कठोर चट्टानों और बलुआ पत्थरों को अपनी छेनी-हथौड़े से सजीव प्रतिमाओं में ढालना भारी धैर्य और तकनीकी निपुणता का काम है। छत्तीसगढ़ के कुम्हली गांव के निवासी मूर्तिकार धनीराम साहू ने इसी पारंपरिक विधा को अपनी आजीविका और पहचान का आधार बनाया है। निरंतर अभ्यास और कड़ी मेहनत के दम पर उन्होंने साधारण पत्थरों को कलात्मक कृतियों में बदला है। आज उनके द्वारा गढ़ी गई मूर्तियों की प्रतिष्ठा न केवल छत्तीसगढ़ में है, बल्कि पड़ोसी राज्यों के कलाप्रेमी और श्रद्धालु भी उनकी रचनाएं खरीदने पहुंच रहे हैं।
1999 से शुरू हुआ मूर्तिकला का सफर
धनीराम साहू ने साल 1999 में मूर्तिकला की बारीकियों को सीखना आरंभ किया था। शुरुआती दौर उनके लिए आसान नहीं था, क्योंकि उस वक्त हाथों में तराशने की वैसी कुशलता नहीं थी और स्थानीय स्तर पर मांग भी बहुत सीमित थी। आर्थिक दिक्कतों और तकनीकी जटिलताओं के बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा। लंबे संघर्ष के बाद पिछले छह वर्षों में उनकी मेहनत रंग लाई, जब उनके काम को व्यापक पहचान मिली और मूर्तियों के ऑर्डर में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। अब ढाई दशक से अधिक समय से वे इसी शिल्प साधना में समर्पित हैं।
कच्चे माल का स्रोत और देवी-देवताओं की आकृतियां
अपनी शिल्पकृतियों के लिए धनीराम साहू खास तौर पर लाल बलुआ पत्थरों और ठोस चट्टानों का इस्तेमाल करते हैं। इस कच्चे माल की व्यवस्था वे बिलासपुर के आसपास स्थित ग्रामीण इलाकों से करते हैं। इन खुरदरे पत्थरों को तराशकर वे भगवान हनुमान, शिवलिंग और मां दुर्गा जैसी धार्मिक प्रतिमाएं गढ़ते हैं। इसके अलावा वे शेर और हाथी जैसे वन्य जीवों की सजीव आकृतियां भी तैयार करते हैं। साधारण से दिखने वाले भारी पत्थरों को तराशने में उन्हें कई दिनों तक लगातार शारीरिक श्रम करना पड़ता है।
आकार के हिसाब से मूर्तियां और उनका मूल्य
कुम्हली में तैयार होने वाली इन प्रतिमाओं की दरें उनके आकार, नक्काशी और काम की जटिलता पर आधारित हैं। सबसे छोटी एक फीट की मूर्ति की शुरुआती कीमत लगभग 900 रुपये है। इसके बाद मध्यम आकार की दो फीट वाली प्रतिमा न्यूनतम 10 हजार रुपये में बेची जाती है, जबकि तीन फीट ऊंची मूर्ति का भाव लगभग 19 हजार रुपये तक पहुंचता है। धनीराम द्वारा अब तक तैयार की गई सबसे विशाल कलाकृति साढ़े पांच फीट की रही है, जिसके लिए उन्हें 65 हजार रुपये का भुगतान मिला था।
श्रमसाध्य विधा और नई पीढ़ी के सामने चुनौतियां
मूर्तिकला की प्रक्रिया बेहद जटिल है, जिसमें पत्थर को मनचाहा आकार देने के लिए अत्यधिक समय, एकाग्रता और दिन-रात की मशक्कत लगती है। जरा सी चूक से हफ्तों की मेहनत खराब होने का जोखिम बना रहता है। धनीराम साहू के अनुसार, वर्तमान दौर की नई पीढ़ी इस कठिन पारंपरिक हस्तकला को सीखने में अधिक दिलचस्पी नहीं ले रही है। युवाओं के घटते रुझान के कारण इस प्राचीन विधा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है, हालांकि वे खुद इस कला परंपरा को जीवित रखने में जुटे हैं।





















