हाथों में गीली चिकनी मिट्टी और घूमते हुए देसी चाक की धुरी पर जब कला का संगम होता है, तो पारंपरिक बर्तन नया जीवन पा लेते हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के दरिमा क्षेत्र में पड़ने वाले कुम्हरता के निवासी मुन्ना इसी प्राचीन हुनर को आज भी सहेजे हुए हैं। उन्होंने किसी औपचारिक शिक्षण संस्थान या गुरु से यह हुनर नहीं सीखा, बल्कि अपने पुरखों और बुजुर्गों को देखकर इस पारंपरिक काम की बारीकियों को आत्मसात किया। लगभग 12 से 15 वर्षों से मिट्टी के बर्तन तैयार करने के इस काम से जुड़े मुन्ना आज भी अपनी पुश्तैनी विरासत और शिल्प को जीवित रखे हुए हैं।
बुजुर्गों को देखकर सीखी चाक और मिट्टी की कला
कुम्हरता के मुन्ना बताते हैं कि इस काम को करते हुए उन्हें 10 से 12 साल से भी अधिक का समय बीत चुका है। उनके बचपन में घर के बुजुर्ग और पूर्वज दिनभर चाक पर बैठकर मिट्टी को नए-नए रूप देते थे। मुन्ना शांत रहकर उनकी उंगलियों की हर हरकत और मिट्टी को संभालने के सलीके को ध्यान से देखा करते थे। उन्होंने कोई किताबी पढ़ाई नहीं की और न ही कहीं औपचारिक दाखिला लिया, बल्कि घर की चौखट पर बड़ों के अनुभवों से ही मिट्टी के काम का ककहरा सीखा। वही व्यावहारिक सीख आज उनकी पहचान और परिवार की रोटी का मुख्य जरिया बनी हुई है।
दीये, गुल्लक से लेकर हांड़ी और दोहना बनाने में महारत
चाक पर गीली मिट्टी रखते ही मुन्ना की उंगलियां जादू जैसा काम करती हैं। वे केवल सामान्य दीये ही नहीं बनाते, बल्कि रोजमर्रा और तीज-त्योहारों में काम आने वाली कई वस्तुएं गढ़ते हैं। इनमें बचत के लिए गुल्लक, खानपान के लिए दोहना, तेलई, कढ़ाई, मिट्टी का बटुआ, हांड़ी और पानी के लिए पारंपरिक मटके शामिल हैं। मुन्ना के अनुसार, मिट्टी को गूंधने से लेकर उसे चाक पर चढ़ाने और फिर इस्तेमाल के लायक पकाने तक का पूरा हुनर धैर्य मांगता है। वे हर तरह के पारंपरिक पात्र तैयार करने में पूरी तरह पारंगत हो चुके हैं।
लकड़ी के देसी चाक पर एक सप्ताह की कड़ी मेहनत
मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में मुन्ना विशुद्ध चिकनी मिट्टी का उपयोग करते हैं। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव और जरूरत के अनुसार जुगाड़ से लकड़ी का एक देसी चाक भी तैयार किया है। इसी चाक को घुमाकर वे मिट्टी को मनचाहा आकार देते हैं। किसी भी बर्तन को तैयार करने का सफर आसान नहीं होता। खेत या खदान से चिकनी मिट्टी लाने, उसे साफ करने, भिगोने, गूंधने, चाक पर ढालने, सुखाने और पकाने की पूरी प्रक्रिया में लगभग एक सप्ताह का समय लग जाता है।
दीपावली पर पांच रुपये में बिकता है एक दीया
त्योहारी मौसम, विशेषकर दीपावली के करीब आते ही मुन्ना के काम की रफ्तार बढ़ जाती है। इन दिनों वे पूरी तन्मयता से मिट्टी के दीये तैयार करने में जुटे हैं। मुन्ना बताते हैं कि चाक पर एक दीया ढालने में करीब दो से तीन मिनट का समय लगता है, लेकिन इसे पकाने और तैयार करने में काफी शारीरिक श्रम लगता है। वे अपने बनाए दीये और अन्य मिट्टी के सामान बेचने के लिए खुद बाजार जाते हैं। वर्तमान में वे एक दीये की कीमत लगभग पांच रुपये रखते हैं, जिससे खरीदारों को किफायती दर पर शुद्ध हस्तनिर्मित दीये मिल पाते हैं।
बिना पढ़ाई के हुनर बना परिवार का सहारा
शिक्षा का अवसर न मिलने के बावजूद मुन्ना ने अपने हुनर को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया है। सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत करने के बाद वे रोजाना करीब 200 से 400 रुपये तक कमा लेते हैं। जब दीपावली जैसे बड़े त्योहार आते हैं, तब दीयों और अन्य बर्तनों की मांग बढ़ने से कमाई में थोड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद बंधती है। सीमित संसाधनों और मामूली आय के बीच भी वे इसी शिल्प के दम पर अपने पूरे परिवार का पालन-पोषण पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं।
पारंपरिक खानपान में आज भी कायम है मिट्टी के बर्तनों का महत्व
मुन्ना का कहना है कि उनके परिवार में पीढ़ियों से चले आ रहे इस काम की अहमियत आज भी कम नहीं हुई है। आधुनिक युग में बाजार तरह-तरह के धातु और प्लास्टिक के बर्तनों से भरा पड़ा है, लेकिन पारंपरिक खानपान में मिट्टी के बर्तनों की जगह कोई नहीं ले सका है। खास तौर पर दोहना और हांड़ी जैसे बर्तनों का इस्तेमाल आज भी खीर और अन्य पकवान बनाने के लिए किया जाता है, जिसमें दूध और चावल का स्वाद मिट्टी की सौंधी खुशबू से और निखर जाता है। मुन्ना मानते हैं कि आधुनिकता के दौर में भी हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तनों की साख और सांस्कृतिक पहचान पूरी तरह सुरक्षित है।



















