंने एक अहम संकेत भी दिया है, अगर किसी इलाके में लगातार तीन से चार दिन तक धूप नहीं निकलती, तो पांचवें दिन से ही सब्जियों में डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू जैसी फफूंदजनित बीमारियां सिर उठाने लगती हैं। यही वजह है कि उनका कहना है कि किसानों को बीमारी के फैलने का इंतजार करने के बजाय पहले से ही एहतियाती कदम उठाने चाहिए, क्योंकि एक बार संक्रमण शुरू हो जाए तो उसे रोकना मुश्किल हो जाता है।
शुरुआती चरण में ही रोकथाम क्यों जरूरी
विशेषज्ञ ने साफ किया कि बाविस्टिन और रेडोमिल जैसी उपयुक्त फफूंदनाशक दवाओं का सही समय पर छिड़काव कर इन बीमारियों को काबू में लाया जा सकता है। उनके मुताबिक सबसे कारगर तरीका यही है कि बीमारी के लक्षण दिखने से पहले ही एक प्रिवेंटिव स्प्रे कर दिया जाए। अगर रोकथाम शुरुआती अवस्था में ही हो जाए तो फसल पूरी तरह सुरक्षित रहती है, लेकिन एक बार बीमारी पूरी तरह फैल जाने के बाद दवा का असर काफी घट जाता है और कई मामलों में पूरी फसल बर्बाद होने की नौबत आ जाती है।
पत्तियों पर दिखने वाले लक्षणों को कैसे पहचानें
डॉ अग्रवाल ने किसानों को शुरुआती लक्षण पहचानने का तरीका भी विस्तार से समझाया। जो किसान खीरा, ककड़ी, लौकी, कद्दू, तरबूज, खरबूजा, करेला और तुरई जैसी कद्दूवर्गीय सब्जियां उगा रहे हैं, उनके लिए पत्तियों के ऊपरी हिस्से पर सफेद पाउडर जैसी परत दिखना पाउडरी मिल्ड्यू का पहला संकेत है। इसके उलट डाउनी मिल्ड्यू में फफूंद पत्तियों के निचले हिस्से में विकसित होती है और पत्तियों पर पीले धब्बे उभरने लगते हैं। वहीं अगर पत्तियों पर गोल-गोल छल्लों जैसे निशान नजर आएं, तो यह अल्टरनेरिया बीमारी का इशारा हो सकता है। उनकी सलाह है कि ऐसे कोई भी लक्षण दिखते ही तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क कर उचित दवा का छिड़काव करा लेना चाहिए, ताकि संक्रमण बाकी पौधों तक न पहुंच सके।
हर पीली पत्ती बीमारी नहीं होती
डॉ अग्रवाल ने एक और अहम बिंदु की ओर किसानों का ध्यान खींचा कि अक्सर किसान पत्तियों के पीले पड़ने को सीधे बीमारी मान बैठते हैं, जबकि कई बार इसकी असली वजह खेत में भरा अतिरिक्त पानी भी होती है। जब खेत में पानी लंबे समय तक जमा रहता है तो पौधों की जड़ों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे फसल धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है। इसीलिए उनका कहना है कि खेत से फालतू पानी की निकासी का सही इंतजाम करना भी उतना ही जरूरी है जितना समय पर फफूंदनाशक का छिड़काव करना।
किसानों को क्या करना चाहिए
डॉ अग्रवाल ने किसानों से अपील की है कि वे पूरे बरसात के मौसम में अपनी फसल का नियमित निरीक्षण करते रहें, शुरुआती लक्षणों को हल्के में न लें और समय रहते रोकथाम के उपाय अपनाएं। उनका कहना है कि थोड़ी सी सतर्कता और सही समय पर उठाया गया एक छोटा कदम किसानों को भारी आर्थिक नुकसान से बचा सकता है और सब्जियों की बेहतर पैदावार सुनिश्चित कर सकता है।




















