रायपुर में विधानसभा के मानसून सत्र के तीसरे दिन छत्तीसगढ़ सरकार ने चार अहम विधेयकों को मंजूरी दे दी है, जिनमें सबसे ज्यादा चर्चा भाड़ा नियंत्रण से जुड़े बदलावों की हो रही है। नए कानून के बाद मकान मालिक और किरायेदार के बीच का कोई भी विवाद अब कोर्ट में सालों तक लटका नहीं रहेगा, बल्कि तय समय सीमा के भीतर निपटा दिया जाएगा। साथ ही राज्य में निजी विश्वविद्यालय खोलने की शर्तें भी काफी हद तक आसान कर दी गई हैं।
लंबित मुकदमों को अब मिलेगी रफ्तार
पहले मकान मालिक और किरायेदार के बीच झगड़ा होने पर मामला अदालत में पहुंचते ही तारीख पर तारीख का सिलसिला शुरू हो जाता था, जिसमें दोनों पक्षों के साल दर साल पैसे और समय दोनों बर्बाद होते थे। अब पारित हुए छत्तीसगढ़ भाड़ा नियंत्रण विधेयक के मुताबिक भाड़ा नियंत्रण अधिकरण में पहले से लंबित पड़े मामलों के साथ-साथ नए दर्ज होने वाले मामलों को भी 60 दिनों के भीतर निपटाने की कोशिश की जाएगी। मुकदमों को अनावश्यक रूप से खींचे जाने पर रोक लगाने के लिए यह भी तय किया गया है कि सुनवाई के दौरान किसी भी पक्ष को तीन बार से ज्यादा स्थगन यानी अगली तारीख नहीं दी जाएगी। सरकार का मानना है कि इस सख्ती से अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम होगा और वर्षों से खिंचते आ रहे किरायेदारी विवाद जल्दी सुलझेंगे।
मकान मालिक या किरायेदार की मौत पर भी नहीं टूटेगा समझौता
नए कानून में एक और अहम बदलाव किया गया है। अब तक किरायेदारी का समझौता सिर्फ मूल मकान मालिक और किरायेदार तक ही सीमित माना जाता था, लेकिन नए प्रावधान के तहत अगर इनमें से किसी की मृत्यु हो जाती है या कोई और परिस्थिति बनती है, तो वही नियम और शर्तें उनके कानूनी वारिसों पर भी पूरी तरह लागू होंगी। इससे परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति और किरायेदारी को लेकर होने वाले उत्तराधिकार के झगड़े काफी हद तक कम होने की उम्मीद है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में पहली बार प्रॉपर्टी मैनेजर यानी संपत्ति प्रबंधक को कानूनी मान्यता दी गई है। इस पद के लिए अधिकार, जिम्मेदारियां और गड़बड़ी करने पर होने वाली कार्रवाई के प्रावधान भी साफ-साफ तय कर दिए गए हैं।
निजी यूनिवर्सिटी खोलना अब पहले जितना मुश्किल नहीं
इसी सत्र में शिक्षा को लेकर भी एक बड़ा फैसला हुआ। छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय स्थापना एवं संचालन संशोधन विधेयक-2026 पास होने के बाद अब प्रदेश में निजी यूनिवर्सिटी खोलना पहले से काफी आसान हो जाएगा। अभी तक शहरी क्षेत्रों में यूनिवर्सिटी खोलने के लिए कम से कम 15 एकड़ और ग्रामीण क्षेत्रों में 25 एकड़ जमीन होना अनिवार्य शर्त थी, जिसे नए नियमों में पूरी तरह हटा दिया गया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि मानकों में ढील दे दी गई है, यूनिवर्सिटी खोलने वालों को यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के तय मानकों का पालन अब भी अनिवार्य रूप से करना होगा। जमीन के बड़े रकबे की शर्त की जगह अब सरकार ने न्यूनतम निर्मित क्षेत्र, जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय मानकों को पूरा करने की शर्त रखी है।
सुरक्षित निधि की नई शर्त भी जुड़ी
जमीन की शर्त हटने के साथ ही सरकार ने एक नई वित्तीय शर्त भी जोड़ी है। अब आदिवासी या अनुसूचित क्षेत्रों में निजी यूनिवर्सिटी खोलने के इच्छुक लोगों को 1 करोड़ रुपये और सामान्य क्षेत्रों में यूनिवर्सिटी खोलने वालों को 3 करोड़ रुपये की रक्षित निधि यानी सिक्योरिटी डिपॉजिट के तौर पर जमा करनी होगी। यह रकम किसी भी तरह की गड़बड़ी होने की सूरत में एक सुरक्षा कवच का काम करेगी।
2000 से अब तक: 115 से घटकर 21 रह गईं यूनिवर्सिटी
छत्तीसगढ़ में निजी विश्वविद्यालयों को लेकर बने नियमों का एक दिलचस्प इतिहास भी रहा है। साल 2000 में राज्य बनने के बाद अजीत जोगी सरकार ने निजी विश्वविद्यालय खोलने के लिए जमीन की कोई बाध्यता नहीं रखी थी। इस ढील का नतीजा यह निकला कि देखते ही देखते प्रदेश में 115 निजी यूनिवर्सिटी खुल गईं, जिनमें से कई तो सिर्फ दो-तीन कमरों के मकानों से ही चल रही थीं। इसके बावजूद इन यूनिवर्सिटी में करीब डेढ़ लाख छात्र पढ़ाई कर रहे थे। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, तो कोर्ट के आदेश के बाद 2005 में नया कानून लाया गया, जिसमें 15 और 25 एकड़ जमीन की शर्त जोड़ी गई। इसी सख्ती की वजह से फिलहाल राज्य में सिर्फ 21 निजी विश्वविद्यालय ही चल रहे हैं। अब सरकार ने एक बार फिर नियमों को व्यावहारिक बनाते हुए उच्च शिक्षा का रास्ता आसान किया है, हालांकि इस बार जमीन की शर्त की जगह गुणवत्ता से जुड़े मानकों पर जोर दिया गया है।
वैट और जीएसटी संशोधन विधेयक भी पास
इसी सत्र के तीसरे दिन विधानसभा में वैट संशोधन विधेयक और जीएसटी संशोधन विधेयक को भी मंजूरी दी गई। भाड़ा नियंत्रण और निजी विश्वविद्यालय से जुड़े विधेयकों के साथ मिलाकर कुल चार विधेयक इस दिन पारित हुए।











