छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में पर्व और उत्सव हमेशा से खेती-किसानी और प्रकृति से जुड़े रहे हैं। दीपावली के पावन अवसर पर यहां केवल दीये जलाने या मां लक्ष्मी की आराधना करने की ही रीत नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी कई ऐसी अनूठी परंपराएं भी निभाई जाती हैं जो धरती और अन्न से सीधे जुड़ती हैं। ऐसी ही एक बेहद खास और लोकप्रिय परंपरा नई धान की सुनहरी बालियों से तैयार की जाने वाली चिराई चुनिया की है। इसे दीपावली के दिन घर के आंगन और मुख्य प्रवेश द्वार पर लगाने का रिवाज पीढ़ियों से चला आ रहा है। इन दिनों न्यायधानी बिलासपुर के हाट-बाजारों में इस पारंपरिक हस्तशिल्प की जबरदस्त रौनक देखने को मिल रही है, जहां ग्रामीण अंचलों से आए कारीगर अपनी कला का हुनर बिखेर रहे हैं।
धान की नई फसल और लोक आस्था का अटूट संगम
चिराई चुनिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे खेतों में धान की नई फसल तैयार होने के तुरंत बाद ताजी बालियों को चुनकर बनाया जाता है। ग्रामीण और लोक मान्यताओं में नई धान की बालियों को साक्षात धन-धान्य, अन्नपूर्णा और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। दीपावली की शाम जब विधि-विधान के साथ माता लक्ष्मी और भगवान गणेश का पूजन संपन्न होता है, तब इस चिराई चुनिया की भी पूरे आदर के साथ पूजा की जाती है। इसके बाद इसे परिवार की बरकत और खुशहाली की कामना करते हुए घर के मुख्य द्वार पर टांग दिया जाता है। लोक विश्वास है कि मुख्य चौखट पर बंधी यह धान की सजावट घर में अन्न की कमी कभी नहीं होने देती और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
बिलासपुर के देवकीनंदन चौक पर उमड़ी खरीदारों की भीड़
त्योहार के आते ही बिलासपुर शहर के प्रमुख व्यापारिक केंद्र देवकीनंदन चौक पर चिराई चुनिया की दर्जनों अस्थाई दुकानें सज गई हैं। बाजार में अलग-अलग कलात्मक आकारों, लंबाई और मनमोहक बनावट में तैयार चुनिया को देखकर हर आने-जाने वाला बरबस ही रुक रहा है। स्थानीय लोग अपनी पारिवारिक और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने के लिए बड़ी संख्या में खरीदारी कर रहे हैं। कई लोग इसे अपने नए मकान की चौखट सजाने के लिए ले जा रहे हैं, तो कई पुरानी परंपरा का मान रखने के लिए इसे अपनी दिवाली खरीदारी का अनिवार्य हिस्सा बना चुके हैं। इस पारंपरिक कला ने न केवल आधुनिक चकाचौंध के बीच ग्रामीण लोक संस्कृति का अस्तित्व बचाए रखा है, बल्कि त्योहारी सीजन में ग्रामीण परिवारों के लिए रोजी-रोटी का मजबूत जरिया भी खोल दिया है।
आस्था और परंपरा से जुड़ी संगीता पांडे का अनुभव
बाजार में खरीदारी करने पहुंचीं संगीता पांडे बताती हैं कि वे हर वर्ष दीपावली पर चिराई चुनिया अवश्य खरीदती हैं। उनके अनुसार इसे घर ले जाकर सबसे पहले शुभ मुहूर्त में लक्ष्मी पूजा के दौरान रखा जाता है और विधिवत अर्चना की जाती है। पूजा के उपरांत ही इसे घर की मुख्य चौखट पर बांधा जाता है। संगीता पांडे का कहना है कि यह केवल सजावट की कोई वस्तु नहीं है, बल्कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर का एक अभिन्न हिस्सा है। इसे घर में लगाना धन-संपदा, सौभाग्य और पारिवारिक समृद्धि का शुभ संकेत माना जाता है, इसलिए हर घर में इसका होना आवश्यक समझा जाता है।
दशहरा बीतते ही शुरू होती है कारीगरों की कठिन साधना
