छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण अंचलों में दीपावली का पर्व केवल दीये प्रज्वलित करने और पकवान बांटने तक ही सीमित नहीं रहता। यहां के गांवों में पीढ़ियों से चली आ रही एक अनूठी मान्यता के तहत दीपावली की अमावस्या वाली रात घर की छत, दीवार, पूजा स्थल और पशुओं के कोठे पर रमंडी का पौधा लगाया जाता है। स्थानीय निवासियों का विश्वास है कि अमावस्या की गहन अंधेरी रात में नकारात्मक शक्तियां और बुरी नजर सक्रिय हो जाती हैं। ऐसे में रमंडी का पौधा और खीरा घर के आसपास लगाने से परिवार, संपत्ति और मवेशी सभी प्रकार की अनहोनी तथा बुरी साया से पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।
बुरी साया और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा की पुरानी मान्यता
सरगुजा अंचल के गांवों में दीपावली की पहली रात को रमंडी का पौधा लगाने का विशेष महत्व है। स्थानीय निवासी नानसाय नाग के अनुसार इस परंपरा को निभाने के पीछे मुख्य उद्देश्य परिवार तथा गृहस्थी को किसी भी प्रकार के अनिष्ट प्रभाव और बुरी नजर से दूर रखना है। मान्यता है कि दीपावली की अमावस्या की रात में अदृश्य नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। इस प्रभाव को निष्क्रिय करने के लिए रमंडी के पौधे के साथ खीरे का उपयोग सुरक्षा कवच के रूप में किया जाता है। ग्रामीण इस पौधे को अपनी संपत्ति और रहने के स्थानों के आसपास लगाकर निश्चिंत हो जाते हैं।
संपत्ति से लेकर मवेशी कोठों तक पौधा लगाने की जगहें
इस लोक परंपरा की मुख्य विशेषता यह है कि रमंडी का पौधा केवल आंगन या घर के मुख्य द्वार तक सीमित नहीं रहता। परिवार की हर उस जगह और वस्तु के पास इसे लगाया जाता है जिसे वे अपनी आजीविका तथा सुरक्षा का साधन मानते हैं। घर की मुख्य छत, पूजा स्थल, वाहन, गाय और बैल बांधने का कोठा, हैंडपंप और बोरवेल जैसी जगहों पर रमंडी का पौधा स्थापित किया जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि जल स्रोतों और पशुधन पर बुरी नजर का असर सबसे जल्दी पड़ता है, इसलिए इन सभी स्थानों को सुरक्षा देने के लिए यह पौधा लगाया जाता है।
पितृ पूजा, खीरे का प्रसाद और नए चावल की रस्म
दीपावली की रात घर में दीपक जलाने और स्नान-ध्यान करने के बाद परिवार के सदस्य अपने कुल देवी-देवताओं और पूर्वजों की श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं। पितृ देवताओं को याद कर घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। पूजा संपन्न होने के पश्चात रमंडी के साथ रखे गए खीरे को प्रसाद के रूप में काटकर पूरे परिवार में बांटा जाता है। अगली सुबह एक और महत्वपूर्ण रस्म निभाई जाती है, जिसमें खेतों से आई नए चावल की पहली फसल से प्रसाद तैयार किया जाता है। परिवार के सदस्य यह प्रसाद ग्रहण करते हैं और अपने मवेशियों को भी नया चावल खिलाकर उनका आभार व्यक्त करते हैं।
सोहराई, करमा और मांदर की थाप पर सांस्कृतिक संगम
सरगुजा के आदिवासी समाज में दीपावली की रात का जुड़ाव सोहराई और करमा पर्व की परंपराओं से भी गहरा है। इस अवसर पर गांवों में करमा वृक्ष की शाखा गाड़ने के साथ मांदर की थाप पर पारंपरिक लोक नृत्य का भव्य आयोजन होता है। आसपास के गांवों से आने वाले मांदर वादक अपने संगीत से पूरे वातावरण को गुंजायमान कर देते हैं। यद्यपि आधुनिक युग में कुछ स्थानों पर नए बाजों का प्रयोग होने लगा है, लेकिन बुजुर्गों के मार्गदर्शन में पारंपरिक रीति-रिवाज आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। यह त्योहार पूर्वजों के स्मरण, मवेशियों के प्रति कृतज्ञता और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का सशक्त माध्यम है।



















