सर्दियों की आमद के साथ ही बाजारों में ताजे और मीठे अमरूद मिलने शुरू हो जाते हैं। आमतौर पर लोग अमरूद को काटकर चाट मसाला छिड़ककर खाना पसंद करते हैं, लेकिन इसी मौसमी फल से बेहद लजीज मुरब्बा, चटपटा अचार और मीठी जेली भी तैयार की जा सकती है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में सदियों पुरानी पारंपरिक पाक कला आज भी अपनी मिठास बिखेर रही है। वहां 120 साल से संचालित एक पारंपरिक प्रतिष्ठान में हर मौसम के अनुसार फलों के खास व्यंजन बनाए जाते हैं। इस समय अमरूद की आवक को देखते हुए वहां के संचालक प्राणनाथ पारंपरिक नुस्खों से अमरूद के तीन अलग-अलग उत्पाद तैयार कर रहे हैं, जिन्हें थोड़ी सी सूझबूझ के साथ कोई भी अपनी रसोई में आसानी से बना सकता है।
धीमी आंच पर तैयार होने वाला अमरूद का मुरब्बा
अमरूद का मुरब्बा स्वाद में जितना उम्दा होता है, इसे बनाने की प्रक्रिया उतनी ही धैर्य और नफासत मांगती है। मुरब्बा बनाने के लिए सबसे पहले ताजे और बेदाग अमरूदों का चयन करना चाहिए। इन अमरूदों को साफ पानी से अच्छी तरह धोकर पूरी तरह सुखा लिया जाता है। इसके बाद किसी साफ पिन या कांटे की मदद से प्रत्येक फल में बारीक छेद किए जाते हैं, ताकि मिठास अंदर तक समा सके। छेद करने के उपरांत इन्हें रात भर पानी में भिगोकर छोड़ दिया जाता है।
अगले दिन पानी से निकालकर अमरूदों को एक बार फिर साफ पानी से धोया जाता है। दूसरी तरफ कड़ाही में गुड़ अथवा चीनी की गाढ़ी चाशनी तैयार की जाती है। इस चाशनी में अमरूदों को डालकर साथ में थोड़ा काला नमक और चुनिंदा खड़े मसाले मिलाए जाते हैं। इसके बाद कड़ाही को धीमी आंच पर रख दिया जाता है। जैसे-जैसे अमरूद चाशनी को सोखते हुए धीरे-धीरे पकते हैं, उनका रंग और बनावट बदलने लगती है। पूरी तरह चाशनी में रच-बस जाने के बाद यह रसीला मुरब्बा खाने के लिए तैयार हो जाता है।
धूप में पकने वाला चटपटा अमरूद का अचार
अगर तीखा और चटपटा स्वाद पसंद है, तो अमरूद का पारंपरिक अचार एक बेहतरीन विकल्प है। इसे बनाने की शुरुआत अमरूदों को धोकर छोटे और एकसमान टुकड़ों में काटने से होती है। कटे हुए टुकड़ों में पानी का अंश बिल्कुल नहीं रहना चाहिए, इसलिए इन्हें कपड़े पर फैलाकर अच्छी तरह सुखा लिया जाता है। इसके बाद कटे फलों में पिसी हल्दी और सादा नमक अच्छी तरह मिलाकर एक पूरे दिन के लिए खुले में सूखने के लिए रख दिया जाता है, जिससे अतिरिक्त नमी निकल जाए।
अगले दिन इस मिश्रण में अचार के विशेष मसाले और थोड़ा सा तेल मिलाया जाता है। सभी सामग्रियों को आपस में अच्छी तरह एकसार करने के बाद इस मिश्रण को कांच के सूखे और स्वच्छ जार में भर दिया जाता है। इस जार को कुछ दिनों तक धूप में रखा जाता है। धूप की प्राकृतिक तपिश से तेल और मसालों का स्वाद अमरूद के टुकड़ों के भीतर गहराई तक समा जाता है, जिससे अचार का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है।
पारंपरिक विधि से बनाएं अमरूद की जेली
बच्चों और बड़ों दोनों को पसंद आने वाली अमरूद की जेली बनाने का तरीका भी काफी सरल है। इसके लिए अमरूदों को धोकर छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और फिर उबलते गर्म पानी में डालकर पकाया जाता है। फलों के नर्म हो जाने पर मिश्रण में थोड़ा सिरका मिलाया जाता है और फिर पूरे पानी को महीन छन्नी से छान लिया जाता है।
छानकर अलग किए गए पानी में थोड़ा काला नमक और स्वाद के अनुसार खास मसाले मिलाए जाते हैं। इसके बाद इस तरल को धीमी आंच पर एक से दो घंटे तक लगातार पकाया जाता है। जब यह गाढ़ा होकर जेली की बनावट ले ले, तब आंच बंद कर दी जाती है। कुछ देर ठंडा होने के बाद यह पारदर्शी और स्वादिष्ट जेली इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाती है।
चार पीढ़ियों की विरासत और 120 साल का स्वाद
गोरखपुर में चलने वाले इस पारंपरिक कारोबार की नींव करीब 120 साल पहले रखी गई थी। प्राणनाथ के अनुसार उनके बाबा श्याम प्रसाद ने इस काम की शुरुआत की थी। उस दौर से लेकर आज तक यह परिवार हर बदलते मौसम में उपलब्ध ताजे फलों से अचार और मुरब्बे बनाने की पारंपरिक कला को सहेजे हुए है।
आज आधुनिक समय में बाजार तरह-तरह के डिब्बाबंद और रसायनों से सुरक्षित किए गए उत्पादों से भरा पड़ा है, लेकिन प्राणनाथ अपनी चौथी पीढ़ी के साथ पूर्वजों की उसी शुद्ध और पारंपरिक पद्धति को जीवित रखे हुए हैं। यही कारण है कि एक सदी से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी उनके बनाए व्यंजनों का स्वाद लोगों की जुबान पर बना हुआ है।



