खेतों में जब धान की बालियां पककर पीली होने लगती हैं, तभी से इस कलाकृति को गढ़ने का श्रमसाध्य सिलसिला शुरू हो जाता है। दशहरा का त्योहार बीतते ही मुंगेली और आसपास के ग्रामीण अंचलों में परिवार के सदस्य मिलकर धान की छांटी गई बालियों से इसे पिरोने में जुट जाते हैं। मुंगेली जिले से बिलासपुर पहुंचे कारीगर आशीष लहरे ने बताया कि चिराई चुनिया तैयार करना कोई साधारण काम नहीं है। एक अकेला आकर्षक फूल बनाने में कारीगर को करीब आधे घंटे का एकाग्र समय लग जाता है। इसमें नाजुक बालियों को बिना दाने गिराए सावधानी से बांधना और मोड़ना पड़ता है, जिसमें हुनर और लंबे धैर्य की आवश्यकता होती है। यह सजावट केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति और परिंदों के लिए भी मानी जाती है। मान्यता है कि दरवाजों पर बंधी धान की बालियों से चिड़ियां दाना चुगती हैं, जिसे बेहद शुभ और पुण्यकारी माना गया है।
मुंगेली के 20 कारीगरों ने तैयार कीं 5 हजार चिराई चुनिया
देवकीनंदन चौक पर अपनी हस्तकला लेकर पहुंचे कारीगरों के दल में मुंगेली जिले के करीब 20 लोग शामिल हैं। इस पूरे समूह ने मिलकर रात-दिन की मेहनत से लगभग 5 हजार चिराई चुनिया तैयार की हैं, जिन्हें वे शहर के लोगों तक पहुंचाने आए हैं। आशीष लहरे का कहना है कि साल भर चाहे जैसी भी परिस्थिति रहे, लेकिन दीपावली पर इस पारंपरिक कला की बिक्री से जो आमदनी होती है, उससे उनके पूरे परिवार का त्योहार बेहद खुशी से बीत जाता है। बच्चों के नए कपड़े, घर का राशन और त्योहार के तमाम जरूरी खर्च इसी बिक्री से निकल आते हैं। वे शहर के ग्राहकों से मिलने वाले प्रेम, सम्मान और सहयोग को ही अपनी कड़ी मेहनत का सबसे बड़ा पुरस्कार मानते हैं।
बजट के अनुसार 20 से 100 रुपये तक के विकल्प
बाजार में आम ग्राहकों की जेब और पसंद का भी पूरा ख्याल रखा गया है। चिराई चुनिया की बिक्री 20 रुपये से शुरू होकर 50, 60 और बेहतरीन डिजाइनों के लिए 100 रुपये तक की दर पर हो रही है। कम कीमत होने की वजह से हर वर्ग का व्यक्ति इसे सहजता से खरीद पा रहा है। कोई साधारण लड़ी पसंद कर रहा है, तो कोई भारी और सघन बालियों वाली चुनिया अपनी चौखट के लिए चुन रहा है।
हार, पान कट और डबल मंजिल डिजाइनों की भारी मांग
समय के साथ चिराई चुनिया के निर्माण में नवाचार भी खूब देखने को मिल रहा है। कारीगर अब इसे केवल पारंपरिक लड़ी के रूप में ही नहीं बनाते, बल्कि नए-नए फैंसी डिजाइन भी ढाल रहे हैं। पिछले 5 से 7 वर्षों से इस विधा से जुड़े नंद कुमार पात्रे बताते हैं कि वे ग्राहकों के बदलते मिजाज को देखते हुए हर साल कुछ नया गढ़ने की कोशिश करते हैं। इस बार बाजार में हार डिजाइन, दिल कट, पान कट और डबल मंजिल जैसी सुंदर किस्में उपलब्ध कराई गई हैं। हर एक डिजाइन की अपनी अलग संरचना, मेहनत और मूल्य है। पान कट और हार कट की बनावट को लोग अपने दरवाजों के लिए विशेष तौर पर पसंद कर रहे हैं, जिससे इन डिजाइनों की मांग काफी तेज है।
ग्रामीण आजीविका और सांस्कृतिक संरक्षण का खूबसूरत माध्यम
यह पारंपरिक लोक कला आज छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल के परिवारों के लिए त्योहारी मौसम में अतिरिक्त कमाई का एक मजबूत और सम्मानजनक जरिया बन चुकी है। दशहरा के बाद से खेतों और आंगनों में शुरू हुई यह मेहनत दीपावली के चंद दिनों पहले शहरों के बाजारों में उम्मीद बनकर उतरती है। देवकीनंदन चौक पर बैठे दुकानदारों को पूरी उम्मीद है कि जैसे-जैसे लक्ष्मी पूजन की तिथि पास आएगी, शहरवासियों की आवाजाही और बिक्री का आंकड़ा और तेज रफ्तार पकड़ेगा। नई धान की खुशबू से सराबोर यह चिराई चुनिया जहां एक तरफ छत्तीसगढ़ की माटी की पुरानी संस्कृति को जीवित रखे हुए है, वहीं दूसरी ओर गांव के श्रमजीवियों की रोजी-रोटी को भी सशक्त संबल प्रदान कर रही है।





















