त्योहारों के मौसम में बाजारों के भीतर सजावटी फूलों की मांग में भारी उछाल दर्ज किया जाता है। घरों के प्रवेश द्वारों की सजावट से लेकर दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों, पूजा अनुष्ठानों और बड़े धार्मिक आयोजनों में गेंदे के फूलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। बाजार की इसी तेज मांग को आमदनी का साधन बनाते हुए छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की दो महिला किसानों ने अपनी आजीविका संवारने की ठोस पहल की है। साकालो गांव की रहने वाली चंचल सिंह और चांदनी मंडल ने सरकारी सहायता का लाभ उठाकर गेंदे की व्यावसायिक खेती शुरू की है, जिससे उनके परिवारों को नियमित आय मिलने की नई राह खुली है।
बिहान योजना के कर्ज से मिली स्वरोजगार की नींव
साकालो गांव की चंचल सिंह और चांदनी मंडल पारंपरिक फसलों की अनिश्चितता और सीमित मुनाफे से आगे बढ़कर कुछ नया करना चाहती थीं। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और ग्रामीण स्तर पर स्वरोजगार के अवसर तैयार करने के लिए संचालित बिहान योजना ने उन्हें यह मंच उपलब्ध कराया। दोनों महिला किसानों ने बिहान योजना के तहत आवश्यक वित्तीय ऋण लिया और गेंदे के फूलों की खेती में निवेश किया। योजना से मिली वित्तीय सहायता ने उन्हें खाद, बीज और खेत की तैयारी के जरूरी संसाधन जुटाने का संबल दिया, जिसके दम पर उन्होंने बिना किसी आर्थिक अड़चन के अपने खेत में फूलों की क्यारियां तैयार कीं।
त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने से बेहतर मुनाफे की उम्मीद
दीपावली और अन्य धार्मिक पर्वों के दौरान गेंदे के पीले और नारंगी फूलों की बिक्री चरम पर पहुंच जाती है। मंदिरों में होने वाली दैनिक पूजा, विशेष धार्मिक अनुष्ठानों और रिहायशी परिसरों की साज-सज्जा के लिए स्थानीय मंडियों में भारी मात्रा में फूल खरीदे जाते हैं। चंचल सिंह और चांदनी मंडल ने अपनी फसल की तैयारी को इसी त्योहारी समय के अनुरूप ढाला है। बाजार में फूलों की मजबूत मांग के चलते दोनों महिला किसानों को अपनी उपज का बेहतर भाव मिलने और लागत के मुकाबले शानदार मुनाफा कमाने की पूरी उम्मीद है। स्थानीय स्तर पर उत्पादित ताजे फूलों की उपलब्धता से व्यापारियों और ग्राहकों को भी सुविधा मिल रही है।
ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की नई मिसाल
चंचल सिंह और चांदनी मंडल की कड़ी मेहनत ने यह साबित कर दिखाया है कि सही मार्गदर्शन और संस्थागत समर्थन मिलने पर खेती को एक लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है। दोनों किसान किसी अन्य पर आर्थिक रूप से निर्भर रहने के बजाय अपनी मेहनत से परिवार की आमदनी बढ़ाने में जुटी हैं। उनका यह कदम ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार और आर्थिक स्वतंत्रता का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं का सही दिशा में सदुपयोग किया जाए और किसानों को बेहतर बाजार से जोड़ा जाए, तो फूलों की व्यावसायिक खेती आजीविका का एक स्थायी और मजबूत माध्यम साबित हो सकती है।



















