शहर की सड़कों पर और सरकारी दफ्तरों के इर्द-गिर्द कई छोटे व्यापारी अपनी जीविका चलाते नजर आते हैं, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह काम सिर्फ पेट पालने का साधन नहीं बल्कि उनकी पहचान बन चुका है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले रामकुमार देवांगन ऐसे ही एक समर्पित शख्स हैं, जो बीते लगभग तीन दशकों से अपनी सिर पर नारियल की टोकरी उठाए शहर की अलग-अलग गलियों में घूमते हैं। जहां आज के दौर में लोग पुश्तैनी और पारंपरिक काम छोड़कर नए रास्तों की तलाश में हैं, वहीं रामकुमार पूरी निष्ठा के साथ इसी काम के सहारे अपने परिवार की गाड़ी आगे बढ़ा रहे हैं।
पिता से विरासत में मिला नारियल बेचने का हुनर
रामकुमार देवांगन ने यह कारोबार अपने परिवार से ही सीखा है। उनके पिता और घर के अन्य सदस्य पहले से ही नारियल बेचने का काम करते थे, जिसे आगे चलकर रामकुमार ने भी अपना लिया। पिछले तीस सालों से वह लगातार इस पेशे से जुड़े हुए हैं। उनके लिए यह केवल व्यापार नहीं है, बल्कि उस पुरानी परंपरा को जीवित रखने का माध्यम है जिससे उनके घर का चूल्हा जलता है और परिवार की तमाम जरूरतें पूरी होती हैं।
5 रुपये से बढ़कर 30 रुपये तक पहुंची कीमत
समय के साथ महंगाई और बाजार के हालात कैसे बदले हैं, इसकी एक बानो रामकुमार का कारोबार देता है। जब उन्होंने इस काम की शुरुआत की थी, तब बाजार में एक नारियल मात्र 5 रुपये में मिल जाता था। उस वक्त लोग नारियल को कटवाकर उसका एक छोटा टुकड़ा करीब 1 रुपये में खरीद लेते थे। बीतते वक्त के साथ कीमतें बढ़ती गईं और आज एक पूरा नारियल 20 से 30 रुपये तक बिकता है। हालांकि, आम ग्राहकों की सहूलियत को देखते हुए रामकुमार आज भी लोगों को करीब 10 रुपये में नारियल का टुकड़ा बेच देते हैं।
रोजाना की कमाई और बदलता ग्राहक वर्ग
बदलते वक्त के साथ खानपान की आदतों और बाजारों के मिजाज में फर्क आया है, जिसका असर रामकुमार के काम पर भी पड़ा है। उनके अनुसार पहले के मुकाबले अब नारियल खरीदने वालों की संख्या घट गई है। एक समय था जब सैकड़ों लोग उनके पास आते थे, लेकिन अब बमुश्किल 30 से 40 नियमित ग्राहक ही उनसे खरीदारी करते हैं। इन सबके बावजूद वह रोजाना करीब 800 से 1000 रुपये तक का कारोबार कर लेते हैं, जिससे उन्हें लगभग 300 से 500 रुपये तक की शुद्ध आमदनी हो जाती है।
दफ्तरों के पास मिलती है ग्राहकों की सुगबुगाहट
अपनी दिनचर्या के बारे में बात करते हुए रामकुमार बताते हैं कि वह हर दिन सुबह करीब 11 बजे अपने घर से निकलते हैं और शहर के विभिन्न हिस्सों में नारियल लेकर पहुंचते हैं। सरकारी और निजी दफ्तरों के आसपास उन्हें आसानी से ग्राहक मिल जाते हैं जो 10 रुपये देकर नारियल का टुकड़ा बड़े चाव से खाते हैं। इसके अलावा हिंदू रीति-रिवाजों और पूजा-पाठ में नारियल की मांग हमेशा बनी रहती है, जो इस कारोबार को किसी तरह जिंदा रखे हुए है।
लुप्त होते पारंपरिक कारोबार के बीच अडिग सफर
रामकुमार याद करते हैं कि जब उन्होंने यह काम शुरू किया था, तब उनके साथ इलाके में करीब तीन और लोग भी नारियल बेचने का काम करते थे। लेकिन समय के पहिए के साथ इस तरह का पारंपरिक स्ट्रीट वेंडिंग का काम करने वाले लोग कम होते चले गए। ग्राहकों की तादाद भी घटी है, फिर भी रामकुमार ने इस काम से मुंह मोड़ने का कभी नहीं सोचा और न ही उनका हौसला डगमगाया।
जब तक मांग है, तब तक जारी रहेगा सफर
रामकुमार का स्पष्ट मानना है कि इसी छोटे से काम से हुई कमाई ने उनके परिवार को पाला-पोसा है। उनका इरादा साफ है कि जब तक बाजार में नारियल बिकता रहेगा, वह इसे बेचने का काम जारी रखेंगे। आम तौर पर वह शाम को 4 से 5 बजे के बीच अपनी खाली टोकरी समेटकर घर वापस लौट जाते हैं। तीस साल लंबा यह सफर इस बात की गवाही देता है कि सच्ची मेहनत और लगن हो, तो कोई भी पारंपरिक काम इंसान को जीवनभर सम्मान के साथ जीविका दे सकता है।




















