छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित नगर पंचायत मल्हार के किसान यदुनंदन प्रसाद वर्मा ने खेती के पारंपरिक तौर-तरीकों से अलग हटकर एक अनूठा प्रयोग किया है। डीजे वर्मा जैविक कृषि फार्म में उन्होंने बिना किसी भारी-भरकम जुताई और बिना किसी रासायनिक निवेश के प्राकृतिक पद्धति से बरबट्टी की हरी-भरी फसल खड़ी कर दी है। किसान ने घर पर सुरक्षित रखे पुराने बीजों का इस्तेमाल कर न्यूनतम लागत में यह पैदावार ली है, जिससे मौजूदा बाजार भावों के बीच बेहतर मुनाफे की मजबूत उम्मीद दिखाई दे रही है।
बाढ़ में कद्दू खराब होने के बाद तुरंत उठाया यह कदम
यदुनंदन प्रसाद वर्मा के खेत में पहले से ही सुनियोजित ढंग से बागवानी फसलें लगाई गई हैं, जहां एक कतार में कटहल और समानांतर दूसरी कतार में मुनगा के पौधे लहलहा रहे हैं। इसी जमीन पर बीच के हिस्से में पहले कद्दू की खेती की गई थी। भारी बारिश के मौसम में खेत में अत्यधिक पानी जमा हो जाने की वजह से कद्दू की पूरी फसल पूरी तरह नष्ट हो गई। सामान्य तौर पर ऐसे नुकसान के बाद किसान खेत को सुखाकर दोबारा गहरी जुताई में समय और पैसा लगाते हैं, लेकिन वर्मा ने बिना कोई जुताई किए उसी गीली और खाली जमीन में तत्काल बरबट्टी के बीज बोने का त्वरित निर्णय लिया।
बिना जुताई और गुड़ाई के सादगी से की गई बुवाई
बरबट्टी लगाने के लिए खेत में किसी भी ट्रैक्टर, हल या गहरी गुड़ाई का सहारा नहीं लिया गया। किसान ने केवल हाथ की गुदाल से निर्धारित स्थानों पर जमीन को थोड़ा सा पोला किया और उसमें घर में पहले से रखे हुए देशी बरबट्टी के बीज डाल दिए। खेत की प्राकृतिक मिट्टी को छेड़े बिना की गई इस बुवाई से न तो ईंधन का कोई खर्च हुआ और न ही महंगे संकर बीजों की खरीद पर पैसे लगे। बाहरी लागत लगभग शून्य रहने की वजह से फसल की शुरुआत से ही किसान का आर्थिक जोखिम पूरी तरह खत्म हो गया।
जमीन पर बेल फैलाने के प्राकृतिक फायदे
सब्जी वर्गीय फसलों में आमतौर पर लताओं को बांस, लकड़ी, तार या प्लास्टिक की रस्सियों का ढांचा बनाकर ऊपर चढ़ाया जाता है, जिसमें काफी श्रम और सामग्री की लागत आती है। यदुनंदन प्रसाद वर्मा ने इस अतिरिक्त खर्च को पूरी तरह टालते हुए बरबट्टी की बेलों को सीधे जमीन पर ही प्राकृतिक रूप से फैलने दिया। इस तरीके के कई दोहरे फायदे सामने आए। जमीन पर फैली घनी पत्तियों ने प्राकृतिक आवरण तैयार कर दिया, जिससे तेज धूप में भी मिट्टी की आंतरिक नमी लंबे समय तक सुरक्षित रही। नमी बरकरार रहने से जमीन के भीतर मौजूद लाभदायक सूक्ष्मजीव पूरी तरह सक्रिय रहे और उन्होंने मिट्टी की जैविक बनावट को प्राकृतिक रूप से समृद्ध बनाए रखा। इसके अलावा जमीन ढंक जाने से गैर-जरूरी खरपतवारों का उगना और बढ़ना भी काफी हद तक रुक गया।
कम लागत और न्यूनतम निराई से जीरो बजट का मॉडल
इस पूरे प्रयोग में किसान का मुख्य खर्च केवल घर में उपलब्ध बीजों के रूप में ही रहा। फसल की देखरेख के दौरान केवल जरूरत पड़ने पर सीमित निराई की गई। निराई के बाद निकाले गए खरपतवार को खेत से बाहर फेंकने के बजाय वहीं जमीन पर छोड़ दिया गया, ताकि वह सड़कर प्राकृतिक खाद का काम कर सके। रासायनिक खाद और कीटनाशकों से पूरी तरह दूरी बनाकर तैयार की गई यह व्यवस्था सही मायनों में कम लागत और प्राकृतिक खेती का एक व्यावहारिक उदाहरण बनकर सामने आई है।
बाजार में मजबूत भाव और बेहतर मुनाफे का गणित
उत्पादन के समय सब्जी मंडियों में मिलने वाले दाम भी किसान के इस प्रयोग को आर्थिक रूप से मजबूती दे रहे हैं। 2 अक्टूबर के आसपास के समय में खुदरा बाजार में बरबट्टी के भाव करीब 50 से 60 रुपये प्रति किलो के स्तर पर चल रहे थे, जबकि थोक मंडी में यह उपज करीब 35 से 40 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रही थी। यदुनंदन प्रसाद वर्मा का अनुमान है कि यदि प्राकृतिक तरीकों से उचित प्रबंधन के साथ बरबट्टी का सही समय पर भरपूर उत्पादन लिया जाए, तो प्रति एकड़ लगभग 2 लाख रुपये तक की सकल आय अर्जित की जा सकती है। हालांकि वास्तविक आमदनी हमेशा कुल उपज और बाजार के तात्कालिक उतार-चढ़ाव पर निर्भर करेगी।
जैविक खेती को लेकर दिया प्रेरक संदेश
बिलासपुर जिले में भारतीय किसान संघ के जिला जैविक प्रमुख के पद पर कार्यरत यदुनंदन प्रसाद वर्मा का मानना है कि किसानों को अपनी खेती की लागत घटाने के लिए स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना चाहिए। पहले से मौजूद परिस्थितियों और खाली पड़ी जमीन का सूझबूझ से उपयोग करके जोखिम को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सकता है। उनकी यह बरबट्टी की फसल साबित करती है कि बिना किसी अतिरिक्त वित्तीय बोझ के भी किसान प्रकृति के नियमों के साथ चलकर सम्मानजनक उत्पादन और अतिरिक्त आमदनी हासिल कर सकते हैं।



















